दामोदराष्टकम् (नमामीश्वरम्): अर्थ, श्लोक और कार्तिक मास में कैसे गाएँ
दामोदराष्टकम् पद्म पुराण से लिया गया आठ श्लोकों का स्तोत्र है जो बालकृष्ण की महिमा गाता है, जिन्हें माता यशोदा ने प्रेमपूर्वक रस्सी से कमर पर बाँध दिया था। पवित्र कार्तिक मास में घी के दीप अर्पित करते हुए प्रतिदिन गाया जाने वाला यह स्तोत्र उस प्रभु का गुणगान करता है जो शक्ति से नहीं, बल्कि शुद्ध भक्ति से वश में होते हैं।

दामोदराष्टकम् पद्म पुराण से लिया गया आठ श्लोकों का स्तोत्र है जो बालकृष्ण की महिमा गाता है, जिन्हें माता यशोदा ने प्रेमपूर्वक रस्सी से कमर पर बाँध दिया था। पवित्र कार्तिक मास में घी के दीप अर्पित करते हुए प्रतिदिन गाया जाने वाला यह स्तोत्र उस प्रभु का गुणगान करता है जो शक्ति से नहीं, बल्कि शुद्ध भक्ति से वश में होते हैं।
संक्षिप्त उत्तर: दामोदराष्टकम् पद्म पुराण के उत्तर खण्ड से आठ श्लोकों (अष्टक) का एक स्तोत्र है, जिसे सत्यव्रत मुनि ने नारद मुनि और शौनक ऋषि के साथ संवाद में कहा था। यह भगवान कृष्ण की 'दामोदर' रूप में महिमा करता है — वह बालक जिन्हें माता यशोदा ने रस्सी (दाम) से उदर (पेट) पर बाँधा। 'नमामीश्वरम् सच्चिदानन्दरूपम्' शब्दों से आरंभ होने वाला यह स्तोत्र पवित्र कार्तिक मास में, विशेषकर गौड़ीय वैष्णव और इस्कॉन परंपराओं में, दामोदर के विग्रह को घी के दीप अर्पित करते समय गाया जाने वाला प्रमुख स्तोत्र है।
वैष्णव परंपरा के सर्वाधिक प्रिय भक्ति स्तोत्रों में से एक, दामोदराष्टकम् कृष्ण भक्तों के हृदय में विशेष स्थान रखता है। पवित्र कार्तिक मास भर बढ़ती श्रद्धा के साथ पढ़ा जाने वाला यह आठ श्लोकों का प्रार्थना-स्तोत्र कृष्ण के बचपन के सबसे कोमल प्रसंगों में से एक का उत्सव मनाता है — वह क्षण जब माता यशोदा ने शिशु प्रभु को प्रेम की एक सीधी-सादी रस्सी से उनकी कमर पर बाँध दिया।
इसकी पहली ही पंक्ति, 'नमामीश्वरम् सच्चिदानन्दरूपम्', विश्व भर के मंदिरों और घरों में कार्तिक की संध्याओं की पहचान बन गई है, जिसे बालकृष्ण की छवि के सामने छोटे-छोटे घी के दीप अर्पण में उठाते हुए मधुरता से गाया जाता है।
दामोदराष्टकम् क्या है?
