महानवमी का महत्व: माँ दुर्गा के नवरात्रि अलंकार और महिषासुरमर्दिनी की कथा
महानवमी पर एक तेलुगु भक्तिपूर्ण लेख: नवमी शरन्नवरात्रि का मुख्य पूजा दिवस क्यों है, बाला त्रिपुरसुंदरी से लेकर महिषासुरमर्दिनी और अपराजिता तक देवी के दस अलंकार, और देवी माहात्म्य में वर्णित मधु-कैटभ, महिषासुर, शुंभ-निशुंभ तथा मातृकाओं की कथा।

महानवमी पर एक तेलुगु भक्तिपूर्ण लेख: नवमी शरन्नवरात्रि का मुख्य पूजा दिवस क्यों है, बाला त्रिपुरसुंदरी से लेकर महिषासुरमर्दिनी और अपराजिता तक देवी के दस अलंकार, और देवी माहात्म्य में वर्णित मधु-कैटभ, महिषासुर, शुंभ-निशुंभ तथा मातृकाओं की कथा।
महानवमी 2026: भारत में महा नवमी सोमवार, 19 अक्टूबर 2026 को और विजयादशमी मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026 को है (द्रिक पंचांग)। बंगाल में दुर्गा पूजा की महा नवमी मंगलवार, 20 अक्टूबर को पड़ती है। पूजा मुहूर्त और दोनों तिथियों की व्याख्या के लिए देखें महा नवमी 2026: तिथि, पूजा और महत्व।
दशहरा और शरन्नवरात्रि
दशहरा वह पर्व है जिसमें आश्वयुज शुद्ध पाड्यमी (प्रतिपदा) से नवमी तक नौ दिनों तक प्रतिदिन माँ दुर्गा की एक अलग अलंकार (श्रृंगार) में पूजा की जाती है। दशहरा देशभर में हिंदुओं द्वारा मनाए जाने वाले प्रमुख त्योहारों में से एक है। यह नौ दिनों का पर्व है, आंतरिक आध्यात्मिक शक्ति को सुदृढ़ करने वाली साधना का और परमात्मा की उपासना का पर्व। चूँकि यह जगन्माता की उपासना का पर्व है, इसलिए इसे शरन्नवरात्रि या देवी नवरात्रि कहा जाता है। दसवाँ दिन विजयादशमी है। शरन्नवरात्रि नाम इसलिए पड़ा क्योंकि यह पर्व शरद ऋतु के आरंभ में आता है। कुछ परिवार पहले तीन दिन माँ पार्वती की, अगले तीन दिन माँ लक्ष्मी की और अंतिम तीन दिन माँ सरस्वती की पूजा करते हैं। दशहरे में गुड़ियों की झाँकी (बोम्मला कोलुवु) सजाना भी एक पुरानी परंपरा है।
नवमी मुख्य पूजा दिवस क्यों है
नवमी तिथि को महानवमी या महा नवमी कहा जाता है। देवी उपासना में इस दिन का सर्वोच्च स्थान है। परंपरा के अनुसार नवरात्रि की सारी मुख्य पूजा नवमी को ही संपन्न होती है; दसवें दिन, विजयादशमी को, केवल पुनः पूजा (समापन पूजा) और उद्वासन (विधिवत विदाई) की जाती है। नौ की संख्या पूर्णता का प्रतीक है, इसलिए नौ रातों में उपासना करने का अर्थ है परमात्मा की पूर्ण उपासना। नवरात्रि का अर्थ है नई रात्रि, नवीन रात्रि। नौ दिनों की दीक्षा से दसवें दिन विजय प्राप्त होती है; अर्थात नौ दिनों की दीक्षा फलित होती है। इसीलिए हम दसवें दिन को विजयादशमी पर्व के रूप में मनाते हैं।
नवमी को देवी का महिषासुरमर्दिनी रूप में अलंकार कर पूजन किया जाता है। माँ ने लोकों को पीड़ा देने वाले असुर महिषासुर से नौ रातों तक लंबा युद्ध किया और इसी नवमी को उसका वध कर विजय प्राप्त की। इसीलिए भक्तों का विश्वास है कि इस दिन माँ की शक्ति अपने चरम पर होती है।
