तुलसी विवाह 2026: तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और कथा — विवाह-मुहूर्तों की शुरुआत
तुलसी विवाह 2026 शनिवार 21 नवंबर को मनाया जाएगा। यह पर्व माता तुलसी और भगवान शालिग्राम के विवाह का प्रतीक है और इसी से हिंदू विवाह-मुहूर्तों का शुभारंभ माना जाता है।

तुलसी विवाह 2026 शनिवार 21 नवंबर को मनाया जाएगा। यह पर्व माता तुलसी और भगवान शालिग्राम के विवाह का प्रतीक है और इसी से हिंदू विवाह-मुहूर्तों का शुभारंभ माना जाता है।
संक्षिप्त उत्तर: तुलसी विवाह 2026 शनिवार, 21 नवंबर 2026 को मनाया जाएगा। यह देवउठनी एकादशी के आसपास कार्तिक शुक्ल द्वादशी को होता है, जब माता तुलसी का भगवान विष्णु के शालिग्राम स्वरूप से विवाह किया जाता है और इसी दिन से मांगलिक कार्यों का आरंभ माना जाता है।
तुलसी विवाह हिंदू परंपरा का एक अत्यंत श्रद्धेय पर्व है, जिसमें पवित्र तुलसी माता का भगवान विष्णु के शालिग्राम स्वरूप के साथ विधिवत विवाह सम्पन्न किया जाता है। मान्यता है कि इसी दिन से चातुर्मास की समाप्ति के बाद विवाह, गृह-प्रवेश और अन्य मांगलिक कार्यों का शुभारंभ होता है। वर्ष 2026 में तुलसी विवाह शनिवार, 21 नवंबर को मनाया जाएगा।
तुलसी विवाह 2026 कब है
तुलसी विवाह 2026 शनिवार, 21 नवंबर 2026 को मनाया जाएगा। यह पर्व सामान्यतः देवउठनी (देवोत्थान) एकादशी के अगले दिन, कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी को होता है। कुछ परिवार और पंचांग देवउठनी एकादशी के दिन ही तुलसी विवाह करते हैं, जबकि अनेक परंपराओं में द्वादशी को यह सम्पन्न किया जाता है।
एकादशी और द्वादशी तिथि का आरंभ-समाप्ति काल स्थान और पंचांग के अनुसार भिन्न हो सकता है। अमांत और पूर्णिमांत गणना में मास-नामकरण भिन्न होता है, पर कार्तिक शुक्ल पक्ष की तिथि दोनों में समान रहती है। सटीक तिथि-निर्णय और मुहूर्त के लिए अपने कुल-पंचांग तथा स्थानीय मंदिर की परंपरा का पालन करें।
- पर्वतुलसी विवाह 2026
- तिथिशनिवार, 21 नवंबर 2026
- हिंदू तिथिकार्तिक शुक्ल द्वादशी
- आराध्यमाता तुलसी एवं भगवान शालिग्राम (विष्णु)
- मुख्य महत्वमांगलिक/विवाह कार्यों का आरंभ
- सम्बंधित पर्वदेवउठनी एकादशी
तुलसी विवाह का महत्व
परंपरा के अनुसार चातुर्मास के चार महीनों में भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं और इस अवधि में विवाह जैसे मांगलिक कार्य नहीं किए जाते। देवउठनी एकादशी पर भगवान के जागरण के साथ यह विश्राम-काल समाप्त होता है, और तुलसी विवाह के आयोजन से मांगलिक कार्यों की शुभ ऋतु का आरंभ माना जाता है। इसीलिए इस पर्व को विवाह-मुहूर्तों की शुरुआत का प्रतीक कहा जाता है।
तुलसी को हिंदू घरों में देवी स्वरूप माना जाता है। तुलसी विवाह को कन्यादान के समान पुण्यकारी परंपरा माना जाता है, विशेषकर उन परिवारों में जहाँ पुत्री नहीं होती — यह भावनात्मक और सांस्कृतिक मान्यता है, किसी निश्चित फल की गारंटी नहीं।
