भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी निकट आते ही गलियाँ, कॉलोनियाँ, अपार्टमेंट और मंदिर गणपति उत्सव की तैयारी में लग जाते हैं। मूर्तियाँ आती हैं, मंडप सजते हैं, अलंकरण होते हैं। परंतु इस उल्लास के बीच हमें एक महत्वपूर्ण प्रश्न स्वयं से पूछना चाहिए — क्या हम गणेश को केवल एक उत्सव के लिए बुला रहे हैं, या अपने जीवन में दैवभाव की प्रतिष्ठा कर रहे हैं? विनायक चतुर्थी केवल सामूहिक उत्सव नहीं है; यह गणपति उपासना, नियम, भक्ति, संस्कार और बच्चों को धर्म से परिचित कराने का अपूर्व अवसर है।

गणपति तत्त्व क्या है?

वैदिक परंपरा में गणपति तत्त्व को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। ऋग्वेद का प्रसिद्ध मंत्र है—

गणानां त्वा गणपतिं हवामहे कविं कवीनामुपमश्रवस्तमम् ।
ज्येष्ठराजं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पत आ नः शृण्वन्नूतिभिः सीद सादनम् ॥ — ऋग्वेद 2.23.1

गणपत्यथर्वशीर्ष उन्हें परम तत्त्व स्वरूप में उपासित करता है — "त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि… त्वं साक्षादात्माऽसि नित्यम्।" इसलिए मंडप में जिसे हम प्रतिष्ठित करते हैं उसे केवल सुंदर मिट्टी की प्रतिमा नहीं समझना चाहिए। उस मूर्ति में भगवान के सान्निध्य का अनुभव करते हुए की गई आराधना ही उत्सव का प्राण है।

Advertisement

गणपति उत्सव क्यों?

गणेश विघ्नेश्वर हैं। हमारे भीतर का अहंकार, असहनशीलता, अश्रद्धा, अविवेक, अनुशासनहीनता और बुरी आदतें — ये सब जीवन के विघ्न ही हैं। इसलिए गणेश की आराधना केवल बाहरी विघ्नों को दूर करने की प्रार्थना नहीं है; यह अपने भीतर के विघ्नों को पहचानकर उन्हें पार करने के लिए बुद्धि और विवेक माँगने की प्रार्थना भी है। इसीलिए हम उन्हें बुद्धिप्रदाता, सिद्धिप्रदाता और विघ्नविनाशक के रूप में पूजते हैं। विनायक चतुर्थी केवल घर में मूर्ति स्थापित करने का पर्व नहीं; यह हृदय में विवेक की प्रतिष्ठा का पर्व है।

कितने दिन रखें? विसर्जन कब?

ऐसा कोई एक सार्वत्रिक शास्त्रनियम नहीं कि हर परिवार नौ दिन ही गणेश को रखे। देश, कुल, परिवार की परंपरा, स्थानीय रीति और लिए गए संकल्प के अनुसार 1, 3, 5, 7, 9 दिन या अनंत चतुर्दशी तक आराधना की जाती है। कितने दिन रखा, इससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि जितने दिन रखा उतने दिन कितने नियम से आराधना की। संकल्पित काल भर पूजा, नैवेद्य, दीपाराधना, आरती, मंत्रपाठ, स्तोत्रपाठ, भजन और नामसंकीर्तन होते रहना चाहिए।

"मंगलवार को मूर्ति नहीं हिलानी चाहिए," "शुक्रवार को विसर्जन नहीं करना चाहिए" — इन्हें सार्वत्रिक शास्त्रनियम नहीं मानना चाहिए। विसर्जन में मुख्यतः तिथि, संकल्पित उत्सवकाल, कुल और स्थानीय परंपरा देखनी चाहिए। संदेह हो तो कुल पुरोहित या धर्मशास्त्रज्ञ से तिथि–काल निश्चित कर लेना उत्तम है। आराधना में भय से अधिक शास्त्रज्ञान महत्वपूर्ण है। विसर्जन का अर्थ भगवान को विदा कर देना नहीं — रूप आता है, रूप जाता है; तत्त्व नित्य है। हम मूर्ति का विसर्जन करते हैं, गणपति तत्त्व का नहीं।

