चिन्ना श्रीमन्नारायण रामानुज जीयर की लघु जीवनी

श्री त्रिदंडी चिन्ना श्रीमन्नारायण रामानुज जीयर स्वामीजी, एक आध्यात्मिक शिक्षक और एक महान व्यक्तित्व, श्री रामानुजाचार्य के शिष्यों के सबसे महान भिक्षुओं में से एक हैं जिन्हें जीयर कहा जाता है।

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जीयर एक हंसमुख व्यक्ति हैं जो अपने शारीरिक आराम के बारे में बेपरवाह हैं लेकिन हमेशा दूसरों के कल्याण के बारे में चिंतित रहते हैं, चिन्ना जीयर स्वामीजी जहाँ भी जाते हैं लोगों के दिलों में आशा और खुशी भर देते हैं। चिन्ना जीयर स्वामीजी भारत के प्रबुद्ध दिव्य आध्यात्मिक और मानवतावादी नेता हैं, जो वैदिक पाठों, आध्यात्मिक प्रथाओं, अहिंसा, साझा करने की खुशी और एक साथ रहने वाले सभी जीवित प्राणियों के लिए आपसी सम्मान की शिक्षाओं के माध्यम से विश्व शांति को बढ़ावा देने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं।

श्री त्रिदंडी चिन्ना श्रीमन्नारायण रामानुज जीयर स्वामीजी का जन्म 3 नवंबर 1956 को दिवाली के दिन आंध्र प्रदेश के पूर्वी गोदावरी जिले के अर्थमुरु गांव में अलार्मेइलु मंगथायारु और श्री तिरुवेंगलाचार्य के घर हुआ था।

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श्री स्वामीजी का मानना ​​है कि आचार्य वह व्यक्ति है जो पहले अभ्यास करता है और फिर उपदेश देता है। वह गहरी आध्यात्मिक संवेदनशीलता और बौद्धिक विचारों वाले महान संत हैं। वह सभी लोगों के लिए असीम प्रेम का सार हैं। उनके द्वारा की गई सभी गतिविधियाँ समाज के प्रति उनकी गहरी चिंता को दर्शाती हैं।

कोई भी भक्त अपने जीवन के हर पहलू में ज्ञान देख सकता है और लोगों को संबोधित कर सकता है। स्वामीजी का साफ-सुथरा रूप, उनकी वाणी का शुद्ध तरीका, जिस स्नेह से स्वामीजी लोगों को संबोधित करते हैं और उनके प्रश्नों का उत्तर देते हैं, उनकी वाणी में जो स्पष्टता और क्षमता है, वह लोगों को बहुत अधिक ज्ञान दे सकती है।

स्वामीजी युवा और वृद्ध लोगों को हमारी विरासत और परंपराओं के बारे में जागरूक करके शिक्षित करना चाहते हैं। अधिकांश भक्तों को उनके चमकते, हमेशा मुस्कुराते चेहरे को देखकर ही राहत मिलती है। उनकी चिंतित नज़र लोगों के मन को साफ करती है और उनकी चेतना को अंधकार से दिव्य की ओर ले जाती है।

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उन्होंने हमेशा दुनिया भर के समुदायों को शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और शांतिपूर्ण जीवन के समान अवसर प्रदान करने के लिए सशक्त बनाने का सपना देखा। इस वजह से, उन्होंने कई वैदिक विद्यालयों की स्थापना, मुफ्त चिकित्सा शिविर, शांति और सद्भाव सत्र, मुफ्त भोजन, पशु कल्याण, गरीबों के लिए मुफ्त शिक्षा, लोगों के बीच आध्यात्मिकता फैलाने के लिए विदेश यात्रा और बहुत कुछ जैसी कई गतिविधियाँ की हैं।

इस लेख में हमने सेवा की कला को गढ़ने वाले एक प्रेरक व्यक्तित्व, आध्यात्मिक गुरु, वैदिक विद्वान और दार्शनिक चिन्ना श्रीमन्नारायण रामानुज जीयर स्वामीजी के बारे में चर्चा की है। हमारे अन्य लेख भी अवश्य देखें।

विशिष्टाद्वैत परंपरा में जीयर की भूमिका क्या है?

श्री रामानुजाचार्य द्वारा प्रतिपादित विशिष्टाद्वैत वेदांत दर्शन में 'जीयर' पद का विशेष स्थान है। जीयर वे संन्यासी होते हैं जो त्रिदंड धारण करते हैं — तीन दंड जो मन, वाक् और काय के समर्पण के प्रतीक हैं — और जो श्रीवैष्णव सम्प्रदाय की आचार्य परम्परा में दीक्षित होते हैं।

चिन्ना जीयर स्वामीजी इसी परम्परा की अटूट कड़ी हैं। वे पंचसंस्कार (समाश्रयण) के माध्यम से भक्तों को वैष्णव दीक्षा देते हैं, जिसमें तापन, पुण्ड्रन, नामकरण, मंत्रग्रहण और यागाधिकार सम्मिलित हैं। इस प्रकार वे श्री रामानुज से चली आ रही आचार्य-शिष्य परम्परा को जीवंत रखते हैं।

स्वामीजी की शैक्षणिक और सामाजिक सेवाओं का विस्तार कैसा है?