तुलसी-शालिग्राम विवाह की कथा
प्रचलित पौराणिक कथा के अनुसार वृंदा (तुलसी) एक परम पतिव्रता स्त्री थीं, जिनका विवाह असुर राजा जालंधर से हुआ था। वृंदा के पातिव्रत्य के बल से जालंधर अजेय हो गया था। देवताओं की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने एक लीला रची जिससे वृंदा का व्रत भंग हुआ और जालंधर पराजित हुआ। इस पर वृंदा ने विष्णु को शिला (पत्थर) बनने का शाप दिया — यही शालिग्राम स्वरूप माना जाता है।
बाद में वृंदा की भक्ति और तप से प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें तुलसी के रूप में सदा अपने साथ पूजित रहने का वरदान दिया। इसी स्मृति में प्रतिवर्ष तुलसी और शालिग्राम का विवाह उत्सव मनाया जाता है। कथा के अनेक क्षेत्रीय पाठ प्रचलित हैं; अपने कुल-परंपरा का पाठ प्रमाण मानें।
तुलसी विवाह पूजा विधि
पूजा सामान्यतः सायंकाल गोधूलि बेला में की जाती है। नीचे प्रचलित विधि के मुख्य चरण दिए गए हैं; क्षेत्र और परिवार के अनुसार इसमें अंतर संभव है।
- तुलसी के गमले (वृंदावन) को स्वच्छ कर गेरू, कुमकुम और रंगोली से सजाएँ और मंडप बनाएँ।
- तुलसी को दुल्हन की भाँति चुनरी, वस्त्र, चूड़ी और शृंगार अर्पित करें तथा शालिग्राम अथवा भगवान विष्णु की मूर्ति को वर रूप में स्थापित करें।
- गणेश-पूजन और कलश-स्थापना कर दीप प्रज्वलित करें।
- तुलसी और शालिग्राम के बीच मंगलसूत्र-स्वरूप सूत बाँधकर विवाह-संकल्प एवं फेरे की प्रतीकात्मक रस्म करें।
- गन्ना, आँवला, बेर, सिंघाड़ा तथा ऋतु-फल का भोग अर्पित करें।
- विष्णु-मंत्र, तुलसी-स्तुति एवं आरती कर विवाह सम्पन्न करें और प्रसाद वितरित करें।
मंत्र और आरती
पूजा में परंपरागत रूप से "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" जैसे विष्णु-मंत्र तथा तुलसी-स्तुति ("तुलसी अमृत जन्मासि...") का पाठ किया जाता है। तुलसी की आरती और विष्णु आरती गाई जाती है। दीर्घ स्तोत्रों का सस्वर पाठ पंडित या परिवार के बुज़ुर्गों के मार्गदर्शन में करें। केवल पारंपरिक, सार्वजनिक-प्रचलित पाठ का प्रयोग करें।
व्रत और उपवास
अनेक श्रद्धालु देवउठनी एकादशी तथा तुलसी विवाह के अवसर पर व्रत रखते हैं और फलाहार करते हैं। किसी को व्रत करना अनिवार्य नहीं है — यह श्रद्धा और सामर्थ्य पर निर्भर है। जिन्हें कोई रोग हो, जो गर्भवती हों, अथवा जिनकी विशेष स्वास्थ्य स्थिति हो, वे व्रत रखने से पूर्व अपने चिकित्सक से परामर्श अवश्य करें।
कौन और कैसे मनाएँ
तुलसी विवाह प्रायः घर के आँगन में परिवार के साथ, तथा मंदिरों में सामूहिक रूप से मनाया जाता है। पारंपरिक रूप से विवाहित स्त्रियाँ यह अनुष्ठान करती आई हैं, किंतु आज अविवाहित स्त्री-पुरुष तथा पूरे परिवार भी श्रद्धापूर्वक इसमें भाग लेते हैं। भागीदारी को लेकर परंपराओं में विविधता है; किसे करना चाहिए या नहीं — इसका निर्णय अपने परिवार और स्थानीय मंदिर की परंपरा के अनुसार करें।
