मद्रास उच्च न्यायालय के निर्देश के बाद 1 अक्टूबर, 2024 को 150 पुलिसकर्मियों ने कोयंबटूर में ईशा फाउंडेशन आश्रम में व्यापक तलाशी ली। न्यायालय ने पुलिस से अनुरोध किया था कि वह फाउंडेशन से जुड़े सभी मामलों के रिकॉर्ड एकत्र करके पेश करे। वरिष्ठ अधिकारियों सहित पुलिस दल थोंडामुथुर में आश्रम में निवासियों और उनके रहने की व्यवस्था की जांच करने पहुंचा। जांच का ध्यान आश्रम में रहने वाले लोगों, स्वयंसेवकों सहित, के विवरण की पुष्टि करने और उनकी जीवनशैली और रहने के तरीके को समझने पर केंद्रित था। ईशा फाउंडेशन ने अपने बयान में स्पष्ट किया कि यह न्यायालय के निर्देशानुसार पुलिस द्वारा की गई सामान्य जांच का हिस्सा था। फाउंडेशन ने इस बात पर जोर दिया कि कोई कदाचार नहीं था, बल्कि नियमित जांच और पूछताछ थी। पुलिस की यह कार्रवाई एक सेवानिवृत्त प्रोफेसर द्वारा न्यायालय में लाए गए मामले के बाद की गई, जिन्होंने दावा किया था कि उनकी बेटियों को आश्रम में स्थायी रूप से रहने के लिए कथित रूप से प्रभावित किया गया था। जवाब में, न्यायालय ने चिंता जताई और ईशा फाउंडेशन के नेता सद्गुरु से आश्रम की प्रथाओं, विशेष रूप से युवतियों के साथ व्यवहार के बारे में सवाल किए। न्यायमूर्ति एस एम सुब्रमण्यम और न्यायमूर्ति वी शिवगनम की पीठ ने ईशा फाउंडेशन के संस्थापक से यह सवाल किया। सेवानिवृत्त प्रोफेसर एस कामराज (69) ने आरोप लगाया था कि उनकी दो बेटियों का ईशा योग केंद्र में स्थायी रूप से रहने के लिए “ब्रेनवॉश” किया गया है।

कोयंबटूर में तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्रोफेसर कामराज ने दावा किया कि उनकी दो पढ़ी-लिखी बेटियों का ईशा योग केंद्र में स्थायी रूप से रहने के लिए “ब्रेनवॉश” किया गया है।

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मद्रास उच्च न्यायालय ने किस आधार पर यह जांच आदेश दी?

मद्रास उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने सेवानिवृत्त प्रोफेसर एस कामराज की याचिका को संज्ञान में लेते हुए पुलिस को निर्देश दिया कि वह ईशा फाउंडेशन आश्रम में रहने वाले सभी व्यक्तियों का विवरण एकत्र करे। न्यायालय ने विशेष रूप से यह जानना चाहा कि क्या वहाँ रहने वाले लोग स्वेच्छा से निवास कर रहे हैं या किसी दबाव में।

न्यायमूर्ति एस एम सुब्रमण्यम और न्यायमूर्ति वी शिवगनम की पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि यह कोई आपराधिक छापेमारी नहीं, बल्कि तथ्य-संग्रह की प्रक्रिया है। न्यायालय ने राज्य पुलिस को रिपोर्ट प्रस्तुत करने का आदेश देते हुए फाउंडेशन के संस्थापक सद्गुरु जग्गी वासुदेव से भी आश्रम की आंतरिक व्यवस्थाओं के बारे में स्पष्टीकरण माँगा।

ईशा फाउंडेशन और सद्गुरु ने इस कार्रवाई पर क्या प्रतिक्रिया दी?

ईशा फाउंडेशन ने एक आधिकारिक बयान जारी कर कहा कि पुलिस की यह जांच न्यायालय के निर्देश का पालन मात्र है और इसे किसी अपराध या कदाचार की स्वीकृति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। फाउंडेशन ने यह भी कहा कि आश्रम में रहने वाले सभी व्यक्ति प्रशिक्षित स्वयंसेवक या ब्रह्मचारी हैं जो अपनी स्वतंत्र इच्छा से वहाँ निवास करते हैं।

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सद्गुरु जग्गी वासुदेव ने सार्वजनिक मंचों पर यह स्पष्ट किया कि ईशा आश्रम एक खुला आध्यात्मिक केंद्र है जहाँ कोई भी व्यक्ति अपनी इच्छा से आ और जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि हजारों स्वयंसेवक देशभर से यहाँ सेवा कार्य के लिए आते हैं और उनके परिवारों को इसकी पूर्ण जानकारी होती है।

आश्रम में ब्रह्मचारी जीवन और स्वयंसेवक व्यवस्था कैसे काम करती है?