दामोदराष्टकम् (संस्कृत में 'दामोदर की स्तुति में आठ श्लोक') आठ श्लोकों का एक स्तोत्र है जो पद्म पुराण के उत्तर खण्ड से लिया गया है, जो हिंदू परंपरा के अठारह महापुराणों में से एक है। इसका नाम दाम (रस्सी) और उदर (पेट) से मिलकर बना है — 'वह प्रभु जिन्हें रस्सी से पेट पर बाँधा गया' — यह स्मरण कराता है कि किस प्रकार नन्हे कृष्ण को उनकी माता ने ओखली से बाँध दिया।
ये श्लोक एक पवित्र संवाद के भीतर रचे गए हैं: इन्हें सत्यव्रत मुनि ने नारद मुनि और शौनक ऋषि से कहा, कार्तिक व्रत (कार्तिक मास में पालन किए जाने वाले व्रत) की महिमा और कृष्ण के प्रति प्रेमपूर्ण भक्ति की अतुलनीय मधुरता के उपदेश के रूप में।
एक दृष्टि में मुख्य तथ्य
| पक्ष | विवरण |
|---|---|
| नाम का अर्थ | दामोदर की स्तुति में अष्टकम् (आठ श्लोक) |
| स्रोत | पद्म पुराण, उत्तर खण्ड |
| वक्ता | सत्यव्रत मुनि द्वारा नारद और शौनक से |
| श्लोकों की संख्या | आठ (8) |
| देवता | बालकृष्ण (दामोदर), यशोदा द्वारा बँधे हुए |
| मुख्य अवसर | पवित्र कार्तिक मास (दामोदर मास) |
| परंपरा | गौड़ीय वैष्णव / इस्कॉन, और वैष्णव सामान्य रूप से |
दामोदर-लीला: कृष्ण किस प्रकार बँधे
यह स्तोत्र अपना भाव श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध में वर्णित और समस्त वैष्णव साहित्य में प्रिय एक प्रसिद्ध लीला से ग्रहण करता है। गोकुल में एक प्रातःकाल, माता यशोदा स्वयं मक्खन मथ रही थीं और अपने प्यारे बालक की लीलाओं का गान कर रही थीं। शिशु कृष्ण, दूध पीने की इच्छा से, उनकी गोद में चढ़ आए; उन्होंने उन्हें स्तनपान कराने के लिए उठाया, परंतु तभी चूल्हे पर उबलते दूध का स्मरण होते ही उन्हें नीचे रखकर वे शीघ्रता से चली गईं।
अप्रसन्न होकर नन्हे कृष्ण ने एक पत्थर से मक्खन का मटका फोड़ दिया और ताजा मक्खन खाने लगे। जब यशोदा लौटीं और यह शरारत देखी, तो उन्होंने उन्हें कोमलता से अनुशासित करने के लिए एक छड़ी उठाई। बालक भागा, और वे पीछे दौड़ीं — जब तक कि, अपने ही मातृ-प्रेम के कारण, वह प्रभु जो समस्त पहुँच से परे हैं, स्वयं को पकड़े जाने देने पर सहमत न हो गए।
तब यशोदा ने उन्हें लकड़ी की ओखली से बाँधने का प्रयत्न किया। परंतु जो भी रस्सी वे लातीं वह दो अंगुल छोटी पड़ जाती — क्योंकि असीम प्रभु को किसी भी भौतिक साधन से नापा या बाँधा नहीं जा सकता। केवल तब, जब वे थक गईं और कृष्ण ने उनके सच्चे प्रेम और परिश्रम को देखा, तब वे स्वेच्छा से बँधने पर सहमत हुए। इसी लीला से उन्हें शाश्वत नाम दामोदर प्राप्त हुआ — 'वह जो पेट पर बँधे हुए हैं।'
इस कथा के हृदय में निहित शिक्षा गहन है: वह परम प्रभु, जिन्हें ब्रह्मांड की कोई शक्ति वश में नहीं कर सकती, केवल शुद्ध, निःस्वार्थ प्रेम (प्रेम) से ही जीते जाते हैं। यही वह विषय है जिसे दामोदराष्टकम् बार-बार गाता है।
प्रसिद्ध प्रारंभिक श्लोक
स्तोत्र का पहला श्लोक सबसे अधिक पढ़ा जाने वाला है। IAST लिप्यंतरण में यह इस प्रकार है:
namamishvaram sac-cid-ananda-rupam / lasat-kundalam gokule bhrajamanam / yashoda-bhiyolukhalad dhavamanam / paramrishtam atyantato drutya gopya
एक सरल अनुवाद: 'उन परम नियंता को, जिनका रूप नित्यता, ज्ञान और आनंद है; जिनके कुंडल गोकुल में शोभायमान होते हुए झूलते और चमकते हैं; जो माता यशोदा के भय से लकड़ी की ओखली से भाग रहे हैं — केवल पीछे से उस गोपी द्वारा पकड़े जाने के लिए जो और भी तीव्रता से उनके पीछे दौड़ीं — उन प्रभु को मैं अपना विनम्र प्रणाम अर्पित करता हूँ।'