Advertisement

पूजा में मंत्र, अर्चना और भक्त का दायित्व

अलंकरण कितना ही सुंदर हो, यदि आराधना में श्रद्धा न हो तो उत्सव का आध्यात्मिक लाभ घट जाता है। अष्टोत्तरशतनामावली में प्रत्येक नाम से भगवान के एक गुण का स्मरण होता है। इसलिए प्रत्येक नाम स्पष्ट उच्चारित हो, भक्तों को सुनाई दे, भक्त श्रद्धा से सुनें और पुष्प या अक्षत से अर्चना में भाग लें। पूजा शीघ्र समाप्त करना ही लक्ष्य न बने। पुरोहित श्रद्धा से मंत्र कहें, भक्त श्रद्धा से सुनें, आयोजक शांत वातावरण बनाएँ। पूजा के समय ऊँची आवाज़ में बात करना, फोन पर बातें करना कम करना चाहिए। मंडप एक अस्थायी मंदिर है — इसे देवता के सान्निध्य वाला पवित्र स्थान मानकर सम्मान दें।

संगीत, नृत्य, कोलाटम् और बच्चों का संस्कार

उत्सव में आनंद, उत्साह और सामूहिक सहभागिता हो — पर वह आनंद भक्ति और संस्कार पर आधारित हो। मंडप में मुख्यतः गणपति स्तोत्र, वेदमंत्र, भजन, नामसंकीर्तन, हरिकथा, धर्मप्रवचन और भक्तिसंगीत सुनाई देना चाहिए। आराधना से असंबद्ध गीत, अत्यधिक शोर और अशोभनीय नृत्य उत्सव की पवित्रता के अनुकूल नहीं। भक्ति और मर्यादा के साथ कोलाटम्, भजन और पारंपरिक नृत्य किए जा सकते हैं।

गणपति नवरात्रि बच्चों के धर्म-संस्कार का अपूर्व अवसर है। प्रतिदिन थोड़ा-सा सिखाएँ — गणेश का एक नाम, "ॐ गं गणपतये नमः" का जप, एक छोटा श्लोक; पूजा में शांत बैठना, आरती में भाग लेना, प्रसाद को आदर से ग्रहण करना, बड़ों का सम्मान करना सिखाएँ। बच्चे हमारे कहने से अधिक हमारे करने से सीखते हैं — गणपति उत्सव में बच्चों के पहले गुरु माता-पिता ही हैं।

सच्चा गणपति उत्सव कैसा हो?

मंडप में शुचिता, सात्त्विकता, समयपालन, मंत्रश्रवण, भजन, पारायण, प्रसाद में स्वच्छता, बच्चों के लिए धर्मबोध, बड़ों के प्रति सम्मान और पर्यावरण के प्रति दायित्व हो। सबसे बढ़कर, प्रतिस्पर्धा न हो — "हमारा गणपति बड़ा", "हमारा मंडप ही श्रेष्ठ" — यह भाव आध्यात्मिक लक्ष्य को ढक देता है। मूर्ति की ऊँचाई नहीं, भक्ति की ऊँचाई महत्वपूर्ण है; कितना शोर किया यह नहीं, मन ने कितनी स्थिरता से गणेश का स्मरण किया यह महत्वपूर्ण है।

विसर्जन यात्रा भी भक्ति यात्रा है — नामस्मरण, भजन, जयघोष, अनुशासन और दूसरों को कष्ट न देने का दायित्व हो। अशोभनीय गीत, मद्यपान और उन्मादपूर्ण नृत्य दैवोत्सव के अनुकूल नहीं। इस बार एक संकल्प करें — क्या हमारे बच्चे ने नया श्लोक सीखा? क्या परिवार ने साथ मिलकर शांति से पूजा की? क्या हमने एक नाम का अर्थ जाना? क्या एक बुरी आदत छोड़ने का संकल्प किया? क्या हममें भक्ति थोड़ी बढ़ी? विसर्जन के साथ गणेश हमारे जीवन से चले न जाएँ — उनके द्वारा प्रदत्त बुद्धि, विवेक, नियम और भक्ति हमारे हृदय में सदा प्रतिष्ठित रहें। यही सच्चा गणपति उत्सव है।

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटिसमप्रभ ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥

श्री गणेशाय नमः। सर्वे जनाः सुखिनो भवन्तु।

— वासु मुक्तिनूतलपाटि (ज्ञानपीठम्) की एक चिंतनपरक रचना पर आधारित