उपनयन (यज्ञोपवीत / ब्रह्मोपदेश संस्कार) वह संस्कार है जो युवा को वेदाध्ययन एवं अनुशासित आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश कराता है। गुरु के मार्गदर्शन में विद्या-संसार में पुनर्जन्म के कारण इसे "द्विज" (दूसरा जन्म) कहा जाता है।

महत्व

इस संस्कार का हृदय ब्रह्मोपदेश है — पिता/गुरु द्वारा गायत्री मंत्र का उपदेश एवं यज्ञोपवीत धारण। यह विद्या, ब्रह्मचर्य एवं नित्य संध्यावंदन के प्रति प्रतिबद्धता का प्रतीक है।

पात्रता एवं समय

  • परंपरागत रूप से बालकों हेतु, सामान्यतः 7–9 वर्ष की आयु में (विवाह से पूर्व); प्रथाएँ एवं आयु समुदाय-संप्रदाय अनुसार भिन्न।
  • शुभ मुहूर्त पंचांग/पुरोहित द्वारा चुनें।

सामग्री

  • यज्ञोपवीत, बालक हेतु नए वस्त्र/धोती
  • दीप, हवन सामग्री (जहाँ हो), हल्दी, कुंकुम, चावल, पुष्प
  • फल, मिठाई एवं भिक्षा (नए ब्रह्मचारी को बड़ों द्वारा दी जाने वाली प्रतीक भिक्षा) सामग्री

विधि (सामान्य रूप)

  1. गणेश आवाहन — "ॐ गं गणपतये नमः"; पुरोहित आरंभिक कर्म एवं हवन करते हैं।
  2. बालक को स्नान कराकर वस्त्र पहनाएँ; निर्धारित प्रार्थनाओं सहित यज्ञोपवीत धारण कराया जाता है।
  3. पिता/गुरु गायत्री मंत्र (ब्रह्मोपदेश) का उपदेश देते हैं।
  4. नया ब्रह्मचारी बड़ों से भिक्षा एवं आशीर्वाद प्राप्त करता है; परिवार प्रसाद सहित मनाता है।

गायत्री मंत्र

ॐ भूर्भुवः स्वः। तत्सवितुर्वरेण्यं। भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्॥

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Om bhūr bhuvaḥ svaḥ, tat savitur vareṇyaṁ, bhargo devasya dhīmahi, dhiyo yo naḥ pracodayāt.

हमारे शब्दों में, गायत्री — सवित (सूर्य) की दिव्य ज्योति से प्रार्थना है कि वह हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर प्रकाशित एवं प्रेरित करे। उपनयन में इसे श्रद्धा से ग्रहण कर तत्पश्चात नित्य पाठ किया जाता है।

NRI विदेश में कैसे करें

  • पुरोहित को प्रत्यक्ष बुलाएँ, या पुजारी के साथ ऑनलाइन; विदेश के मंदिर उपनयन आयोजित करते हैं।
  • यज्ञोपवीत एवं सामग्री भारतीय दुकानों से; दादा-दादी को वीडियो कॉल पर सम्मिलित करें।
  • अनेक परिवार बाद में भारत के मंदिर में इसे पूर्ण/स्मरण करते हैं।

सूचना: पात्रता, आयु एवं विधि समुदाय-संप्रदाय अनुसार बदलती हैं — पारिवारिक पुरोहित एवं बड़ों का अनुसरण करें।

16 संस्कार गाइड, अक्षराभ्यास देखें।