- घर में तुलसी का गमला सजाकर सायंकाल पूजा करें।
- मंदिर में आयोजित सामूहिक तुलसी विवाह में सम्मिलित हों।
- गन्ना और आँवला अर्पित कर परिवार में प्रसाद बाँटें।
- बच्चों को कथा सुनाकर परंपरा से जोड़ें।
क्षेत्रीय विविधताएँ
| क्षेत्र | परंपरा |
|---|---|
| उत्तर भारत | गन्ने का मंडप बनाकर तुलसी-शालिग्राम विवाह, आँवला-बेर का भोग |
| महाराष्ट्र | तुलसी वृंदावन को सजाकर फटाकों-रहित उल्लास के साथ विवाह, ऊसाची लग्न परंपरा |
| गुजरात | तुलसी विवाह से देव दिवाली और विवाह-ऋतु का शुभारंभ |
| दक्षिण भारत | क्षीराब्धि द्वादशी के रूप में तुलसी-विष्णु पूजन एवं दीपदान |
यदि इस अवसर पर दीप, पटाखे या खुली अग्नि का प्रयोग किया जाए तो स्थानीय कानून एवं सुरक्षा नियमों का पालन आवश्यक है; अपने क्षेत्र के नियम अवश्य जाँचें और असुरक्षित प्रयोग से बचें।
तुलसी विवाह न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि यह प्रकृति के प्रति श्रद्धा और विवाह-संस्कार की सांस्कृतिक गरिमा का भी प्रतीक है। 2026 में 21 नवंबर को अपने कुल-परंपरा के अनुसार श्रद्धापूर्वक यह पर्व मनाएँ।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
तुलसी विवाह 2026 कब है?
तुलसी विवाह 2026 शनिवार, 21 नवंबर 2026 को मनाया जाएगा। यह कार्तिक शुक्ल द्वादशी को, देवउठनी एकादशी के आसपास आता है।
तुलसी विवाह किसका किसके साथ होता है?
इस पर्व में पवित्र तुलसी माता का भगवान विष्णु के शालिग्राम स्वरूप के साथ विधिवत विवाह सम्पन्न कराया जाता है।
क्या तुलसी विवाह देवउठनी एकादशी को होता है या द्वादशी को?
परंपराओं में अंतर है — कुछ परिवार देवउठनी एकादशी को तो अनेक कार्तिक शुक्ल द्वादशी को तुलसी विवाह करते हैं। अपने कुल-पंचांग और स्थानीय मंदिर की परंपरा का पालन करें।
तुलसी विवाह का क्या महत्व है?
इसी पर्व से चातुर्मास की समाप्ति के बाद विवाह और मांगलिक कार्यों की शुभ ऋतु का आरंभ माना जाता है। यह मान्यता पारंपरिक है।
तुलसी विवाह में क्या भोग अर्पित किया जाता है?
परंपरागत रूप से गन्ना, आँवला, बेर, सिंघाड़ा तथा ऋतु-फल का भोग तुलसी और शालिग्राम को अर्पित किया जाता है।
क्या तुलसी विवाह पर व्रत रखना अनिवार्य है?
नहीं, व्रत श्रद्धा और सामर्थ्य पर निर्भर है। किसी रोग, गर्भावस्था या विशेष स्वास्थ्य स्थिति में व्रत से पूर्व चिकित्सक से परामर्श अवश्य करें।
तुलसी विवाह कौन कर सकता है?
पारंपरिक रूप से विवाहित स्त्रियाँ यह अनुष्ठान करती रही हैं, किंतु आज अविवाहित व्यक्ति और पूरे परिवार भी इसमें भाग लेते हैं। भागीदारी का निर्णय अपने परिवार और मंदिर की परंपरा के अनुसार करें।
तुलसी विवाह की कथा क्या है?
पौराणिक कथा के अनुसार पतिव्रता वृंदा (तुलसी) और भगवान विष्णु से जुड़ी लीला के फलस्वरूप तुलसी को सदा भगवान के साथ पूजित रहने का वरदान मिला; इसी की स्मृति में यह विवाह उत्सव मनाया जाता है।