जगन्माता के अनेक नाम
जगन्माता आदि पराशक्ति की महिमा और वैभव का वर्णन देवी भागवत, मार्कंडेय पुराण तथा अनेक अन्य पुराणों और उपनिषदों में मिलता है, और त्रिपुरा रहस्य इसका विस्तार से वर्णन करता है। सब माताओं की माता और तीनों माताओं की मूल माता के रूप में पूजी जाने वाली जगन्माता दुर्गम्मा अनगिनत नामों से पूजी जाती हैं: महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती, दुर्गा, पार्वती, हैमवती, अपराजिता, भवानी, ललिता, जयंती, मंगला, भद्रकाली, कपालिनी, क्षमा, शिवदूती, स्वाहा, स्वधा, चामुंडी, विष्णुपत्नी, ईश्वरी और अनेक अन्य।
नवरात्रि व्रत और देवी के दस अलंकार
नवरात्रि व्रत वह संकल्प है जो दैवी कृपा, मंत्र शक्ति और अनुशासित जीवन के द्वारा हमारे भीतर की शक्ति, हमारी शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक शक्ति को जागृत करता है। इसीलिए दशहरा नवरात्रि में आश्वयुज शुद्ध पाड्यमी से दशमी तक दस दिनों में हम जगन्माता की बाला त्रिपुरसुंदरी के रूप में, गायत्री माता के रूप में, अन्नपूर्णा देवी के रूप में, श्री महालक्ष्मी देवी के रूप में, श्री ललिता त्रिपुरसुंदरी देवी के रूप में, श्री राजराजेश्वरी देवी के रूप में, सप्तमी को श्री महासरस्वती देवी के रूप में, अष्टमी को दुर्गा माता के रूप में, नवमी को महिषासुरमर्दिनी के रूप में, और दशमी को जया-विजया सहित अपराजिता देवी तथा राजराजेश्वरी देवी के रूप में पूजा करते हैं।
| दिन (तिथि) | देवी का अलंकार |
|---|---|
| दिन 1 (पाड्यमी) | श्री बाला त्रिपुरसुंदरी |
| दिन 2 (विदिया) | श्री गायत्री देवी |
| दिन 3 (तदिया) | श्री अन्नपूर्णा देवी |
| दिन 4 (चविति) | श्री महालक्ष्मी देवी |
| दिन 5 (पंचमी) | श्री ललिता त्रिपुरसुंदरी देवी |
| दिन 6 (षष्ठी) | श्री राजराजेश्वरी देवी |
| दिन 7 (सप्तमी) | श्री महासरस्वती देवी |
| दिन 8 (अष्टमी) | दुर्गा माता |
| दिन 9 (नवमी) | महिषासुरमर्दिनी |
| दिन 10 (दशमी) | जया-विजया सहित अपराजिता देवी; राजराजेश्वरी देवी |
टिप्पणी: अलंकारों का क्रम मंदिर और क्षेत्र के अनुसार बदलता है, और तिथि के बढ़ने या घटने पर कुछ दिन आगे-पीछे हो सकते हैं। विजयवाड़ा (Vijayawada) के इंद्रकीलाद्रि पर कनक दुर्गा मंदिर हर वर्ष अपनी अलंकार सूची घोषित करता है; देखें हमारी कनक दुर्गा मंदिर मार्गदर्शिका।
शिव और शक्ति एक हैं
जगन्माता परमेश्वर की संकल्प शक्ति हैं। उसी संकल्प से सृष्टि, स्थिति और लय सब कुछ होता है। यदि आदि पराशक्ति प्रकृति हैं, तो परमात्मा पुरुष हैं। प्रकृति और पुरुष के मिलन से सृष्टि उत्पन्न होती है; अर्थात संपूर्ण ब्रह्मांड शिव-पार्वती की लीला का प्रकटीकरण है। हम उन्हें ईश्वर के रूप में पूजें, विष्णु के रूप में या जगन्माता अंबिका के रूप में, शक्ति एक ही है, जैसा उपनिषद हमें सिखाते हैं। उसी एक शक्ति, शुद्ध चैतन्य की शक्ति (चित्-शक्ति) की हम माँ के रूप में, जगन्माता के रूप में उपासना करते हैं। चंडी सप्तशती में माँ की स्तुति महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती के रूप में दुष्ट असुरों का संहार करने के लिए की गई है।
