कामाख्या: असम में तांत्रिक देवी के दिव्य रहस्य और चमत्कार
सती की योनि जहाँ गिरी, ब्रह्मपुत्र तट पर रक्तस्रावी मातृ-देवी, तांत्रिक परंपरा का स्रोत — गुवाहाटी की कामाख्या।

सती की योनि जहाँ गिरी, ब्रह्मपुत्र तट पर रक्तस्रावी मातृ-देवी, तांत्रिक परंपरा का स्रोत — गुवाहाटी की कामाख्या।
गुवाहाटी में ब्रह्मपुत्र के तट पर नीलाचल पहाड़ी पर — हिंदू धर्म का सर्वाधिक अद्वितीय देवी मंदिर खड़ा है। कामाख्या — योनि पीठ, गर्भ-शरण, रक्तस्रावी माँ — वह शक्ति पीठ जहाँ सती की योनि भूमि पर गिरी। गर्भगृह में कोई मूर्ति नहीं। देवी एक योनि-आकार की प्राकृतिक शिला के रूप में पूजित — जो प्रति जून के तीन दिन लाल जल से बहती है, जिसे भक्त देवी का स्वयं रजस्वला मानते हैं।
सती की योनि जहाँ गिरी
देवी भागवत, स्कंद पुराण, कालिका पुराण — सभी एक मूल घटना का वर्णन करते हैं। दक्ष की पुत्री सती ने पिता की अनुमति के बिना शिव से विवाह किया। दक्ष ने यज्ञ में शिव को न बुलाया; अपमानित सती ने यज्ञ-अग्नि में आत्मदाह किया। शोकाकुल शिव ने उनके शरीर को उठाकर तांडव शुरू किया। विष्णु ने सुदर्शन चक्र से शरीर को टुकड़ों में बाँटा; जहाँ-जहाँ अंग गिरे, वहाँ शक्ति पीठ बने — 51 स्थान भारतीय उपमहाद्वीप में फैले।
सती की योनि असम के नीलाचल पर्वत पर गिरी। वहाँ देवी कामाख्या रूप में पुनः प्रकट हुईं — "काम" (इच्छा) + "आख्या" (नाम-ज्ञात)। 51 पीठों में योनि गिरने का यह एकमात्र स्थान है।
रक्तस्रावी योनि
कामाख्या में मूर्तियाँ नहीं हैं। भूगर्भीय गर्भगृह में भक्त सीढ़ियाँ उतरते हैं; एक लगभग छह इंच चौड़ी योनि-आकार की शिला तक पहुँचते हैं — भूगर्भ झरने से सदा गीली। यही देवी का स्वयं-प्रकट रूप है।
- सन्निधि में मानवाकार मूर्ति नहीं — मात्र प्राकृतिक योनि-शिला।
- प्रति जून तीन दिन (अंबुबाची मेला) झरना लाल बहता है; मंदिर बंद रहता है।
- नीलाचल शैली का बीहाइव-आकार मुख्य मंदिर।
- दस महाविद्याओं के दस उप-मंदिर मुख्य सन्निधि को घेरते हैं।
अंबुबाची मेला: जब देवी रजस्वला होती हैं
प्रति वर्ष जून 22-25 के दौरान, देवी योनि के नीचे भूगर्भीय झरना लाल बहता है। भक्त इसे देवी का स्वयं रजस्वला मानते हैं; मंदिर तीन दिन बंद रहता है। करोड़ों श्रद्धालु, नाग साधु, अघोरी, और तांत्रिक विद्वान एकत्रित होते हैं। चौथे दिन मंदिर खुलता है; लाल वस्त्र हज़ारों टुकड़ों में काटकर प्रसाद के रूप में बाँटा जाता है।
चमत्कार
रक्तस्रावी झरना: 500 से अधिक वर्षों से लगातार दर्ज, झरने का वार्षिक लाल बहाव अद्भुत है।
कलापहाड़ से बचाव: 1565 में कलापहाड़ ने मूल मंदिर नष्ट किया। पर सैनिक योनि-शिला को नहीं खोद सके; भूमि अस्थिर हो गई। 1565 में नरनारायण ने अक्षत योनि पर मंदिर पुनर्निर्मित किया।
स्त्रीत्व का मूल स्थल
कामाख्या सनातन धर्म का अटूट कथन है: स्त्रीत्व रूपक नहीं, काव्य नहीं — ब्रह्मांड की मूल-शक्ति। रजस्वला अपवित्र नहीं, सृजनशील है। स्त्री-देह देवी-देह है।
जय माँ कामाख्या। ॐ नमः शिवायै।




