रोशनी का त्यौहार दिवाली | भारत में दिवाली कैसे मनाई जाती है

दिवाली, जिसे रोशनी का त्यौहार भी कहा जाता है, हर साल अक्टूबर में मनाया जाता है। 'दिवाली' शब्द की उत्पत्ति संस्कृत शब्द 'दीपावली' से हुई है, जहाँ 'दीप' का अर्थ है 'प्रकाश' और 'वली' का अर्थ है 'पंक्ति'; इस प्रकार रोशनी की एक पंक्ति, जो इस समय घरों में बिल्कुल दिखाई देती है।
दिवाली, जिसे रोशनी का त्यौहार भी कहा जाता है, हर साल अक्टूबर में मनाया जाता है। 'दिवाली' शब्द की उत्पत्ति संस्कृत शब्द 'दीपावली' से हुई है, जहाँ 'दीप' का अर्थ है 'प्रकाश' और 'वली' का अर्थ है 'पंक्ति'; इस प्रकार रोशनी की एक पंक्ति, जो इस समय घरों में बिल्कुल दिखाई देती है। दिवाली हिंदू कैलेंडर के अनुसार अमावस्या या 'अमावस्या' को मनाई जाती है। इसे हिंदू, जैन और सिख धर्म के लोग मनाते हैं। इसे बुराई पर अच्छाई का उत्सव माना जाता है। इस दिन लोग दुनिया भर के समुदायों के घरों और दिलों को रोशन करते हैं। पाँच दिनों के दौरान, घरों को दीयों और मोमबत्तियों से रोशन किया जाता है, और बाहरी हिस्सों को अक्सर बिजली की रोशनी से सजाया जाता है।
हिंदू पौराणिक कथाओं में दिवाली के उत्सव को कई कहानियों में दर्शाया गया है। भगवान राम अपनी पत्नी सीता देवी और भाई लक्ष्मण के साथ 14 साल के वनवास के बाद अयोध्या लौटे थे। ग्रामीणों ने राम के मार्ग को रोशन करने के लिए उत्सव की रोशनी का इस्तेमाल किया, जिन्होंने राक्षस राजा रावण को हराया था, जिससे लोगों को अंधेरे की बेड़ियों से मुक्ति मिली थी। भगवान राम और रामायण की कहानियाँ कुछ क्षेत्रों में दिवाली के उत्सव को चिह्नित करती हैं। एक और विजयी घटना जो इस दिन को और अधिक शुभ बनाती है, वह है भगवान कृष्ण द्वारा प्रागज्योतिषपुर पर शासन करने वाले राक्षस नरकासुर को हराना, जो बताता है कि क्यों कुछ लोग अपनी स्वतंत्रता का जश्न दिवाली के त्यौहार के रूप में भी मनाते हैं।
दिवाली के दौरान पूरे देश में हिंदू देवी लक्ष्मी को समृद्धि की देवी के रूप में मनाया और पूजा जाता है। कहा जाता है कि दिवाली की रात को उन्होंने भगवान विष्णु को अपना पति चुना था। हिंदू कैलेंडर के अनुसार नए साल में सौभाग्य और समृद्धि लाने के लिए एक विस्तृत पूजा की जाती है। परिवार उत्सव के लिए सज-धज कर तैयार होते हैं। पूजा अनुष्ठानों के दौरान, घर में देवी को आमंत्रित करने के प्रतीक के रूप में मुख्य द्वार खुला रखा जाता है ताकि अच्छी संपत्ति और स्वास्थ्य लाया जा सके।
इस दिन लोग एक दूसरे को उपहार देकर और मिठाई खाकर स्वागत करते हैं। दोस्त, परिवार, पड़ोसी और परिचित एक दूसरे को रंग-बिरंगी स्वादिष्ट भारतीय मिठाइयों जैसे लड्डू, बर्फी, पेड़े और जलेबी के डिब्बे देते हैं। डिब्बों में सूखे मेवे और चॉकलेट भी रखे जाते हैं।
दिवाली के दिन, हवा में धूपबत्ती और जलते पटाखों की खुशबू फैली होती है, जिसे देखना एक सुखद अनुभव होता है। कुछ लोग दिवाली को जोर-शोर से और रंगीन तरीके से मनाते हैं, जबकि अन्य लोग अपने परिवार के साथ मिठाई का आनंद लेते हुए समय बिताना पसंद करते हैं।
अंत में, हिंदूटोन इसे पढ़ने वाले सभी लोगों को खुशहाल, सुरक्षित और लड्डूओं से भरी दिवाली की शुभकामनाएं देता है!