इस एक ही श्लोक में संपूर्ण भाव स्थापित हो जाता है: दिव्य प्रभु (ईश्वरम्) भयभीत, भागते हुए बालक के रूप में दिखाए गए हैं, जो माता के प्रेम से पकड़े जाते हैं — सर्वशक्तिमान का छोटा और मधुर बन जाने का विरोधाभास।
मूल भाव: बल से नहीं, प्रेम से बँधे
अपने आठों श्लोकों में दामोदराष्टकम् लीला से मुड़कर भक्त के अपने हृदय की ओर आता है। कवि घोषणा करता है कि वह न मुक्ति की प्रार्थना करता है, न धन की, और न ही आध्यात्मिक जगत में निवास की — वह केवल यही माँगता है कि कमर पर रस्सी सहित दामोदर का सुंदर रूप उसके हृदय में प्रकट हो और कभी न छोड़े।
यही भक्ति का सार है जैसा परंपरा इसे समझती है: भक्ति का लक्ष्य व्यक्तिगत पुरस्कार नहीं, बल्कि प्रेमपूर्ण सेवा और प्रभु की मधुरता का निरंतर स्मरण है। यशोदा की रस्सी उस प्रेम-बंधन का प्रतीक बन जाती है जो भक्त को ईश्वर से बाँधता है।
आठ श्लोक किन विषयों को समेटते हैं
- यशोदा से भागते बालकृष्ण को प्रणाम (श्लोक 1)
- उनके अश्रुपूर्ण, दीप-प्रकाशित मुख और कमर पर रस्सी की सुंदरता (श्लोक 2)
- प्रार्थना कि समस्त ऐश्वर्य से ऊपर केवल दामोदर के प्रेममय रूप का स्मरण हो (श्लोक 3)
- निराकार मुक्ति का त्याग और कृष्ण की मधुर लीलाओं का वरण (श्लोक 4)
- उनके चरणकमलों की महिमा और कुबेर के पुत्रों पर भी दिखाई गई कृपा (श्लोक 5 से 7)
- अंतिम शरणागति और शुद्ध, अहैतुकी भक्ति की याचना (श्लोक 8)
दामोदराष्टकम् कब और कैसे गाया जाता है
दामोदराष्टकम् सबसे बढ़कर कार्तिक का स्तोत्र है — वैष्णव पंचांग का सबसे पवित्र मास, जो लगभग अक्टूबर और नवंबर में पड़ता है। कार्तिक को दामोदर मास भी कहा जाता है, दामोदर का मास, और कार्तिक व्रत का पालन कृष्ण को विशेष रूप से प्रिय माना जाता है।
सबसे प्रिय अनुष्ठान है बाल दामोदर के छोटे विग्रह या छवि को प्रतिदिन घी का दीप (दीप-दान) अर्पित करना, जो पूरे मास प्रत्येक संध्या को किया जाता है। जैसे ही दीप उठाकर प्रभु के सामने कोमलता से घुमाया जाता है, भक्त मिलकर श्लोक-दर-श्लोक दामोदराष्टकम् गाते हैं।
- बालकृष्ण (दामोदर) की छवि या विग्रह के साथ एक स्वच्छ वेदी स्थापित करें।
- शुद्ध घी और रुई की बाती से एक छोटा दीप तैयार करें, आदर्शतः संध्या समय अर्पित करें।
- दीप जलाकर प्रभु को अर्पित करें, विग्रह के सामने उसे घुमाते हुए।
- ध्यान और प्रेम के साथ दामोदराष्टकम् के आठों श्लोक गाएँ या पढ़ें।
- एक संक्षिप्त प्रार्थना अर्पित करें, यशोदा के प्रेम और कृष्ण की कृपा का स्मरण करते हुए।
- कार्तिक मास भर प्रतिदिन दोहराएँ, आदर्शतः प्रत्येक संध्या एक ही समय पर।
यद्यपि कार्तिक इस स्तोत्र का चरम काल है, अनेक भक्त इसे वर्ष भर अपनी दैनिक पूजा के अंग के रूप में पढ़ते हैं, और यह विश्व भर के गौड़ीय वैष्णव और इस्कॉन समुदायों के मंदिर कार्यक्रमों का एक मानक अंग है।
दामोदराष्टकम् पाठ के लाभ
पद्म पुराण और इस स्तोत्र को धारण करने वाली परंपरा उन लोगों के लिए महान आध्यात्मिक आशीर्वादों का वर्णन करती है जो इसे कार्तिक में भक्ति के साथ गाते हैं:
- कृष्ण के प्रति शुद्ध प्रेम (प्रेम) की गहनता, जो इस स्तोत्र का मूल लक्ष्य है।
- प्रभु को उनके सर्वप्रिय मास में दीप अर्पित करने का पावन पुण्य।
- कृष्ण की लीलाओं के सच्चे स्मरण से भौतिक बंधन से मुक्ति।
