सिंहाचलम में श्री वराह लक्ष्मी नरसिम्हा स्वामी मंदिर का शाही इतिहास।

श्री वराह लक्ष्मी नरसिंह स्वामी मंदिर आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम जिले में समुद्र तल से 800 मीटर की ऊँचाई पर सिंहचलम पहाड़ी पर स्थित है। यह भगवान विष्णु के अवतार को समर्पित है, जिन्हें यहाँ वराह नरसिंह स्वामी के रूप में पूजा जाता है।

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वराह नरसिंह स्वामी का रूप भगवान विष्णु ने अपने सच्चे भक्त प्रहलाद की प्रार्थना पर लिया था, जो भगवान विष्णु और वराह दोनों का संयोजन देखना चाहता था।

मूलविराट मंदिर, जो भगवान श्री महाविष्णु के तीसरे और चौथे (नरसिंह) अवतारों का संयोजन है, जिसे श्री वराह लक्ष्मी नरसिंह स्वामी के नाम से जाना जाता है, भारत में केवल सिंहाचलम में ही पाया जाता है।

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आइये वराह नरसिंह स्वामी मंदिर के इतिहास और वास्तुकला पर चर्चा करें।

मंदिर के बारे में सबसे पुराने लेख 1087 ई. के हैं, जिसमें चोल राजा “कुलोत्तुंग प्रथम” के काल में एक व्यक्ति द्वारा दिए गए उपहार के बारे में बताया गया है। 13वीं शताब्दी के मध्य में, इस शहर पर शासन करने वाले पूर्वी गंगा राजा “नरसिंहदेव प्रथम” के शासनकाल के दौरान मंदिर परिसर में बहुत सारे बदलाव हुए।

1293 ई. की एक स्क्रिप्ट में मंदिर में गंगा राजाओं द्वारा उप-मंदिरों को जोड़ने का उल्लेख है, जो भगवान विष्णु के अवतारों: वैकुंठनाथम, यज्ञवरहम और माधवदेवरम को समर्पित था। द्वैत दार्शनिक और पूर्वी गंगा मंत्री नरहरि तीर्थ ने सिंहचलम नरसिंह स्वामी मंदिर को एक प्रसिद्ध शैक्षणिक प्रतिष्ठान और वैष्णव धर्म के लिए एक धार्मिक स्थल के रूप में पुनर्निर्मित किया।

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मंदिर को रेड्डी राजवंश, गजपति राजाओं और कई अन्य शाही परिवारों से धन प्राप्त हुआ, जिनमें विजयनगर साम्राज्य का तुलुवा राजवंश प्रसिद्ध है। कलिंग शासन के दौरान, राजा कृष्णदेवराय ने अपने सैन्य अभियानों के दौरान सिंहचलम मंदिर में एक जयस्तंभ या स्तंभ बनवाया था।

तुलुवा राजाओं ने 16वीं शताब्दी ई. तक सिंहाचलम मंदिर को वित्त पोषित किया तथा इस क्षेत्र में मुस्लिम आक्रमण के दौरान 1564 से 1604 ई. तक यह मंदिर 40 वर्षों तक धार्मिक निष्क्रियता से गुजरा।

सिंहाचलम नरसिंह स्वामी मंदिर की वास्तुकला बाहर से एक किले की तरह दिखती है जिसमें तीन बाहरी प्रांगण और पांच विशाल प्रवेश द्वार हैं। इसकी वास्तुकला शैली दक्षिण में कलिंग, चालुक्य, काकतीय और चोल राजवंशों की वास्तुकला शैलियों का मिश्रण है।

मंदिर का मुख पूर्व की ओर न होकर पश्चिम की ओर है, जिसे सामान्य मंदिर परंपराओं के विपरीत माना जाता है। हिंदू धर्मग्रंथों, पुरुषोत्तम संहिता और विष्णु संहिता के अनुसार, पश्चिम की ओर मुख वाला मंदिर अधिक विजय का प्रतीक है, जबकि पूर्व की ओर मुख वाले मंदिर केवल समृद्धि को दर्शाते हैं।