दीपावली के पाँच दिन — धनतेरस से भाई दूज तक का आध्यात्मिक क्रम
दिवाली केवल एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि पाँच दिनों की एक सुव्यवस्थित आध्यात्मिक यात्रा है। पहला दिन धनतेरस कहलाता है, जब भगवान धन्वन्तरि — आयुर्वेद के देवता — समुद्र-मंथन से प्रकट हुए थे। इस दिन सोना, चाँदी या नए बर्तन खरीदना शुभ माना जाता है, क्योंकि यह समृद्धि और आरोग्य दोनों का प्रतीक है।
दूसरे दिन नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली) पर भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर का वध किया था — यह वही प्रसंग है जो असम और आंध्र प्रदेश में विशेष रूप से मनाया जाता है। तीसरे दिन अमावस्या को मुख्य लक्ष्मी पूजन होती है। चौथे दिन गोवर्धन पूजा की जाती है, जो श्रीमद्भागवत पुराण में वर्णित उस घटना की स्मृति है जब भगवान कृष्ण ने इंद्र के अहंकार को तोड़ते हुए गोवर्धन पर्वत को उठाया था। पाँचवाँ दिन भाई दूज है, जो यम और यमुना की भाई-बहन की पवित्र कथा पर आधारित है।
लक्ष्मी पूजन की विधि और उसके शास्त्रीय आधार
अमावस्या की रात्रि को की जाने वाली लक्ष्मी पूजन का विधान स्कंद पुराण और पद्म पुराण में विस्तार से मिलता है। पूजा में गणेश जी का पहले आह्वान किया जाता है, क्योंकि शास्त्र में 'आदौ गणपति पूजनम्' का निर्देश है — किसी भी मांगलिक कार्य की शुरुआत विघ्नहर्ता से होती है। इसके बाद महालक्ष्मी, महासरस्वती और महाकाली का त्रिशक्ति रूप में पूजन किया जाता है।
पूजा में कमल के फूल, कमलगट्टे की माला, पान, सुपारी, कौड़ी और धनिया के बीज विशेष रूप से रखे जाते हैं। लक्ष्मी सूक्त (ऋग्वेद का परिशिष्ट भाग) और श्री सूक्त का पाठ इस पूजन की आत्मा है। व्यापारी वर्ग अपनी नई बही-खातों पर 'शुभ-लाभ' लिखकर देवी का आशीर्वाद माँगते हैं — यह परंपरा मुख्यतः उत्तर भारत, राजस्थान और गुजरात में प्रचलित है।
क्षेत्रीय विविधता — भारत के अलग-अलग राज्यों में दिवाली का स्वरूप
भारत एक विशाल देश है और दिवाली का उत्सव हर राज्य में अपने विशिष्ट रंग लेता है। पश्चिम बंगाल और ओडिशा में इस दिन काली पूजा का आयोजन होता है, जहाँ महाकाली को दीपों के बीच आसीन कर उनकी विशेष आराधना की जाती है। वाराणसी (काशी) में देव दीपावली कार्तिक पूर्णिमा को मनाई जाती है, जब गंगा के सभी घाटों पर लाखों दीप प्रज्वलित किए जाते हैं — यह दृश्य अलौकिक होता है।
गुजरात में दिवाली के अगले दिन नया व्यावसायिक वर्ष (बेस्तु वर्ष) प्रारंभ होता है। केरल में त्रिक्कार्तिका के रूप में यह पर्व मनाया जाता है। पंजाब में, जहाँ सिख समुदाय बंदी छोड़ दिवस के रूप में मनाते हैं — यह उस दिन की याद में है जब गुरु हरगोबिंद सिंह जी ग्वालियर के किले से मुक्त हुए थे। इस प्रकार दिवाली अनेक परंपराओं और आस्थाओं का संगम बन जाती है।
