महाकुंभ मेला भारत में आध्यात्मिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण आयोजनों में से एक है, जिसमें दुनिया भर से लाखों श्रद्धालु आते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने 2025 में उपस्थित लोगों के लिए एक सुव्यवस्थित और सार्थक अनुभव सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यहाँ बताया गया है कि उन्होंने कैसे बदलाव लाया है:

  1. यातायात और सहायता सेवाओं के साथ तीर्थयात्रियों का मार्गदर्शन करना

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16,000 से ज़्यादा समर्पित स्वयंसेवकों के साथ, आरएसएस ने विशाल मेला मैदान में यातायात प्रबंधन का अहम काम अपने हाथ में ले लिया है। ये स्वयंसेवक न सिर्फ़ वाहनों की सुचारू आवाजाही सुनिश्चित करने में मदद करते हैं, बल्कि तीर्थयात्रियों को रास्ता खोजने में भी मदद करते हैं, और व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस के साथ मिलकर काम करते हैं।

  1. पर्यावरण पहल: “एक थैला, एक प्लेट” अभियान

इस भव्य आयोजन से उत्पन्न पर्यावरणीय चुनौतियों को समझते हुए, आरएसएस ने 'एक थैला, एक प्लेट' अभियान शुरू किया। यह पहल एकल-उपयोग अपशिष्ट को कम करने के लिए पुन: प्रयोज्य प्लेट और सूती थैले वितरित करके स्थिरता को बढ़ावा देती है, जिससे स्वच्छ और हरित कुंभ को प्रेरित किया जाता है।

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  1. स्वास्थ्य देखभाल और राहत प्रयास

आरएसएस के स्वयंसेवक जरूरतमंद तीर्थयात्रियों को प्राथमिक उपचार और चिकित्सा सहायता सहित आवश्यक स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने के लिए आगे आए हैं। वे भोजन वितरित करने और कार्यक्रम के दौरान फंसे लोगों के लिए अस्थायी आवास की व्यवस्था करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

  1. सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जागरूकता को बढ़ावा देना

सोच-समझकर तैयार किए गए 'कुंभ दर्शन' कार्यक्रमों के ज़रिए, आरएसएस ने देश भर से 8,000 से ज़्यादा छात्रों की भागीदारी सुनिश्चित की है। यह पहल युवा दिमागों को भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और आध्यात्मिक शिक्षाओं से गहरा जुड़ाव प्रदान करती है।

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निःस्वार्थ सेवा की भावना

महाकुंभ मेले में आरएसएस की व्यापक भागीदारी लाखों श्रद्धालुओं की सहायता करने, सांस्कृतिक मूल्यों को संरक्षित करने और तीर्थयात्रा को अधिक सार्थक बनाने के लिए इसकी अटूट प्रतिबद्धता को दर्शाती है। उनका समर्पण सेवा की सच्ची भावना का उदाहरण है।

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कुंभ मेले का आध्यात्मिक और पौराणिक आधार क्या है?

महाकुंभ का मूल आधार समुद्र मंथन की पौराणिक कथा में है, जिसका वर्णन श्रीमद्भागवत पुराण और विष्णु पुराण दोनों में विस्तार से मिलता है। देवताओं और असुरों के बीच हुए इस मंथन से निकले अमृत कलश की कुछ बूँदें प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक में गिरी थीं — इसीलिए इन चारों स्थलों पर कुंभ का आयोजन होता है।

प्रयागराज का विशेष महत्व ऋग्वेद में भी वर्णित है, जहाँ गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम को 'त्रिवेणी' कहा गया है। मत्स्य पुराण के अनुसार माघ मास में इस संगम पर स्नान करने से जन्म-जन्मांतर के पापों का नाश होता है। 'महाकुंभ' प्रत्येक बारह वर्षों में एक बार होता है, जो बृहस्पति के मकर राशि में प्रवेश और सूर्य-चंद्र की विशेष ग्रह-स्थिति पर आधारित है।

आरएसएस की सेवा-परंपरा और 'सेवा' की वैदिक अवधारणा

आरएसएस के स्वयंसेवकों की कार्यशैली वैदिक 'सेवा' की उस अवधारणा पर आधारित है जिसे भगवद्गीता के तृतीय अध्याय में 'यज्ञार्थात् कर्म' — अर्थात् यज्ञ की भावना से किया गया कर्म — कहा गया है। निःस्वार्थ भाव से की गई सेवा को शास्त्रों में 'नरसेवा नारायणसेवा' के रूप में स्वीकार किया गया है, जो स्कंद पुराण में भी उल्लिखित है।

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1925 में नागपुर में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा स्थापित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने आपदा राहत, शैक्षिक सेवा और सामाजिक समरसता को अपनी कार्यशैली का अभिन्न अंग बनाया है। महाकुंभ 2025 में 16,000 से अधिक स्वयंसेवकों की उपस्थिति इसी दीर्घकालीन परंपरा की अभिव्यक्ति है।

