एकादशी के मंत्र और व्रत के लिए विष्णु स्तोत्र
एकादशी पर पारंपरिक रूप से जपे जाने वाले विष्णु मंत्रों और स्तोत्रों का सरल, श्रद्धापूर्ण मार्गदर्शन — अर्थ और सही अवसरों सहित।

एकादशी पर पारंपरिक रूप से जपे जाने वाले विष्णु मंत्रों और स्तोत्रों का सरल, श्रद्धापूर्ण मार्गदर्शन — अर्थ और सही अवसरों सहित।
संक्षिप्त उत्तर: एकादशी पर भक्त सरल जप और स्तोत्रों के द्वारा मन को भगवान विष्णु में लगाते हैं। सबसे प्रचलित हैं ॐ नमो नारायणाय, विष्णु के प्रणाम-वचन, द्वादश-नाम और विष्णु सहस्रनाम का श्रद्धापूर्ण पाठ। शुद्ध शरीर और शांत मन से, धीरे-धीरे, प्रातः और सायं जपना उत्तम है।
एकादशी प्रत्येक पक्ष का ग्यारहवाँ तिथि है, जो भगवान विष्णु को समर्पित है। उपवास और जागरण के अतिरिक्त व्रत का हृदय है स्मरण — नामों और स्तुतियों के द्वारा मन को बार-बार नारायण की ओर मोड़ना। यह लेख सबसे अधिक जपे जाने वाले, सार्वजनिक-क्षेत्र के विष्णु मंत्रों और स्तोत्रों को उनके अर्थ और उपयुक्त अवसरों सहित प्रस्तुत करता है।
इनके लिए संस्कृत का पंडित होना आवश्यक नहीं। मुख्य है श्रद्धा, शुद्ध शरीर और स्थान, तथा शांत, अटूट पुनरावृत्ति। यदि कोई अपरिचित श्लोक ठीक से न आता हो, तो लंबे पाठ पर जोर लगाने के बजाय एक छोटा, अच्छी तरह याद नाम जपना अधिक अच्छा है।
- देवता: भगवान विष्णु (नारायण)
- अवसर: एकादशी (ग्यारहवीं तिथि), मास में दो बार
- मुख्य साधना: जप और स्तोत्र-पाठ
- श्रेष्ठ समय: ब्रह्म-मुहूर्त / सूर्योदय और सायं (प्रदोष)
- सरलतम मंत्र: ॐ नमो नारायणाय
- महान ग्रंथ: विष्णु सहस्रनाम (हजार नाम)
ॐ नमो नारायणाय
यह विष्णु का सबसे प्रिय और सुलभ मंत्र है, जिसे अष्टाक्षर (आठ अक्षरों वाला) मंत्र कहते हैं। यह नारायण को प्रणाम अर्पित करता है — जो सबके हृदय में निवास करते हैं और जिनमें समस्त प्राणी विश्राम पाते हैं। इसे तुलसी की माला पर एकादशी भर धीरे-धीरे जितनी बार चाहें जप सकते हैं।
छोटा और कोमल होने से यह नए साधकों, वृद्धजनों और व्यस्त गृहस्थों के लिए उपयुक्त है। कई लोग मालाओं की गिनती रखते हैं, परन्तु दैनिक कार्य करते हुए भीतर-भीतर सतत स्मरण भी व्रत के अनुकूल माना जाता है।
कैसे जपें
- स्नान के पश्चात पूर्व दिशा या घर के मंदिर की ओर मुख करके बैठें।
- यदि संभव हो तो दीप जलाएँ और विष्णु की मूर्ति के सम्मुख तुलसी-पत्र रखें।
- 'ॐ नमो नारायणाय' धीरे-धीरे जपें, प्रत्येक अक्षर को मन में बैठने दें।
- माला हो तो उसका उपयोग करें; अन्यथा भीतर सरल गिनती रखें।
- अंत में प्रणाम कर भक्ति की याचना करें, भौतिक फल की नहीं।
द्वादश-नाम — विष्णु के बारह नाम
