श्री रमापत्यष्टकम् — पारायण, फलश्रुति और भावार्थ
श्री रमापत्यष्टकम् (श्री परमहंस स्वामी ब्रह्मानंद रचित) — भगवान महाविष्णु की स्तुति के आठ श्लोक, फलश्रुति और संक्षिप्त भावार्थ।

श्री रमापत्यष्टकम् (श्री परमहंस स्वामी ब्रह्मानंद रचित) — भगवान महाविष्णु की स्तुति के आठ श्लोक, फलश्रुति और संक्षिप्त भावार्थ।
श्री रमापत्यष्टकम् भगवान महाविष्णु (रमा अर्थात् लक्ष्मी के पति) की स्तुति है। भाद्रपद पूर्णिमा जैसे पुण्य दिन पर विष्णु-लक्ष्मी की आराधना करते हुए इसका पारायण अत्यंत श्रेयस्कर है। (रचना: श्री परमहंस स्वामी ब्रह्मानंद।)
श्री गणेशाय नमः ॥
जगदादिमनादिमजं पुरुषं शरदम्बरतुल्यतनुं वितनुम् । धृतकंजरथांगगदं विगदं प्रणमामि रमाधिपतिं तमहम् ॥ १ ॥
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कमलाननकंजरतं विरतं हृदि योगिजनैः कलितं ललितम् । कुजनैः सुजनैरलभं सुलभं प्रणमामि रमाधिपतिं तमहम् ॥ २ ॥
मुनिवृन्दहृदिस्थपदं सुपदं निखिलाध्वरभागभुजं सुभुजम् । हृतवासवमुख्यमदं विमदं प्रणमामि रमाधिपतिं तमहम् ॥ ३ ॥
हृतदानवदृप्तबलं सुबलं स्वजनास्तसमस्तमलं विमलम् । समपास्तगजेन्द्रदरं सुदरं प्रणमामि रमाधिपतिं तमहम् ॥ ४ ॥
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परिकल्पितसर्वकलं विकलं सकलागमगीतगुणं विगुणम् । भवपाशनिराकरणं शरणं प्रणमामि रमाधिपतिं तमहम् ॥ ५ ॥
मृतिजन्मजराशमनं कमनं शरणागतभीतिहरं दहरम् । परितुष्टरमाहृदयं सुदयं प्रणमामि रमाधिपतिं तमहम् ॥ ६ ॥
सकलावनिबिम्बधरं स्वधरं परिपूरितसर्वदिशं सुदृशम् । गतशोकमशोककरं सुकरं प्रणमामि रमाधिपतिं तमहम् ॥ ७ ॥
मथितार्णवराजरसं सरसं ग्रथिताखिललोकहृदं सुहृदम् । प्रथिताद्भुतशक्तिगणं सुगणं प्रणमामि रमाधिपतिं तमहम् ॥ ८ ॥
फलश्रुति
सुखराशिकरं भवबन्धहरं परमाष्टकमेतदनन्यमतिः । पठतीह तु योऽनिशमेव नरो लभते खलु विष्णुपदं स परम् ॥ ९ ॥
संक्षिप्त भावार्थ
यह स्तोत्र भगवान महाविष्णु की स्तुति करता है — जो जगत् के आदिकारण हैं, योगियों के हृदय में ध्यायेय हैं, शरणागतों के रक्षक करुणामूर्ति हैं। वे जन्म-मृत्यु-जरा के दुःखों को हरकर संसार-बंधनों से मुक्ति प्रदान करते हैं। फलश्रुति में कहा गया है कि जो इस अष्टक का नित्य एकाग्रचित्त से पाठ करता है, उसे परम विष्णुपद की प्राप्ति होती है।
🕉️ ॐ नमो नारायणाय — 🌺 श्री रमापतये नमः 🌺