ईशा योग केंद्र, थोंडामुथुर, कोयंबटूर में हजारों पूर्णकालिक निवासी और स्वयंसेवक रहते हैं जो विभिन्न सेवा कार्यों में संलग्न रहते हैं। इनमें से अनेक व्यक्ति ब्रह्मचर्य का व्रत लेकर आध्यात्मिक साधना को अपना जीवन-लक्ष्य बनाते हैं, जो हिंदू परंपरा में 'संन्यास' या 'ब्रह्मचर्य आश्रम' की अवधारणा से जुड़ा है।

भारतीय परंपरा में गृहस्थ जीवन छोड़कर आश्रम में रहना कोई नई घटना नहीं है। वेदों में वर्णित चतुराश्रम व्यवस्था — ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास — के अनुसार व्यक्ति किसी भी अवस्था में आध्यात्मिक जीवन अपना सकता है। हालांकि, न्यायालय का प्रश्न यह था कि क्या यह निर्णय पूर्णतः स्वैच्छिक था।

याचिकाकर्ता प्रोफेसर कामराज के आरोपों की पृष्ठभूमि क्या है?

तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्त प्रोफेसर एस कामराज (69) ने न्यायालय में यह दावा किया कि उनकी दो उच्च शिक्षित बेटियाँ ईशा योग केंद्र में स्थायी रूप से रहने लगी हैं और वे पारिवारिक संपर्क से कट गई हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि उनकी बेटियों का 'ब्रेनवॉश' किया गया है, जिससे वे घर वापस लौटने को तैयार नहीं हैं।

इस प्रकार के पारिवारिक विवाद भारत में अन्य आश्रमों और धार्मिक संस्थाओं के संदर्भ में भी पहले सामने आ चुके हैं। भारतीय न्यायपालिका सामान्यतः यह सुनिश्चित करती है कि कोई भी वयस्क व्यक्ति यदि स्वेच्छा से किसी संस्था में रहता है तो उसे ऐसा करने का संवैधानिक अधिकार है, जब तक कि जबरदस्ती या धोखे का कोई प्रमाण न हो।

इस मामले के व्यापक सामाजिक और कानूनी निहितार्थ क्या हैं?

यह मामला भारत में धार्मिक स्वतंत्रता, व्यक्तिगत स्वायत्तता और पारिवारिक अधिकारों के बीच के संतुलन पर एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठाता है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 प्रत्येक नागरिक को अपनी अंतरात्मा के अनुसार धर्म का पालन करने और धार्मिक संस्थाओं में रहने का मौलिक अधिकार देता है।

दूसरी ओर, न्यायालयों का यह भी दायित्व है कि यदि किसी परिवार को यह आशंका हो कि उनके परिजन किसी मानसिक दबाव में हैं, तो वे उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करें। इस प्रकार के मामलों में न्यायालय प्रायः 'हैबियस कॉर्पस' याचिका के माध्यम से संबंधित व्यक्ति का बयान सीधे लेकर यह जाँचता है कि वह स्वतंत्र है या नहीं। इस मामले में भी न्यायालय की प्राथमिक चिंता तथ्यों की पुष्टि करना थी, न कि किसी संस्था को दोषी ठहराना।

ईशा फाउंडेशन की स्थापना और उसके सामाजिक कार्यों का संक्षिप्त परिचय

ईशा फाउंडेशन की स्थापना सद्गुरु जग्गी वासुदेव ने 1992 में की थी। कोयंबटूर के निकट वेल्लियांगिरि पर्वतमाला की तलहटी में स्थित ईशा योग केंद्र 150 एकड़ से अधिक भूमि पर फैला है और इसमें ध्यानलिंग योग मंदिर सहित अनेक आध्यात्मिक संरचनाएँ हैं।

फाउंडेशन 'प्रोजेक्ट ग्रीनहैंड्स' और 'कावेरी कॉलिंग' जैसे पर्यावरण अभियानों के लिए भी जाना जाता है, जिनके अंतर्गत करोड़ों पेड़ लगाने का लक्ष्य रखा गया है। इसके अतिरिक्त, फाउंडेशन ग्रामीण विकास और स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में भी कार्य करता है, जिसे विभिन्न सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं का सहयोग मिला है।