विष्णु के बारह नाम (द्वादश-नाम) एक छोटी, प्रभावशाली प्रणाम-माला है, जिसे परंपरा से प्रातः-सायं जपा जाता है और एकादशी पर विशेष रूप से प्रिय है। प्रत्येक नाम 'ॐ ... नमः' के साथ अर्पित होता है, केशव से आरंभ होकर भगवान के प्रसिद्ध रूपों तक।
| नाम | भाव / संबंध |
|---|---|
| केशव | सुंदर केशों वाले; केशी के संहारक |
| नारायण | समस्त प्राणियों के आश्रय और निवास |
| माधव | लक्ष्मीपति; माधुर्य-स्वरूप |
| गोविंद | गौ, पृथ्वी और वेदों के रक्षक |
| विष्णु | सर्वव्यापी |
| मधुसूदन | मधु दैत्य के संहारक |
| त्रिविक्रम | तीन पगों में लोकों को नापने वाले |
| वामन | वामन अवतार |
| श्रीधर | वक्षस्थल पर श्री (लक्ष्मी) को धारण करने वाले |
| हृषीकेश | इंद्रियों के स्वामी |
| पद्मनाभ | जिनकी नाभि से सृष्टि-कमल प्रकट हुआ |
| दामोदर | माता यशोदा के प्रेम से कमर में बँधे |
एक साथ पढ़े जाने पर ये बारह नाम एक संक्षिप्त नित्य-स्मरण बन जाते हैं। एकादशी पर ये स्वाभाविक केंद्र हैं — याद रखने में सरल और अर्थ में समृद्ध।
विष्णु सहस्रनाम — श्रद्धा के साथ वर्णित
विष्णु सहस्रनाम विष्णु के हजार नामों का प्रसिद्ध स्तोत्र है, जो महाभारत से लिया गया है, जहाँ भीष्म पितामह इसे युधिष्ठिर को कहते हैं। प्रत्येक नाम भगवान के किसी गुण की एक झलक है — रक्षक, पालक, अविनाशी, सबकी अंतरात्मा। यह भारत भर में सर्वाधिक पढ़े जाने वाले स्तोत्रों में से एक है और एकादशी व अन्य वैष्णव दिनों पर विशेष शुभ माना जाता है।
आदर के कारण और किसी त्रुटि से बचने के लिए यह लेख यहाँ हजार नामों को नहीं दोहराता। कृपया विष्णु सहस्रनाम किसी विश्वसनीय, पूर्ण प्रकाशित पाठ से अथवा अनुभवी गुरु के साथ पढ़ें, ताकि क्रम और उच्चारण सही रहे। कई परिवार आरंभिक ध्यान-श्लोकों से प्रारंभ करते हैं, फिर नामों का पाठ करते हैं और अंत में फल-श्रुति पढ़ते हैं।
- पहले किसी विश्वसनीय मुद्रित संस्करण या योग्य गुरु से सीखें।
- बिना जल्दबाजी जपें; उच्चारण की शुद्धता गति से अधिक महत्वपूर्ण है।
- यदि पूरा पाठ लंबा हो, तो ध्यान-श्लोक और प्रतिदिन एक भाग पढ़ें, धीरे-धीरे बढ़ाएँ।
- पाठ करते समय विष्णु के सम्मुख तुलसी-पत्र और दीप रखें।
एकादशी पर अन्य प्रचलित स्तोत्र
- समय कम हो तो छोटे नाम-स्तोत्र।
- मधुराष्टकम् — भगवान (कृष्ण) की मधुरता पर मधुर स्तुति।
- अच्युताष्टकम् — अच्युत भगवान की स्तुति में आठ श्लोक।
- सरल भजन और दिव्य नामों का महामंत्र — सतत स्मरण हेतु।
उपवास पर एक कोमल बात
