महत्वपूर्ण: यह विधानम् एक भक्ति-सहायक पाठ है। मध्याह्न मुहूर्त तथा संकल्प के विवरण (संवत्सर, नक्षत्र, योग, करण) अपने स्थानीय पंचांग से, और मंत्रोच्चारण अपने कुल पुरोहित से सुनिश्चित करें। [ ] कोष्ठक में दिए स्थान पंचांग से भरने हैं। छोटी पर श्रद्धापूर्ण पूजा भी सम्पूर्ण है — अंत की क्षमा प्रार्थना त्रुटियों की पूर्ति करती है।

यह विनायक चतुर्थी की सम्पूर्ण पूजा-क्रम है — आचमन से लेकर उद्वासन तक, प्रत्येक मंत्र संस्कृत, रोमन लिप्यंतरण और अर्थ सहित। गणेश चतुर्थी 2026 सोमवार, 14 सितंबर को है; स्थापना मध्याह्न काल में। स्थान, दिशा और सामग्री-सूची के लिए हमारा गणेश स्थापना मार्गदर्शक देखें।

भाग 1 — प्रारंभ

शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्। प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥
Śuklāmbaradharaṁ viṣṇuṁ śaśivarṇaṁ caturbhujam…
श्वेत वस्त्रधारी, सर्वव्यापी, चंद्र-वर्ण, चतुर्भुज, प्रसन्नमुख का ध्यान करें — समस्त विघ्नों की शांति हेतु।

आचमन — ॐ केशवाय स्वाहा, ॐ नारायणाय स्वाहा, ॐ माधवाय स्वाहा; फिर गोविन्द से श्रीकृष्ण तक केशव नाम। शुद्धि — "अपवित्रः पवित्रो वा…"; दीप प्रज्वलन, घंटानाद, भूतशुद्धि ("उत्तिष्ठन्तु भूतपिशाचाः…") और प्राणायाम।

भाग 2 — संकल्प

अक्षत-जल हाथ में लेकर संकल्प करें। 14 सितंबर 2026 हेतु पंचांग से भरें:

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  • संवत्सर — वर्तमान संवत्सर [पंचांग से]
  • दक्षिणायन, वर्षा ऋतु, भाद्रपद मास, शुक्ल पक्ष, चतुर्थी तिथि, सोमवार
  • नक्षत्र, योग, करण — [स्थानीय पंचांग से]
  • गोत्र, नाम — अपने

"…श्री वरसिद्धि विनायक देवता प्रीत्यर्थं, क्षेम-स्थैर्य-आयुरारोग्य-ऐश्वर्य-अभिवृद्ध्यर्थं, धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष चतुर्विध फल पुरुषार्थ सिद्ध्यर्थं, षोडशोपचार पूजां करिष्ये।" यहाँ अपनी व्रत-अवधि (1½, 3, 5, 7 या 10 दिन) घोषित करें।

भाग 3 — कलश आराधना

कलशस्य मुखे विष्णुः कण्ठे रुद्रः समाश्रितः। गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु॥

कलश के मुख में विष्णु, कंठ में रुद्र, मूल में ब्रह्मा; गंगा-यमुना आदि नदियाँ इस जल में सन्निहित हों। [जल छिड़कें]

भाग 4 — हरिद्रा गणपति एवं प्राणप्रतिष्ठा

मुख्य मूर्ति से पूर्व हल्दी से छोटा गणपति बनाकर पूजा निर्विघ्न आरम्भ करें। "ॐ गणानां त्वा गणपतिं हवामहे…" से आवाहन।

अस्य प्राणाः प्रतिष्ठन्तु अस्य प्राणाः क्षरन्तु च। अस्य देवत्वमर्चायै मामहेति च कश्चन॥
Asya prāṇāḥ pratiṣṭhantu…
इस मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठित हों और स्थिर रहें; पूजा हेतु इसमें देवत्व निवास करे। स्थिरो भव, वरदो भव, सुप्रसन्नो भव।

भाग 5 — वरसिद्धि विनायक षोडशोपचार

एकदन्तं शूर्पकर्णं गजवक्त्रं चतुर्भुजम्। पाशाङ्कुशधरं देवं ध्यायेत् सिद्धिविनायकम्॥

एकदंत, शूर्पकर्ण, गजमुख, चतुर्भुज, पाश-अंकुशधारी सिद्धि विनायक का ध्यान करें।

आवाहन ("अत्रागच्छ जगद्वन्द्य…"), फिर सोलह उपचार क्रम से: आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय, मधुपर्क, पंचामृत स्नान (दूध-दही-घी-शहद-शर्करा; अभिषेक में "गं गणपतये नमः" ग्यारह बार), शुद्धोदक स्नान, वस्त्र, यज्ञोपवीत, गंध, अक्षत, पुष्प।

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भाग 6 — अंग पूजा

प्रत्येक नाम पर अक्षत/पुष्प अर्पित करें — ॐ पार्वतीनन्दनाय नमः (चरण), गणेशाय (टखने), जगद्धात्रे (पिंडली), उमापुत्राय (जंघा), विकटाय (कटि), नाथाय (नाभि), विनायकाय (वक्ष), हेरम्बाय (हृदय), कपिलाय (कंठ), सुमुखाय (मुख), एकदन्ताय (दंत), विघ्ननेत्रे (नेत्र), फालचन्द्राय (ललाट), शिवप्रियाय (शिर), सर्वमंगलासुताय (सर्वांग)।