देवी माहात्म्य: मधु-कैटभ और महिषासुरमर्दिनी
माँ ने देवताओं को आश्वासन दिया कि जब भी वे दुष्ट असुरों से पीड़ित होंगे, वे अवतार लेकर दुष्टों को दंड देंगी। माँ ने श्री महाविष्णु को योगनिद्रा से जगाया और मधु तथा कैटभ नामक असुरों का वध करवाया। जब असुर महिषासुर ने देवताओं को जीतकर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया, तब देवता ब्रह्मा जी के साथ श्री महाविष्णु और रुद्र के पास गए और महिषासुर के अत्याचारों का वर्णन किया। यह सुनकर शिव और केशव धर्मसंगत क्रोध से भर उठे। वह क्रोध आकार लेकर तेज के रूप में प्रकट हुआ। सभी देवताओं के मुखों से तेज निकला, और वह संयुक्त तेज एक अद्भुत रूप में परिणत होकर आठ भुजाओं वाली महालक्ष्मी देवी, आदि पराशक्ति के रूप में प्रकाशित हुआ।
देवताओं ने इस माँ की स्तुति की: "अम्मा! सब कुछ का कारण केवल आप ही हैं; आप कारण और कार्य का स्वरूप हैं, क्रिया का स्वरूप हैं; आपके बिना कुछ भी नहीं है; सब कुछ आपके भीतर है, माँ।" शक्ति के बिना शिव भी कुछ नहीं कर सकते; कहा जाता है कि वे हिल भी नहीं सकते। शक्ति के बिना न गति है, न प्रतिक्रिया: इसी प्रकार जगद्गुरु श्री आदि शंकर भगवत्पाद ने सौंदर्य लहरी में माँ की स्तुति की। उन्होंने असुर महिषासुर का वध किया और महिषासुरमर्दिनी के रूप में महिमामंडित हुईं।
नवमी को उनकी स्तुति का पाठ करने के लिए देखें अर्थ सहित महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र और हमारी देवी माहात्म्य मार्गदर्शिका।
शुंभ-निशुंभ और मातृकाएँ
धूम्राक्ष, रक्तबीज, चंड और मुंड, तथा शुंभ और निशुंभ जैसे असुरों का वध भी जगन्माता ने ही किया। इन सभी असुरों ने ब्रह्मा जी और परमेश्वर की तपस्या कर वरदान प्राप्त किए थे। उन्होंने ऐसे वर पा लिए थे जिनसे उन्हें देवताओं का कोई भय नहीं रहा। परंतु वे स्त्रियों को तुच्छ समझते थे: "स्त्रियाँ हमारा क्या बिगाड़ सकती हैं!" यही स्त्रियों के प्रति उनका तिरस्कारपूर्ण भाव था। इसीलिए माँ ने अपने भीतर से ब्राह्मी, वैष्णवी, माहेश्वरी, कौमारी, ऐंद्री, वाराही, नारसिंही, चामुंडा, श्यामला और काली जैसी देवियों के समूह प्रकट किए, उनके साथ मिलकर असुरों से युद्ध किया और सभी असुरों का संहार किया। चूँकि माँ ने इन्हीं नवरात्रि के दिनों में इन सभी दुष्ट असुरों का नाश किया, इसलिए नवरात्रि में हम उनके अनेक रूपों और अवतारों की स्तुति और पूजा करते हैं।
नवमी पूजा से पहले अनेक परिवार पढ़ते हैं दुर्गाष्टमी, महा नवमी और विजयादशमी पूजा संकल्प।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
महानवमी का क्या महत्व है?