व्रत भक्ति के लिए है, केवल त्याग के लिए नहीं। किसी भी रोगी, तथा गर्भवती या स्तनपान कराने वाली, वृद्ध, दवा लेने वाले या अस्वस्थ व्यक्ति को चिकित्सक से परामर्श करना चाहिए और उपवास आवश्यक नहीं; केवल स्मरण और जप ही पर्याप्त है। कोई निश्चित भौतिक फल नहीं — व्रत का फल है अधिक स्थिर, अधिक भक्तिमय मन।
दिन में जप को कैसे स्थान दें
- प्रातः स्नान और एकादशी पालन के लिए एक शांत संकल्प से आरंभ करें।
- प्रातः ॐ नमो नारायणाय और बारह नामों का जप करें।
- दिनभर कार्य करते हुए भीतर नाम को जीवित रखें।
- सायं (प्रदोष) में विष्णु सहस्रनाम या मधुराष्टकम् जैसा स्तोत्र पढ़ें।
- अगले प्रातः अपने स्थानीय पंचांग के सही पारण समय पर व्रत खोलें।
अपनी एकादशी के ठीक पारण-समय के लिए सदैव किसी विश्वसनीय स्थानीय पंचांग से पुष्टि करें, क्योंकि यह आपके अपने सूर्योदय और तिथि की समाप्ति पर निर्भर करता है।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
नए साधक के लिए एकादशी पर कौन-सा मंत्र सर्वोत्तम है?
ॐ नमो नारायणाय सबसे सरल और प्रिय है। यह छोटा, कोमल है और दिनभर धीरे-धीरे जपा जा सकता है। लंबाई से अधिक श्रद्धा और अटूट पुनरावृत्ति मायने रखती है।
क्या मैं एकादशी पर विष्णु सहस्रनाम पढ़ सकता हूँ?
हाँ, यह विशेष शुभ है। किसी विश्वसनीय पूर्ण पाठ से या गुरु के साथ पढ़ें ताकि क्रम और उच्चारण सही रहे, अच्छा हो प्रातः या सायं दीप और तुलसी के साथ।
यह लेख हजार नाम क्यों नहीं छापता?
आदर के कारण और पवित्र पाठ में किसी त्रुटि से बचने के लिए हम विष्णु सहस्रनाम का वर्णन करते हैं, उसे दोहराते नहीं। कृपया विश्वसनीय प्रकाशित संस्करण या योग्य गुरु से सीखें।
विष्णु के बारह नाम कौन-से हैं?
द्वादश-नाम हैं केशव, नारायण, माधव, गोविंद, विष्णु, मधुसूदन, त्रिविक्रम, वामन, श्रीधर, हृषीकेश, पद्मनाभ और दामोदर — 'ॐ ... नमः' के साथ प्रातः-सायं अर्पित।
जपने के लिए माला या संस्कृत ज्ञान आवश्यक है?
नहीं। तुलसी-माला गिनती में सहायक है, पर भीतरी गिनती भी ठीक है। संस्कृत का पांडित्य आवश्यक नहीं; श्रद्धा, शुद्ध शरीर-स्थान और शांत पुनरावृत्ति ही मुख्य हैं।
एकादशी में जप कब करें?
परंपरा से प्रातः सूर्योदय के आसपास और पुनः सायं (प्रदोष) में। इसके अतिरिक्त दैनिक कार्य करते हुए भीतर नाम को जीवित रखें।
क्या इन मंत्रों को जपने के लिए उपवास आवश्यक है?
नहीं। जप सबके लिए खुला है। किसी रोगी, गर्भवती, स्तनपान कराने वाली, वृद्ध, दवा लेने वाले या अस्वस्थ व्यक्ति को चिकित्सक से परामर्श करना चाहिए और उपवास आवश्यक नहीं; स्मरण और जप पर्याप्त हैं।
एकादशी पर जप के बाद व्रत कब खोलें?
अगले प्रातः सही पारण-अवधि में, जो आपके स्थानीय सूर्योदय और तिथि की समाप्ति पर निर्भर करती है। सही समय सदैव विश्वसनीय स्थानीय पंचांग से पुष्टि करें।