- हृदय की कोमलता, जब कोई यशोदा और उनके बालक के बीच कोमल बंधन का ध्यान करता है।
- स्थिर भक्ति का आशीर्वाद जो प्रेमपूर्ण सेवा के अतिरिक्त बदले में कुछ नहीं माँगती।
तथापि भक्त इस बात पर बल देते हैं कि यह स्तोत्र जिस सच्चे 'लाभ' की याचना स्वयं करता है वह कोई भौतिक प्राप्ति नहीं, बल्कि केवल यही है कि प्रभु का मधुर, प्रेम-बद्ध रूप प्रार्थना करने वाले के हृदय में सदा निवास करे।
कोमल भक्ति का एक स्तोत्र
दामोदराष्टकम् इसलिए चिरस्थायी है क्योंकि यह एक ऐसे सत्य को धारण करता है जिसे केवल धर्मशास्त्र नहीं कर सकता: कि अनंत ईश्वर स्वयं को एक भक्त के प्रेम से उतनी ही प्रसन्नता से थमने देते हैं जितनी प्रसन्नता से एक शिशु अपनी माता की गोद में थमा रहता है। चाहे वह किसी विशाल मंदिर में गाया जाए या घर में एक अकेले टिमटिमाते घी के दीप के पास, इसके आठ श्लोक हर हृदय को गोकुल के अंतरंग आँगन में आमंत्रित करते हैं — यशोदा को अपनी रस्सी बाँधते देखने के लिए, और यह प्रार्थना करने के लिए कि वही प्रेम की रस्सी हमें सदा प्रभु से बाँधे रखे।
जैसे-जैसे कार्तिक प्रतिवर्ष लौटता है, 'नमामीश्वरम्' की कोमल टेक असंख्य घरों में पुनः उठती है, जो समस्त हिंदू भक्ति की सबसे सुंदर लीलाओं और प्रार्थनाओं में से एक को जीवित रखती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दामोदराष्टकम् क्या है?
यह पद्म पुराण के उत्तर खण्ड से आठ श्लोकों का एक स्तोत्र है जो बालकृष्ण की दामोदर रूप में महिमा करता है — वह बालक जिन्हें माता यशोदा ने रस्सी से पेट पर बाँधा। यह विशेषकर पवित्र कार्तिक मास में गाया जाता है।
दामोदर शब्द का क्या अर्थ है?
दामोदर दाम (रस्सी) और उदर (पेट) से मिलकर बना है: 'वह जो रस्सी से पेट पर बँधे हों।' यह उस लीला की ओर संकेत करता है जिसमें माता यशोदा ने मातृ-प्रेम से शिशु कृष्ण को ओखली से बाँध दिया।
दामोदराष्टकम् किसने कहा?
पद्म पुराण के अनुसार, ये श्लोक सत्यव्रत मुनि ने नारद मुनि और शौनक ऋषि के साथ संवाद में कहे, कार्तिक व्रत की महिमा समझाते समय।
दामोदराष्टकम् में कितने श्लोक हैं?
इसमें आठ श्लोक हैं। अष्टकम् शब्द का ही अर्थ है 'आठ का समूह', जो स्तोत्र के आठ श्लोकों की ओर संकेत करता है।
दामोदराष्टकम् कब गाया जाता है?
यह मुख्यतः कार्तिक मास भर (लगभग अक्टूबर से नवंबर) गाया जाता है, जिसे दामोदर मास भी कहा जाता है, विशेषकर प्रत्येक संध्या दामोदर को घी का दीप अर्पित करते समय। अनेक भक्त इसे वर्ष भर प्रतिदिन भी पढ़ते हैं।
दामोदराष्टकम् की पहली पंक्ति क्या है?
स्तोत्र 'namamishvaram sac-cid-ananda-rupam, lasat-kundalam gokule bhrajamanam' से आरंभ होता है, जो उन परम प्रभु को प्रणाम अर्पित करता है जिनका रूप नित्यता, ज्ञान और आनंद है, जो गोकुल में सुंदरता से शोभायमान होते हैं।
दामोदराष्टकम् का मुख्य भाव क्या है?
इसका केंद्रीय भाव यह है कि वह सर्वशक्तिमान प्रभु, जिन्हें कोई बल वश में नहीं कर सकता, केवल शुद्ध, निःस्वार्थ प्रेम से ही जीते जाते हैं। भक्त मुक्ति या धन नहीं, बल्कि केवल यही प्रार्थना करता है कि कृष्ण का रस्सी-बद्ध रूप हृदय में सदा बना रहे।
इसे गाते समय घी का दीप क्यों अर्पित किया जाता है?
कार्तिक में प्रत्येक संध्या दामोदर को घी का दीप (दीप-दान) अर्पित करना कृष्ण को विशेष रूप से प्रिय माना जाता है। दामोदराष्टकम् परंपरागत रूप से इस दीप अर्पण के दौरान प्रेमपूर्ण भक्ति के कार्य के रूप में पढ़ा जाता है।