चिन्ना जीयर स्वामीजी ने तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में अनेक वैदिक विद्यालय, गुरुकुल और शैक्षणिक संस्थाएँ स्थापित की हैं। इनमें संस्कृत, वेदाध्ययन, आगम शास्त्र और आधुनिक विज्ञान का समन्वित अध्यापन होता है, जिससे छात्र भारतीय ज्ञान-परम्परा और समकालीन जगत दोनों में सक्षम बन सकें।

स्वामीजी के नेतृत्व में संचालित 'जीयर एजुकेशनल ट्रस्ट' अनेक ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में निःशुल्क शिक्षा तथा स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान करता है। स्वामीजी ने बार-बार इस बात पर बल दिया है कि सेवा ही सच्चा भगवद्-आराधन है — यह भाव श्री रामानुज के 'सर्वे जनाः सुखिनो भवन्तु' के आदर्श पर आधारित है।

वेदांत और अहिंसा के प्रति स्वामीजी का दृष्टिकोण क्या है?

चिन्ना जीयर स्वामीजी वैष्णव धर्मशास्त्र के अनुसार अहिंसा को केवल जीव-रक्षा तक सीमित नहीं मानते, अपितु वे इसे विचार, वाणी और कर्म — तीनों स्तरों पर आचरित करने की शिक्षा देते हैं। वे प्रायः तैत्तिरीय उपनिषद् के 'सत्यं वद, धर्मं चर' वाक्य को उद्धृत करते हुए बताते हैं कि धर्म और सत्य का पालन ही मनुष्य का परम कर्तव्य है।

स्वामीजी मांसाहार-त्याग और पर्यावरण-रक्षा को परस्पर संबद्ध मानते हैं। उनके अनुसार श्रीमद्भागवत में वर्णित भूमि-माता के प्रति कृतज्ञता भाव ही पर्यावरण संरक्षण की आध्यात्मिक नींव है। उन्होंने विभिन्न अवसरों पर वृक्षारोपण अभियान और नदी-संरक्षण कार्यक्रम भी आयोजित किए हैं।

श्री रामानुज सहस्राब्दी समारोह में स्वामीजी का योगदान

वर्ष 2017 में हैदराबाद के निकट मुचिंतल में 'स्टैच्यू ऑफ इक्वालिटी' परियोजना के लिए चिन्ना जीयर स्वामीजी ने अथक परिश्रम किया। यह 216 फीट ऊँची श्री रामानुजाचार्य की प्रतिमा, जो पंचधातु से निर्मित है, विश्व की सबसे ऊँची बैठी हुई धातु-प्रतिमाओं में से एक है। इस स्थल का नाम 'श्री रामानुज सहस्राब्दी समारोह स्थल' है।

इस परियोजना के माध्यम से स्वामीजी ने श्री रामानुजाचार्य के सामाजिक समता के संदेश को विश्वपटल पर प्रस्तुत किया। रामानुज ने बारहवीं शताब्दी में ही जाति-भेद से परे सभी वर्गों को वैष्णव दीक्षा दी थी — स्वामीजी इसी विरासत को अपने प्रत्येक कार्यक्रम में जीवंत रखते हैं।

स्वामीजी की नित्य उपासना और आध्यात्मिक साधना का स्वरूप

चिन्ना जीयर स्वामीजी की दिनचर्या श्री रामानुज सम्प्रदाय के अष्टविध-तिरुवाराधन के अनुसार नियमित रूप से आयोजित होती है। वे प्रतिदिन प्रातःकाल तिरुवाय्मोळि (नालायिर दिव्यप्रबंधम्) का पाठ करते हैं और भगवान श्री लक्ष्मीनारायण की आराधना करते हैं। दिव्यप्रबंधम् के 4000 तमिळ पद्य, जो आळ्वार संतों की रचनाएँ हैं, श्रीवैष्णव परम्परा में वेद के समतुल्य माने जाते हैं।

स्वामीजी 'शरणागति' अर्थात् प्रपत्ति को मोक्ष का सर्वोत्तम मार्ग बताते हैं, जो श्री रामानुज द्वारा श्रीभाष्य तथा गद्यत्रय में प्रतिपादित सिद्धांत है। वे अपने प्रवचनों में भगवद्गीता के 18वें अध्याय के अंतिम श्लोक 'सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज' की विशिष्टाद्वैत व्याख्या प्रस्तुत करते हुए भक्तों को आत्मसमर्पण का व्यावहारिक मार्ग दिखाते हैं।