नरक चतुर्दशी और दीपावली 2026 का निर्णय – धर्मशास्त्र के प्रमाण
धर्मशास्त्र और तिथि-निर्णय के ग्रंथ निर्णयसिंधु व धर्मसिंधु के अनुसार इस वर्ष के पर्व किस दिन मनाने चाहिए, यह नीचे दिए शास्त्र-प्रमाणों से स्पष्ट जानिए। (तिथि समय: द्रिक पंचांग, भारतीय मानक समय – IST।)

धर्मशास्त्र और तिथि-निर्णय के ग्रंथ निर्णयसिंधु व धर्मसिंधु के अनुसार इस वर्ष के पर्व किस दिन मनाने चाहिए, यह नीचे दिए शास्त्र-प्रमाणों से स्पष्ट जानिए। (तिथि समय: द्रिक पंचांग, भारतीय मानक समय – IST।)
1. नरक चतुर्दशी कब मनाएं?
नरक चतुर्दशी का मुख्य कर्म अरुणोदय काल का अभ्यंग स्नान है (सूर्योदय से लगभग 1 घंटा 36 मिनट पहले के समय में किया जाने वाला तैलाभ्यंग)।
आश्वयुजे तमःपक्षे चतुर्दश्यां विधुक्षये । प्रातःस्नानं तु यः कुर्यात् यमलोकं न पश्यति ॥ (पद्मपुराण / स्मृति मुक्तावली)
यदहः अरुणोदये चतुर्दशी भवति तदहरेव अभ्यङ्गस्नानं कार्यम् । (धर्मसिंधु)
- 07-11-2026 (शनिवार): सुबह 10:47 बजे तक त्रयोदशी है; अरुणोदय के समय चतुर्दशी नहीं है।
- 08-11-2026 (रविवार): भोर में अरुणोदय के समय चतुर्दशी तिथि पूरी तरह व्याप्त है (सुबह 11:27 बजे तक)।
- निर्णय: 08-11-2026 (रविवार) की भोर में ही नरक चतुर्दशी का अभ्यंग स्नान और यम तर्पण करना चाहिए।
2. नरकासुर का वध रात में हुआ, तो क्या प्रदोष नहीं देखना चाहिए?
धर्मशास्त्र का सूत्र है:
"यस्मिन् कर्मणि यः कालस्तत्कालव्यापिनी तिथिः" – जिस कर्म के लिए जो समय निर्धारित है, उस समय जो तिथि हो, वही ली जाती है।
श्रीकृष्ण की कृपा से नरकासुर जिस रात मारा गया, उस रात के लिए नहीं, बल्कि उसके माँगे वर के अनुसार अगले दिन भोर (अरुणोदय) में किए जाने वाले मंगल स्नान के लिए ही नरक-निवारण का फल बताया गया है। इसलिए यहाँ प्रदोष या रात्रि की तिथि का कोई संबंध नहीं; अरुणोदय की चतुर्दशी ही मुख्य है।
3. दीपावली लक्ष्मी पूजा कब?
शास्त्र कहते हैं कि दीपावली की लक्ष्मी पूजा और दीपदान संध्या के प्रदोष काल में करें:
प्रदोषसमये लक्ष्मीं पूजयित्वा ततः सुधीः । दीपवृक्षान् प्रकुर्वीत भवनेषु गृहेषु च ॥
- 08-11-2026 (रविवार): सुबह 11:27 बजे के बाद अमावस्या शुरू होती है और संध्या का पूरा प्रदोष काल अमावस्या तिथि में रहता है।
- निर्णय: 08-11-2026 (रविवार) की संध्या को ही दीपावली लक्ष्मी पूजा और दीप आराधना करें।
रविवार, 8 नवंबर 2026 का विधि-क्रम
- भोर में (अरुणोदय): तिल के तेल से अभ्यंग स्नान, अपामार्ग (उत्तरेणी) से शरीर का परिक्रमण, यम तर्पण।
- संध्या (प्रदोष काल): घर की सजावट, दीप आराधना, धनलक्ष्मी पूजा और केदारेश्वर व्रत।
शास्त्र-विहित दिन ही पर्व मनाकर सभी शुभ फल प्राप्त करें।
सर्वे जनाः सुखिनो भवन्तु! 🙏
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