नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली) 2026 का महत्व: तिथि, कथा और पूजन विधि
नरक चतुर्दशी यानी छोटी दिवाली 2026 भगवान कृष्ण की नरकासुर पर विजय का पर्व है। जानिए इसका आध्यात्मिक महत्व, अभ्यंग स्नान, यम दीपदान और पूजन की परंपराएँ।

नरक चतुर्दशी यानी छोटी दिवाली 2026 भगवान कृष्ण की नरकासुर पर विजय का पर्व है। जानिए इसका आध्यात्मिक महत्व, अभ्यंग स्नान, यम दीपदान और पूजन की परंपराएँ।
संक्षिप्त उत्तर: नरक चतुर्दशी 2026 शनिवार 7 नवंबर को मनाई जाएगी। इसे छोटी दिवाली भी कहते हैं। यह पर्व भगवान श्रीकृष्ण द्वारा राक्षस नरकासुर के वध और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। इस दिन अभ्यंग स्नान और यम के निमित्त दीपदान किया जाता है।
नरक चतुर्दशी, जिसे छोटी दिवाली, रूप चौदस या यम चतुर्दशी भी कहा जाता है, पाँच दिवसीय दीपोत्सव का दूसरा प्रमुख दिन है। वर्ष 2026 में यह पर्व शनिवार, 7 नवंबर को मनाया जाएगा। धनतेरस के अगले दिन और मुख्य दिवाली (लक्ष्मी पूजा) से एक दिन पूर्व आने वाला यह पर्व अंधकार पर प्रकाश तथा बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है।
नरक चतुर्दशी 2026 की तिथि और दीपावली पर्व क्रम
दीपावली एक ही दिन का नहीं बल्कि पाँच दिनों तक चलने वाला उत्सव है। नरक चतुर्दशी इसका दूसरा दिन है। नीचे 2026 के पूरे दीपोत्सव की तिथियाँ दी गई हैं, जिससे आप अपने पूजन और उत्सव की योजना बना सकें।
| पर्व | दिन और तिथि 2026 |
|---|---|
| धनतेरस | शुक्रवार, 6 नवंबर 2026 |
| नरक चतुर्दशी / छोटी दिवाली | शनिवार, 7 नवंबर 2026 |
| दिवाली / लक्ष्मी पूजा | रविवार, 8 नवंबर 2026 |
| गोवर्धन पूजा / अन्नकूट | सोमवार, 9 नवंबर 2026 |
| भाई दूज | मंगलवार, 10 नवंबर 2026 |
नरक चतुर्दशी की पौराणिक कथा
पौराणिक मान्यता के अनुसार प्राग्ज्योतिषपुर का अत्याचारी राक्षस नरकासुर अपने बल के अहंकार में देवताओं, ऋषियों और स्त्रियों पर घोर अत्याचार करता था। उसने सोलह हजार से अधिक स्त्रियों को बंदी बना रखा था। भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा के साथ मिलकर इस अधर्मी राक्षस का वध किया और सभी बंदियों को मुक्त कराया।
नरकासुर के वध के उपरांत भगवान कृष्ण ने रक्त और अधर्म के प्रतीक को धोने के लिए तेल और उबटन लगाकर स्नान किया। इसी कारण नरक चतुर्दशी के दिन सूर्योदय से पूर्व अभ्यंग स्नान की परंपरा प्रचलित हुई। यह दिन इस बात का स्मरण कराता है कि अहंकार और अधर्म का अंत निश्चित है।
नरक चतुर्दशी का आध्यात्मिक महत्व
इस पर्व का आध्यात्मिक संदेश बाहरी उत्सव से कहीं गहरा है। नरकासुर मन के भीतर बसे अहंकार, क्रोध, लोभ और अज्ञान का प्रतीक है। इन आंतरिक विकारों पर विजय पाकर आत्मा को शुद्ध करना ही इस पर्व का वास्तविक उद्देश्य है। अभ्यंग स्नान शरीर के साथ-साथ मन की शुद्धि का भी प्रतीक माना जाता है।
- बुराई पर अच्छाई और अहंकार पर विनम्रता की विजय का स्मरण
- अभ्यंग स्नान द्वारा तन-मन की शुद्धि और नवजीवन का संकल्प
- यम देवता के निमित्त दीपदान कर अकाल मृत्यु से रक्षा की प्रार्थना
- मुख्य दिवाली से पूर्व घर और मन को प्रकाश हेतु तैयार करना
नरक चतुर्दशी 2026 पूजन विधि
इस दिन प्रातःकाल सूर्योदय से पहले उठकर पूजन और स्नान की तैयारी की जाती है। नीचे सामान्य पूजन विधि के मुख्य चरण दिए गए हैं। स्थानीय परंपराओं और शुभ मुहूर्त की सटीक जानकारी के लिए अपने पंचांग या समीप के मंदिर की घोषणा अवश्य देखें।
- ब्रह्म मुहूर्त में उठकर शरीर पर तिल का तेल और उबटन लगाएँ
- अभ्यंग स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें
- घर और पूजा स्थल की सफाई कर दीप जलाएँ
- भगवान श्रीकृष्ण, यमराज और हनुमान जी का स्मरण एवं पूजन करें
- सायंकाल घर के मुख्य द्वार और आँगन में दीपक प्रज्वलित करें
