संकष्टी चतुर्थी (संकटहर चतुर्थी) पर चंद्रमा का नियम गणेश चतुर्थी के ठीक विपरीत है — यहाँ चंद्रमा देखना आवश्यक है। व्रत चंद्रोदय और चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही खोला जाता है।

चंद्रमा क्यों देखना आवश्यक है

संकष्टी चतुर्थी कृष्ण पक्ष (घटते चंद्र) में आती है। चंद्र-दर्शन और अर्घ्य व्रत की पूर्णता है और इसे संकट-नाशक माना जाता है।

व्रत विधि

  1. सूर्योदय पर व्रत आरंभ; दिनभर फल-दूध-जल (अन्न वर्जित)।
  2. सायं गणेश पूजा करें।
  3. स्थानीय चंद्रोदय की प्रतीक्षा करें।
  4. चंद्र-दर्शन कर अर्घ्य (जल, दूध, चावल, श्वेत पुष्प) दें; "ॐ सोमाय नमः" या "ॐ चन्द्राय नमः" बोलें।
  5. तभी गणेश-प्रसाद (मोदक/लड्डू) से व्रत खोलें।

संकष्टी बनाम गणेश चतुर्थी

  • गणेश चतुर्थी (भाद्रपद शुक्ल): चंद्रमा न देखें — मिथ्या दोष से बचाव।
  • संकष्टी (कृष्ण पक्ष): चंद्रमा अवश्य देखें — व्रत की पूर्णता व संकट-नाश।

गणेश चतुर्थी 2026 के बाद अगली संकष्टी सितंबर 2026 के अंत में (अंगारकी संकष्टी) — स्थानीय पंचांग व चंद्रोदय से पुष्टि करें।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

संकष्टी चतुर्थी पर चंद्रमा देखना जरूरी है?

हाँ — व्रत चंद्र-दर्शन और अर्घ्य के बाद ही खोला जाता है।

यह गणेश चतुर्थी से कैसे अलग है?

गणेश चतुर्थी पर चंद्रमा नहीं देखते; संकष्टी पर देखना आवश्यक है।

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