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सिंहचलम नरसिंह स्वामी मंदिर में मनाए जाने वाले दो महत्वपूर्ण त्यौहार कल्याणोत्सव और चंदनोत्सव हैं, जिसके बाद नरसिंह जयंती मनाई जाती है। सिंहचलम मंदिर में मनाए जाने वाले इन त्यौहारों का द्रविड़ संप्रदाय और तमिलनाडु राज्य में प्रचलित संस्कृतियों पर प्रभाव पड़ता है।

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प्रहलाद और वराह नरसिंह के संयुक्त रूप की पौराणिक पृष्ठभूमि क्या है?

भागवत पुराण और नृसिंह पुराण के अनुसार, भक्त प्रहलाद ने भगवान विष्णु से यह विनती की थी कि वे एक साथ वराह और नरसिंह — दोनों रूपों का दर्शन दें। भगवान ने इस अद्वितीय प्रार्थना को स्वीकार करते हुए अपना 'वराह नरसिंह' रूप प्रकट किया, जिसमें वराह (वरा = श्रेष्ठ, अह = दिन / शूकर रूप) का मुख और नरसिंह (नर + सिंह) का शरीर एकसाथ विद्यमान है।

यही कारण है कि सिंहाचलम का यह विग्रह भारत के अन्य विष्णु मंदिरों से मूलतः भिन्न है। यहाँ विराजमान मूर्ति को वर्ष में केवल एक बार — अक्षय तृतीया के दिन — चंदन लेप (चंदन यात्रा) हटाकर देखा जा सकता है। शेष 364 दिन विग्रह चंदन से आच्छादित रहता है, और भक्त लेपित स्वरूप का ही दर्शन करते हैं।

चंदन यात्रा उत्सव का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

सिंहाचलम मंदिर की सबसे प्रसिद्ध परंपरा 'चंदन यात्रा' है, जो प्रत्येक वर्ष वैशाख शुक्ल तृतीया — अर्थात् अक्षय तृतीया — को मनाई जाती है। इस दिन भगवान वराह लक्ष्मी नरसिंह स्वामी के विग्रह पर वर्षभर चढ़ाया गया चंदन का लेप विशेष पूजा विधि के साथ हटाया जाता है, और मूल विराट रूप के दर्शन कुछ घंटों के लिए सुलभ होते हैं।

स्कंद पुराण के 'वेंकटाचल माहात्म्य' खंड में सिंहाचलम क्षेत्र का उल्लेख एक दिव्य क्षेत्र के रूप में मिलता है। मान्यता है कि चंदन का यह लेप भगवान को शीतलता प्रदान करता है क्योंकि नरसिंह रूप अत्यंत उग्र तेज से युक्त है। लाखों श्रद्धालु इस एकमात्र अवसर पर विग्रह का मूल रूप देखने के लिए दूर-दूर से सिंहाचलम आते हैं।

मंदिर की वास्तुकला में कलिंग और चालुक्य शैलियों का समन्वय कैसे दिखता है?

सिंहाचलम मंदिर की वास्तुशिल्प शैली को 'कलिंग-चालुक्य' संयुक्त शैली कहा जाता है। मुख्य विमान (गर्भगृह के ऊपर का शिखर) कलिंग स्थापत्य की 'रेखा देउल' पद्धति में निर्मित है — सीधे ऊपर उठता हुआ, वक्राकार शिखर। इसके विपरीत, मुखमंडप और नाट्यमंडप में चालुक्य शैली की क्षैतिज पट्टिकाएँ और अलंकृत स्तंभ देखे जा सकते हैं।

मंदिर परिसर में तीन प्राकार (आवरण प्रांगण) हैं और पाँच विशाल गोपुरम (प्रवेश द्वार) हैं जो किसी किले की दीवारों का आभास देते हैं। 13वीं शताब्दी में पूर्वी गंगा राजाओं द्वारा निर्मित 'कल्याण मंडपम' सोलह स्तंभों पर आधारित है, जिन पर मिथुन, यक्ष और विष्णु के दशावतारों की सूक्ष्म नक्काशी अंकित है। यह समग्र स्थापत्य भारतीय मंदिर निर्माण की बहुराजवंशीय विरासत का जीवंत उदाहरण है।

नरहरि तीर्थ और द्वैत वेदांत परंपरा से इस मंदिर का क्या संबंध है?

