भक्ति का मूल है हृदय-परिवर्तन – श्री सद्गुरु पीठम्
मंदिर जाना, पूजा करना, तीर्थयात्रा करना, पवित्र नदियों में स्नान करना – ये सब हमारे भीतर भक्ति-भाव बढ़ाने और मन को पवित्र करने के मार्ग हैं।

मंदिर जाना, पूजा करना, तीर्थयात्रा करना, पवित्र नदियों में स्नान करना – ये सब हमारे भीतर भक्ति-भाव बढ़ाने और मन को पवित्र करने के मार्ग हैं।
लेकिन यह सब करने के बाद भी अगर हमारे विचारों, वाणी और कर्मों में बदलाव नहीं आता, तो हम उनका वास्तविक लाभ नहीं पा सकते।
सच्ची आध्यात्मिकता क्या है?
सच्ची आध्यात्मिकता का अर्थ है बुरे विचार छोड़कर अच्छे मार्ग पर चलना, दूसरों को कष्ट दिए बिना जीना और हर कार्य में धर्म का पालन करना।
भगवान कहीं दूर हैं, यह सोचकर उन्हें खोजने के बजाय अपने हृदय को ही उनका निवास बनाना चाहिए। हमें इस भाव से जीना चाहिए कि हमारा हर विचार, हर आचरण ईश्वर को साक्षी मानकर हो रहा है।
अहंकार छोड़ना ही असली साधना
भगवान से माँगने से अधिक महत्त्वपूर्ण है अपने भीतर के अहंकार, स्वार्थ और द्वेष को छोड़ना। क्योंकि भगवान की कृपा पाने का मार्ग बाहरी आडंबर में नहीं, आंतरिक पवित्रता में है।
शरीर से की गई आराधना से हृदय से की गई आराधना श्रेष्ठ है। आराधना को पूर्णता हृदय-परिवर्तन से ही मिलती है।
सच्ची भक्ति
इसलिए भगवान पर विश्वास रखकर, अहंकार छोड़कर, संपूर्ण शरणागति के भाव से धर्म-मार्ग पर जीना ही सच्ची भक्ति है। यही वह असली आध्यात्मिक साधना है जो मनुष्य को ईश्वर के निकट ले जाती है।
श्री सद्गुरु पीठम् ✍️
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