- यम देवता के निमित्त घर के बाहर दक्षिण दिशा में एक दीपक अर्पित करें
यम दीपदान का महत्व
नरक चतुर्दशी की संध्या को यम दीपदान की विशेष परंपरा है। घर के मुख्य द्वार के बाहर या दक्षिण दिशा में मृत्यु के देवता यमराज के निमित्त एक दीपक जलाया जाता है। इसे परिवार की अकाल मृत्यु से रक्षा और दीर्घायु की प्रार्थना का प्रतीक माना जाता है।
इस दिन से जुड़े प्रमुख देवता
नरक चतुर्दशी पर श्रीकृष्ण, यमराज और हनुमान जी की उपासना का विशेष महत्व है। कुछ क्षेत्रों में इसे हनुमान जयंती के रूप में भी मनाया जाता है और भक्त हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं। मंत्रों के रूप में सरल एवं प्रसिद्ध कृष्ण नाम-स्मरण तथा हनुमान वंदना का जाप किया जा सकता है।
क्षेत्रीय परंपराएँ और उत्सव
भारत के विभिन्न प्रांतों में यह पर्व अलग-अलग नामों और रीतियों से मनाया जाता है। दक्षिण भारत में इसे मुख्य दीपावली के रूप में अभ्यंग स्नान के साथ मनाया जाता है, जबकि उत्तर भारत में यह छोटी दिवाली के रूप में दीपों और मिठाइयों के साथ। विदेश में बसे भारतीय समुदाय भी अपने-अपने मंदिरों में इस पर्व को उत्साह से मनाते हैं। अपने शहर के 2026 के आयोजनों की सटीक जानकारी हेतु स्थानीय मंदिर या समुदाय की घोषणाएँ देखें।
- पर्व का नामनरक चतुर्दशी / छोटी दिवाली / रूप चौदस
- 2026 तिथिशनिवार, 7 नवंबर 2026
- प्रमुख देवताश्रीकृष्ण, यमराज, हनुमान जी
- मुख्य अनुष्ठानअभ्यंग स्नान, यम दीपदान, दीप प्रज्वलन
- संदेशबुराई और अहंकार पर अच्छाई की विजय
नरक चतुर्दशी हमें यह स्मरण कराती है कि जब हम अपने भीतर के अंधकार को दूर करते हैं, तभी बाहरी दीपों का प्रकाश सार्थक होता है। 2026 में इस पर्व को श्रद्धा और स्वच्छता के साथ मनाकर मुख्य दिवाली के लिए अपने घर और हृदय दोनों को प्रकाशित करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
नरक चतुर्दशी 2026 कब है?
नरक चतुर्दशी यानी छोटी दिवाली 2026 में शनिवार, 7 नवंबर को मनाई जाएगी। यह धनतेरस के अगले दिन और मुख्य दिवाली से एक दिन पूर्व आती है।
नरक चतुर्दशी को छोटी दिवाली क्यों कहते हैं?
यह पर्व मुख्य दिवाली से एक दिन पहले आता है और इस दिन घरों में दीप जलाए जाते हैं। कम भव्यता से मनाए जाने के कारण इसे छोटी दिवाली कहा जाता है।
नरक चतुर्दशी की कथा क्या है?
इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने सत्यभामा के साथ मिलकर अत्याचारी राक्षस नरकासुर का वध किया और सोलह हजार से अधिक बंदी स्त्रियों को मुक्त कराया। यह बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है।
अभ्यंग स्नान क्या है और कब किया जाता है?
अभ्यंग स्नान वह विशेष स्नान है जिसमें शरीर पर तेल और उबटन लगाकर सूर्योदय से पूर्व स्नान किया जाता है। नरक चतुर्दशी की सुबह यह तन-मन की शुद्धि का प्रतीक माना जाता है।
यम दीपदान का क्या अर्थ है?
यम दीपदान में संध्या के समय घर के बाहर दक्षिण दिशा में यमराज के निमित्त एक दीपक जलाया जाता है। इसे परिवार की अकाल मृत्यु से रक्षा और दीर्घायु की प्रार्थना माना जाता है।
नरक चतुर्दशी पर किन देवताओं की पूजा होती है?
इस दिन मुख्य रूप से भगवान श्रीकृष्ण, यमराज और हनुमान जी की उपासना की जाती है। कुछ क्षेत्रों में इसे हनुमान जयंती के रूप में भी मनाया जाता है।
क्या नरक चतुर्दशी और रूप चौदस एक ही हैं?
हाँ, रूप चौदस नरक चतुर्दशी का ही एक नाम है। मान्यता है कि इस दिन अभ्यंग स्नान करने से सौंदर्य, स्वास्थ्य और तेज की प्राप्ति होती है, इसलिए इसे रूप चौदस कहा जाता है।
नरक चतुर्दशी 2026 पर शुभ मुहूर्त कैसे जानें?
अभ्यंग स्नान और पूजन के सटीक शुभ मुहूर्त क्षेत्र और स्थानीय समय के अनुसार बदलते हैं। इसके लिए विश्वसनीय पंचांग देखें या अपने समीप के मंदिर की 2026 की घोषणाओं का संदर्भ लें।