दीये का प्रतीकवाद — ज्योतिर्विज्ञान और वेदांत की दृष्टि से
दीपक केवल मिट्टी और तेल का संयोग नहीं है — वह एक गहरा आध्यात्मिक प्रतीक है। उपनिषदों में कहा गया है, 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' — अर्थात् अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो। दीपक की लौ ऊपर की ओर उठती है, जो जीवात्मा की परमात्मा की ओर यात्रा का प्रतीक मानी जाती है। मिट्टी का दीया पाँच तत्वों — पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश — के समन्वय का उदाहरण है।
वेदांत की दृष्टि से दिवाली का अज्ञान-नाश और ज्ञान-प्रकाश से सीधा संबंध है। जिस प्रकार एक दीपक से हजारों दीप जलाए जा सकते हैं और पहले दीपक की ज्योति कम नहीं होती, उसी प्रकार ब्रह्म-ज्ञान का प्रसार होने से उसका स्रोत क्षीण नहीं होता। यही कारण है कि आचार्य शंकर ने अपने भाष्यों में 'प्रकाश' को चेतना का पर्याय माना है।
पर्यावरण और दिवाली — परंपरागत दीयों की वापसी का महत्त्व
मिट्टी के दीयों का उपयोग न केवल परंपरा से जुड़ा है, बल्कि इसका पर्यावरणीय महत्त्व भी गहरा है। कुम्हार समुदाय के लिए दिवाली का मौसम आजीविका का प्रमुख स्रोत होता है और स्थानीय मिट्टी के दीये खरीदना इस पारंपरिक शिल्प को जीवित रखने में सहायक है। ये दीये प्राकृतिक रूप से अपघटित हो जाते हैं और पर्यावरण पर कोई दीर्घकालिक बोझ नहीं डालते।
इसके विपरीत, चीनी निर्मित प्लास्टिक सजावट और रासायनिक रंग-पटाखे वायु और भूमि प्रदूषण के बड़े कारण बनते हैं। कई शहरों में अब 'हरित दिवाली' अभियान चलाए जाते हैं जो तेल-दीपक, फूलों की सजावट और कम ध्वनि वाले पटाखों को प्रोत्साहन देते हैं। शास्त्रोक्त दृष्टि से भी पर्यावरण की रक्षा — जो अथर्ववेद के 'पृथ्वी सूक्त' में स्पष्ट है — धार्मिक दायित्व का ही अंग है।
दिवाली और धन-सम्पत्ति की सही समझ — लक्ष्मी-तत्त्व का आध्यात्मिक अर्थ
विष्णु पुराण में देवी लक्ष्मी को केवल भौतिक सम्पदा की देवी नहीं, बल्कि 'श्री' के रूप में वर्णित किया गया है — जिसका अर्थ है शोभा, कीर्ति, विद्या और आनन्द का समग्र रूप। जहाँ परिश्रम, ईमानदारी और सेवा-भाव हो, वहाँ लक्ष्मी का वास होता है — यह भाव भागवत पुराण में भी मिलता है।
इसीलिए दिवाली से पहले घर की सफाई को विशेष महत्त्व दिया जाता है। माना जाता है कि देवी लक्ष्मी स्वच्छ, सुव्यवस्थित और प्रकाशमान स्थानों पर विराजती हैं। यह केवल भौतिक सफाई नहीं है — मन के विकार, ईर्ष्या, लालच और क्रोध को भी साफ करने का यह उचित समय माना गया है। वास्तव में, दीपावली का सन्देश है कि बाहरी प्रकाश तभी सार्थक है जब भीतर का अंधकार भी मिटे।