भाग 7 — एकविंशति पत्र पूजा (21 पत्ते)

माची, बृहती, बिल्व, दूर्वा, धत्तूर, बदरी, अपामार्ग, तुलसी, आम्र, करवीर, विष्णुक्रांता, दाडिमी, देवदारु, मरुवक, सिन्धुवार, जाती, गण्डकी, शमी, अश्वत्थ, अर्जुन, अर्क — प्रत्येक एक नाम के साथ। सभी न मिलें तो दूर्वा से संख्या पूरी करें (दूर्वा सर्वप्रिय अर्पण है); फिर 21 दूर्वा-युग्म अर्पित करें।

भाग 8 — अष्टोत्तर शतनामावली (108 नाम)

गजानन, गणाध्यक्ष, विघ्नराज, विनायक, द्वैमातुर, सुमुख, महागणपति, हेरम्ब, लम्बजठर, मोदकप्रिय, विघ्नकर्ता, विघ्नहर्ता, सर्वसिद्धिप्रद, पार्वतीनन्दन, कुमारगुरु, गंगासुत, अभीष्टवरद, पुराणपुरुष, ब्रह्मचारी, महोदर, मदोत्कट, महावीर, विष्णुप्रिय, भक्तजीवित … श्री विघ्नेश्वराय नमः — अष्टोत्तर शतनाम पूजा समर्पयामि। (पूर्ण 108 नाम अपने पाठ के अनुसार पढ़ें।)

भाग 9 — धूप, दीप, नैवेद्य, नीराजन

दशांग धूप, घृत-दीप दिखाएँ। नैवेद्य — मोदक, उंड्राळ्ळु/लड्डू, फल, गुड़; गायत्री स्मरण कर जल छिड़कें, "ॐ प्राणाय स्वाहा… समानाय स्वाहा" से निवेदन। स्टीम किए चावल-पिष्ट पिंड (कुदुमुलु, मोदक) उनका प्रिय नैवेद्य है; यथासंभव 21 अर्पित करें। फिर तांबूल, कर्पूर नीराजन, मंत्रपुष्प, प्रदक्षिणा-नमस्कार।

भाग 10 — व्रत कथा

पार्वती ने अपने शरीर के उबटन से एक बालक बनाकर प्राण दिए और द्वार पर पहरे हेतु बैठाया। शिव को बालक ने रोका; युद्ध में बालक का शिरच्छेद हुआ। पार्वती के शोक को शांत करने हेतु शिव ने गज का शिर लगाकर उसे जीवित किया, गणों में अग्रणी और प्रत्येक कार्य में प्रथम पूज्य बनाया — गजानन प्रकट हुए। वे भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को मध्याह्न में प्रकट हुए, इसीलिए स्थापना मध्याह्न में की जाती है।

गणेश की उदर देखकर हँसे चंद्रमा को पार्वती ने शाप दिया — जो इन्हें देखेगा उस पर मिथ्या आरोप आएगा। देवों की प्रार्थना पर उपाय दिया — जो चतुर्थी को गणेश पूजा कर कथा श्रद्धा से सुनकर अक्षत सिर पर धारण करे, वह मिथ्या दोष से मुक्त रहेगा। द्वापर में श्रीकृष्ण ने दूध में चंद्र-प्रतिबिंब देखकर श्यमंतक मणि का मिथ्या आरोप झेला; जाम्बवान से 28 दिन युद्ध के बाद मणि और जाम्बवती प्राप्त कर, सत्यभामा से विवाह कर, नाम निष्कलंक किया। तभी से चतुर्थी को व्रत एवं श्यमंतक कथा की परंपरा है।

सिंहः प्रसेनमवधीत् सिंहो जाम्बवता हतः। सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः॥

(चतुर्थी रात्रि भूलवश चंद्र दिखे तो यह श्लोक पढ़ें)

भाग 11 — समापन

मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं गणाधिप। यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु ते॥

मंत्र, क्रिया व भक्ति से रहित — जो पूजा मैंने की, हे प्रभो, वह सम्पूर्ण मानी जाए। (क्षमा प्रार्थना)

किसी त्रुटि हेतु तीन बार — ॐ अच्युताय नमः, ॐ अनन्ताय नमः, ॐ गोविन्दाय नमः। प्रसाद-अक्षत सिर पर धारण करें। उद्वासन केवल विसर्जन दिवस पर — "यान्तु देवगणाः सर्वे…", ॐ शांतिः शांतिः शांतिः। मध्य दिनों में मूर्ति स्थापित रखकर नित्य पूजा करें।

यहाँ के मंत्र, नाम एवं कथाएँ पारंपरिक वैदिक-पौराणिक पूजा-विधान की हैं। यह संकलन कृतज्ञतापूर्वक तेलुगु पद्धति परंपरा — श्री प्रणव पीठम् एवं श्री वासु मुक्तिनूतलपाटि की रचनाओं — के आभार सहित प्रस्तुत है। कृपया सभी विवरण अपने कुल पुरोहित से सुनिश्चित करें।