महानवमी (महा नवमी) शरन्नवरात्रि की नवमी तिथि है और देवी उपासना में इसका सर्वोच्च स्थान है। परंपरा के अनुसार नवरात्रि की मुख्य पूजा नवमी को ही की जाती है, और महिषासुर पर माँ की विजय का स्मरण करते हुए देवी की महिषासुरमर्दिनी रूप में आराधना की जाती है। दसवाँ दिन, विजयादशमी, नौ दिनों की साधना के फल का उत्सव है।
2026 में महा नवमी कब है?
भारत में महा नवमी सोमवार, 19 अक्टूबर 2026 को और विजयादशमी मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026 को है (द्रिक पंचांग)। बंगाल में द्रिक पंचांग के दुर्गा पूजा कैलेंडर के अनुसार महा नवमी मंगलवार, 20 अक्टूबर को है। USA, कनाडा और UK में भी महा नवमी सोमवार, 19 अक्टूबर को है।
नवमी को देवी की किस अलंकार में पूजा होती है?
यहाँ वर्णित तेलुगु परंपरा में नवमी को देवी का महिषासुरमर्दिनी के रूप में अलंकार कर पूजन किया जाता है। अलंकारों का क्रम मंदिर और क्षेत्र के अनुसार बदलता है, इसलिए अपने मंदिर की समय-सारणी अवश्य देखें।
देवी के दस नवरात्रि अलंकार कौन-से हैं?
इस लेख के अनुसार: बाला त्रिपुरसुंदरी, गायत्री, अन्नपूर्णा, श्री महालक्ष्मी, श्री ललिता त्रिपुरसुंदरी, श्री राजराजेश्वरी, सप्तमी को श्री महासरस्वती, अष्टमी को दुर्गा, नवमी को महिषासुरमर्दिनी, और दशमी को जया-विजया सहित अपराजिता देवी, जिनकी राजराजेश्वरी के रूप में भी पूजा होती है।
मुख्य पूजा विजयादशमी के बजाय नवमी को क्यों की जाती है?
परंपरा के अनुसार नवरात्रि की मुख्य पूजा नवमी को पूर्ण हो जाती है, और विजयादशमी को केवल पुनः पूजा (समापन पूजा) और उद्वासन (देवी की विधिवत विदाई) की जाती है। नौ की संख्या पूर्णता का प्रतीक है, इसलिए नौ रातों की उपासना को परमात्मा की पूर्ण उपासना माना जाता है।
संपादकीय टिप्पणी (19 अक्टूबर 2026)
यह लेख HinduTone को तेलुगु में भेजा गया था। तेलुगु संस्करण ही मूल है; यह पृष्ठ उसका निष्ठापूर्ण अनुवाद है। हमने केवल हल्के संपादन किए हैं: एक वर्तनी सुधार, एक अतिशयोक्ति को नरम करके "प्रमुख त्योहार" किया गया, "हिंदू शास्त्रों के अनुसार" वाले कथनों को परंपरा के रूप में प्रस्तुत किया गया, अनुभाग शीर्षक, 2026 की तिथियाँ, अलंकारों की एक तालिका और यह टिप्पणी जोड़ी गई कि उनका क्रम मंदिर और क्षेत्र के अनुसार बदलता है। तिथियाँ द्रिक पंचांग से ली गई हैं।
अंतिम अपडेट: 19 अक्टूबर 2026।
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