प्रयागराज में आरएसएस के शिविर और 'कुंभ दर्शन' कार्यक्रम की विशेषताएँ

'कुंभ दर्शन' कार्यक्रम के अंतर्गत देश के विभिन्न राज्यों से आए 8,000 से अधिक विद्यार्थियों को संगम तट पर संतों और विद्वानों से सीधे संवाद का अवसर दिया गया। इन शिविरों में उपनिषदों की मूल शिक्षाओं, भारतीय दर्शन की षड्दर्शन परंपरा और तीर्थयात्रा के सांस्कृतिक महत्व पर सत्संग आयोजित किए गए।

शिविरों में युवाओं को प्रयागराज के ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक स्थलों — जैसे अक्षयवट, सरस्वती कूप और श्रृंगवेरपुर — की जानकारी भी दी गई। यह पहल उस भारतीय गुरुकुल परंपरा को पुनर्जीवित करने का प्रयास है जिसमें तीर्थस्थल केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि शैक्षणिक केंद्र भी हुआ करते थे।

गंगा संरक्षण और पर्यावरण सेवा: धर्म और प्रकृति का समन्वय

'एक थैला, एक प्लेट' अभियान केवल स्वच्छता तक सीमित नहीं है — यह उस वैदिक दृष्टि का विस्तार है जिसमें नदी को माँ (गंगा माता) और पर्यावरण को देव-स्वरूप माना गया है। अथर्ववेद की पृथ्वी सूक्त (भूमि सूक्त, 12.1) में पृथ्वी की रक्षा को मनुष्य का परम धर्म बताया गया है।

आरएसएस के स्वयंसेवकों ने मेला क्षेत्र में प्लास्टिक संग्रह, घाटों की सफाई और जैव-अपघटनशील सामग्री के वितरण में सक्रिय भागीदारी निभाई। गंगा को प्रदूषण से बचाना आज केवल पर्यावरणीय आवश्यकता नहीं, बल्कि शास्त्रीय दृष्टि से एक धार्मिक कर्तव्य भी है, जिसे स्कंद पुराण के काशीखंड में 'गंगा-सेवा' के रूप में विशेष महत्व दिया गया है।

खोए हुए तीर्थयात्रियों की सहायता: संकट में सेवा का व्यावहारिक स्वरूप

महाकुंभ जैसे विशाल आयोजन में बुजुर्ग, बच्चे और भाषाई बाधाओं से जूझ रहे श्रद्धालु प्रायः अपने परिजनों से बिछड़ जाते हैं। आरएसएस के स्वयंसेवकों ने मेला प्रशासन के साथ समन्वय करते हुए ऐसे तीर्थयात्रियों के लिए विशेष सहायता केंद्र स्थापित किए, जहाँ हिंदी के अतिरिक्त तमिल, तेलुगु, बंगाली और ओड़िया जानने वाले स्वयंसेवक भी तैनात थे।

यह बहुभाषीय सेवा-व्यवस्था उस भारतीय एकता की प्रतीक है जिसे 'एकं सत् विप्राः बहुधा वदन्ति' (ऋग्वेद 1.164.46) के सूत्र में व्यक्त किया गया है — अर्थात् सत्य एक है, विद्वान उसे अनेक नामों से जानते हैं। विभिन्न भाषा-भाषी समुदायों की सेवा करना भारत की सांस्कृतिक विविधता में एकता के उस शाश्वत भाव को व्यवहार में उतारना है।

स्वास्थ्य सेवा शिविर: आयुर्वेद और आधुनिक चिकित्सा का संगम

आरएसएस से संबद्ध आरोग्य भारती और सेवा भारती संगठनों ने मेला क्षेत्र में चिकित्सा शिविर लगाए, जहाँ प्राथमिक उपचार के साथ-साथ आयुर्वेदिक औषधियाँ भी निःशुल्क वितरित की गईं। शीतकालीन मेले में श्वास-रोग, हाइपोथर्मिया और पैरों में छाले जैसी सामान्य परेशानियों के लिए त्वरित उपचार की व्यवस्था की गई।

चरक संहिता में वर्णित 'आतुरस्य हितं वाक्यम्' — अर्थात् रोगी के हित में बोला गया वचन ही सर्वोत्तम सेवा है — इस भावना को इन शिविरों में व्यावहारिक रूप दिया गया। बड़ी संख्या में वरिष्ठ नागरिक तीर्थयात्री इन चिकित्सा सेवाओं के सबसे बड़े लाभार्थी रहे, जिनके लिए प्रयागराज जैसे महातीर्थ की यात्रा जीवन की एक अमूल्य आध्यात्मिक उपलब्धि होती है।