श्री नरहरि तीर्थ, जो मध्वाचार्य के प्रमुख शिष्यों में से एक थे, 13वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में पूर्वी गंगा राजवंश के मंत्री और शासक-प्रतिनिधि के रूप में इस क्षेत्र में कार्यरत थे। उन्होंने सिंहाचलम को द्वैत वेदांत (जो ब्रह्म और जीव को सर्वदा भिन्न मानता है) के प्रचार-प्रसार का एक प्रमुख केंद्र बनाया।

नरहरि तीर्थ ने मंदिर में नित्य पूजा की व्यवस्था को सुदृढ़ किया और वैष्णव आगम-शास्त्र के अनुसार षोडशोपचार पूजा पद्धति लागू की। उनके नाम से जुड़ी 'नरहरि तीर्थ मठ' परंपरा आज भी इस क्षेत्र में जीवित है और मंदिर के उत्सवों में इस मठ की भागीदारी देखी जाती है।

मंदिर के प्रमुख वार्षिक उत्सव और तीर्थाटन की व्यवस्था

चंदन यात्रा के अतिरिक्त, सिंहाचलम में 'कल्याणोत्सव' (दिव्य विवाहोत्सव), 'ब्रह्मोत्सव' (नौ दिवसीय महोत्सव) और 'नवरात्रि उत्सव' विशेष उत्साह से मनाए जाते हैं। ब्रह्मोत्सव के दौरान भगवान वराह लक्ष्मी नरसिंह स्वामी को विभिन्न वाहनों पर — जैसे हनुमंत वाहनम, गरुड़ वाहनम और अश्व वाहनम — जुलूस में निकाला जाता है।

विशाखापत्तनम नगर से सिंहाचलम पहाड़ी तक सड़क मार्ग द्वारा लगभग 16 किलोमीटर की दूरी है। पहाड़ी पर चढ़ने के लिए पक्की सीढ़ियाँ भी हैं जिन्हें 'मेट्टु मार्गम' कहते हैं। आंध्र प्रदेश सरकार के देवस्थानम बोर्ड द्वारा मंदिर प्रशासन संचालित है, जो तीर्थयात्रियों के लिए अन्नप्रसादम और आवास की व्यवस्था करता है।

मंदिर से जुड़ी स्थानीय किंवदंतियाँ और पुराण-संदर्भ

स्थानीय परंपरा के अनुसार, इस पहाड़ी को 'श्री पर्वत' या 'सिंहाद्रि' कहा जाता है — सिंह (शेर) + अद्रि (पर्वत), अर्थात् वह पर्वत जहाँ नरसिंह विराजते हैं। कहा जाता है कि स्वयं प्रहलाद ने इस पर्वत पर भगवान की आराधना की थी और उनके संकेत पर ही यहाँ मूर्ति की स्थापना हुई।

वराह पुराण में 'सिंहाद्रि क्षेत्र' को 108 वैष्णव दिव्य क्षेत्रों में से एक बताया गया है। यद्यपि यह मंदिर आलवार संतों के 'दिव्य प्रबंधम' में सम्मिलित 108 दिव्य देशमों में औपचारिक रूप से नहीं गिना जाता, फिर भी इसकी महत्ता दक्षिण भारत के प्रमुख विष्णु क्षेत्रों के समकक्ष मानी जाती है और इसे 'अपरोक्ष दिव्य देशम' की संज्ञा दी जाती है।