मदुरै के हृदय में, सहस्राब्दियों पुरानी नगरी में, चौदह गोपुरमों के साथ खड़ा एक अद्वितीय मंदिर है। यह मीनाक्षी सुंदरेश्वरर मंदिर है — योद्धा रानी मीनाक्षी देवी और उनके पति सुंदरेश्वरर (शिव) मदुरै के जीवित शासकों के रूप में जहाँ विराजते हैं।

मीनाक्षी का दिव्य उद्भव

तिरुविलैयादल पुराण कहता है कि पांड्य राजा मलयध्वज की यज्ञवेदी से तीन स्तनों वाली, मीन (मछली) जैसी आँखों वाली दिव्य कन्या प्रकट हुई। उसने केवल राज्य नहीं — आठ दिशाएँ जीतीं। कैलाश पर्वत पर शिव से मिलने के क्षण उसका तीसरा स्तन विलीन हो गया। शिव सुंदरेश्वरर के रूप में मदुरै उतरे, और मीनाक्षी उनकी पत्नी बनकर शाश्वत रानी हुईं।

चौदह गोपुरम और हजार स्तंभों का हाल

  • चौदह गोपुरम 33,000 मूर्तियों के साथ — हिंदू पुराणों का पत्थर पुस्तकालय।
  • 985 स्तंभों का हाल — हर स्तंभ अलग, कुछ छूने पर घंटियों जैसे बजते हैं।
  • स्वर्ण कमल सरोवर — संगम कवियों ने यहाँ अपनी रचनाओं को परखा था।
  • मीनाक्षी का स्वयंभू हरित-पाषाण विग्रह — तोता और कमल लिए हुए।
  • हर रात्रि सुंदरेश्वरर पालकी में मीनाक्षी के शयन कक्ष ले जाए जाते हैं।

दैनिक अनुष्ठान

छह पूजाएँ दिन को रचती हैं, अंतिम पल्लियरै पूजा रात्रि 10:00 पर — जिसमें सुंदरेश्वरर अपनी पत्नी के शयन कक्ष में जाते हैं। यह परंपरा दो हजार वर्षों से अटूट है।

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चित्तिरै तिरुकल्याणम: करोड़ों के साक्ष्य में

प्रति वर्ष चित्तिरै मास (अप्रैल-मई) में मदुरै 12 दिनों तक मीनाक्षी-सुंदरेश्वरर के विवाह का पुनर्निर्माण करता है। विष्णु (अलगर रूप में) अपनी बहन को कन्यादान करते हैं। प्रति वर्ष दस लाख श्रद्धालु इसे देखने आते हैं।

देवी के चमत्कार

बोलने वाली मूर्ति: 14वीं शताब्दी में, जब एक राजा ने मंदिर भूमि घटाने का आदेश दिया, तो मीनाक्षी की मूर्ति स्वयं बोली और आदेश को अस्वीकार कर दिया — ताड़पत्र इतिहास इसे दर्ज करता है।

सल्तनत से सुरक्षा: 1310 में मदुरै पर आक्रमण के समय पुजारियों ने मुख्य विग्रह को 40 वर्षों तक छिपाए रखा। विजयनगर सम्राटों के पुनर्स्थापन पर मूर्ति बिना खरोंच के लौटी।

मीनाक्षी अम्मन तुणै। ॐ नमः शिवाय।