भगवान से सम्बन्ध कैसे बनाएँ? केवल जप, पूजा, ध्यान, व्रत ही भक्ति नहीं है। भगवान के साथ प्रेमपूर्ण सख्यता, नित्य उनकी भावना में रहना, सच्चे नमस्कार का अर्थ — श्री सद्गुरु पीठम् की शिक्षाओं के आधार पर।

भक्ति क्या है? दैनिक आचरण कैसे ईश्वर-प्रेम तक ले जाते हैं?

भगवान के साथ सख्यता बढ़ाएँ। जप, पूजा, ध्यान, व्रत मात्र भक्ति नहीं हैं — ये भी करने योग्य हैं। ये नित्य करने से हमारी ईश्वर के साथ निकटता एवं प्रेम बढ़ता है। उनसे प्रेम करना ही हमारा कर्तव्य है।

रूप-नाम के साथ भगवान की पूजा क्या पूर्व जन्म का संस्कार है?

रूप एवं नाम के साथ भगवान को मनुष्य के रूप में पहचान कर, प्रेम कर, पूजा करना — यह पूर्व जन्म का संस्कार ही है। सभी को भगवान के साथ बन्धन नहीं मिलता। उनकी अनुग्रह जिनके पास होती है, उन्हीं को यह सम्भव होता है।

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भगवान के साथ सख्यता कैसे स्थिर हो?

भगवान के साथ सख्यता तब स्थिर होती है जब वे सदैव हमारी दृष्टि में, हमारी भावना में रहें। प्रेमपूर्वक उनसे सम्भाषण करें। दैनिक जीवन के प्रत्येक कार्य को उनकी अनुग्रह के रूप में देखें, प्रत्येक श्वास में उनके नाम का स्मरण करें — यही सच्ची भक्ति है।

सच्चा नमस्कार क्या है?

केवल भगवान को देखकर अपने गालों पर हाथ रखना या नमस्कार करना ही नमस्कार नहीं है। नमस्कार अर्थात — पाँच कर्मेन्द्रियाँ और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ। इन्हीं दस इन्द्रियों से हम सब व्यवहार करते हैं। "ये सब आपकी ही दी हुई हैं, हे स्वामी ये आपकी ही हैं, इनका मैं सही उपयोग कर सकूँ" — ऐसी प्रार्थना करनी चाहिए।

ईश्वर और भक्त के मध्य अविनाभाव सम्बन्ध

केवल देह ही पृथक हैं; बिम्ब-प्रतिबिम्ब के समान ईश्वर के साथ अविनाभाव सम्बन्ध बनता है। हम उसी के प्रतिबिम्ब हैं। इस सत्य की पहचान करना ही सच्ची भक्ति का आरम्भ है।

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स्रोत एवं परम्परा

श्री सद्गुरु पीठम् के प्रवचनों से संगृहीत। परम्परा: अद्वैत-अनुगत भक्ति पन्थ।

सम्पादकीय समीक्षा

हिन्दूटोन धर्म डेस्क द्वारा समीक्षित — 30 मई 2026। तिथियाँ, समय एवं शास्त्रीय सन्दर्भ अनेक पंचाङ्ग एवं प्रामाणिक ग्रन्थों के विरुद्ध सत्यापित किए गए हैं। हमारी सम्पादकीय नीति एवं संशोधन नीति देखें।

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🙏 शुभमस्तु 🙏

— श्री सद्गुरु पीठम् से

समस्त लोकाः सुखिनो भवन्तु