सुब्रह्मण्य षष्ठी / स्कंद षष्ठी 2026: तिथि, पूजा-विधि और व्रत की पूरी जानकारी
भगवान कार्तिकेय (मुरुगन/सुब्रह्मण्य) को समर्पित सुब्रह्मण्य षष्ठी 2026 में 15 दिसंबर को है। यह लेख तिथि, षष्ठी व्रत, पूजा-विधि और क्षेत्रीय परंपराओं की पूरी जानकारी देता है।

भगवान कार्तिकेय (मुरुगन/सुब्रह्मण्य) को समर्पित सुब्रह्मण्य षष्ठी 2026 में 15 दिसंबर को है। यह लेख तिथि, षष्ठी व्रत, पूजा-विधि और क्षेत्रीय परंपराओं की पूरी जानकारी देता है।
संक्षिप्त उत्तर: मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की सुब्रह्मण्य षष्ठी 2026 में मंगलवार, 15 दिसंबर को मनाई जाएगी। इसे कुक्के सुब्रह्मण्य षष्ठी भी कहते हैं। तमिलनाडु की स्कंद षष्ठी (सूरसंहारम) इससे पहले कार्तिक मास में आती है। यह पर्व भगवान कार्तिकेय को समर्पित है।
सुब्रह्मण्य षष्ठी और स्कंद षष्ठी भगवान कार्तिकेय — जिन्हें मुरुगन, स्कंद, सुब्रह्मण्य, शण्मुख और कुमार भी कहा जाता है — को समर्पित प्रमुख पर्व हैं। षष्ठी तिथि स्वयं कार्तिकेय की तिथि मानी जाती है, इसलिए हर मास की शुक्ल पक्ष षष्ठी को उनकी आराधना की परंपरा है। इनमें से दो षष्ठियाँ विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। यहाँ एक बात स्पष्ट रूप से समझना ज़रूरी है — 'सुब्रह्मण्य षष्ठी' और 'स्कंद षष्ठी' प्रायः एक-दूसरे के पर्याय की तरह बोले जाते हैं, पर पंचांग की दृष्टि से ये दो अलग-अलग तिथियाँ हैं। इस लेख में हम दोनों को अलग-अलग स्पष्ट करेंगे ताकि आप अपने परिवार व मंदिर की परंपरा के अनुसार सही दिन व्रत रख सकें।
सुब्रह्मण्य / स्कंद षष्ठी 2026: संक्षिप्त जानकारी
- पर्वसुब्रह्मण्य षष्ठी (मार्गशीर्ष)
- तिथि (2026)मंगलवार, 15 दिसंबर 2026
- तिथि (पंचांग)मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष षष्ठी
- आराध्य देवभगवान कार्तिकेय (मुरुगन / सुब्रह्मण्य)
- अन्य नामकुक्के सुब्रह्मण्य षष्ठी, चंपा षष्ठी क्षेत्र-भेद से
- तमिल स्कंद षष्ठीकार्तिक मास में — सूरसंहारम के साथ (नवंबर 2026)
- प्रमुख मंदिरतिरुचेंदूर, पलनी, कुक्के सुब्रह्मण्य, तिरुत्तणि
षष्ठी तिथि का समय और पंचांग-भेद
उपलब्ध पंचांगों के अनुसार मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि 14 दिसंबर 2026 की सायंकाल आरंभ होकर 15 दिसंबर 2026 की रात्रि तक रहती है। चूँकि व्रत-पर्व प्रायः सूर्योदय-व्यापिनी उदयातिथि के अनुसार निर्धारित होते हैं, इसलिए सुब्रह्मण्य षष्ठी व्रत मंगलवार, 15 दिसंबर 2026 को माना जा रहा है। तिथि के आरंभ-समाप्ति के सटीक घड़ी-समय आपके नगर के अक्षांश-देशांतर पर निर्भर करते हैं, अतः स्थानीय पंचांग या मंदिर की घोषणा से घड़ी-समय अवश्य मिला लें [VERIFY]। अमांत (दक्षिण भारत) और पूर्णिमांत (उत्तर भारत) मास-गणना में मास का नाम भिन्न हो सकता है, पर शुक्ल पक्ष की तिथि-गणना दोनों में समान रहती है; इसलिए इस पर्व की तिथि को लेकर सामान्यतः बड़ा अंतर नहीं आता। फिर भी यदि आपके क्षेत्र का पंचांग तिथि-क्षय या तिथि-वृद्धि के कारण भिन्न दिन बताए, तो किसी एक गणना को सही और दूसरी को ग़लत न मानें — अपने कुल-परंपरा और स्थानीय मंदिर की घोषणा का अनुसरण करें।
सुब्रह्मण्य षष्ठी और तमिल स्कंद षष्ठी में अंतर
तमिलनाडु और कई मुरुगन-भक्त परिवारों में जो 'स्कंद षष्ठी' सबसे प्रसिद्ध है, वह कार्तिक (तमिल ऐप्पसि/कार्त्तिकै) मास की शुक्ल पक्ष षष्ठी है, जो प्रायः दीपावली के बाद आती है। इसी दिन तिरुचेंदूर आदि मंदिरों में 'सूरसंहारम' का महोत्सव होता है, जिसमें भगवान मुरुगन द्वारा असुर सूरपद्मन के वध का उत्सव मनाया जाता है। यह छह-दिवसीय व्रत होता है। जबकि 15 दिसंबर 2026 वाली षष्ठी अगले लुनार मास मार्गशीर्ष की है, जिसे विशेष रूप से 'सुब्रह्मण्य षष्ठी' या 'कुक्के सुब्रह्मण्य षष्ठी' कहा जाता है और कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना तथा कुक्के सुब्रह्मण्य मंदिर में इसका विशेष महत्व है। इसी को महाराष्ट्र-गोवा की कुछ परंपराओं में 'चंपा षष्ठी' के आस-पास भी जोड़ा जाता है। दोनों ही षष्ठियाँ कार्तिकेय को समर्पित हैं; अंतर केवल मास और क्षेत्रीय प्रमुखता का है।
पौराणिक महत्व और कथा
पुराणों के अनुसार भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र कार्तिकेय देवताओं के सेनापति बने और उन्होंने तारकासुर तथा सूरपद्मन जैसे असुरों का संहार कर धर्म की रक्षा की। छह कृत्तिका देवियों द्वारा पालन-पोषण के कारण उनका एक नाम 'कार्तिकेय' पड़ा और छह मुखों के कारण 'शण्मुख' कहलाए। षष्ठी तिथि को उनका प्राकट्य-पर्व माना जाता है, इसीलिए यह तिथि उन्हें विशेष प्रिय है। स्कंद षष्ठी का व्रत परंपरागत रूप से साहस, अनुशासन, विद्या, आरोग्य और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक माना जाता है। यह भाव भक्ति और आत्म-संयम का है; इसे किसी निश्चित सांसारिक फल की गारंटी के रूप में नहीं समझना चाहिए।
पूजा-विधि: चरण-दर-चरण
- प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूजा-स्थल को साफ़ करके भगवान कार्तिकेय (मुरुगन/सुब्रह्मण्य) की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
- व्रत का संकल्प लें और अपने आराध्य के प्रति श्रद्धापूर्वक ध्यान करें।
- दीप-धूप प्रज्वलित कर पुष्प, विशेषकर लाल पुष्प, अर्पित करें; मोर उनका वाहन है, अतः मोर-पंख का भाव-प्रतीक भी शुभ माना जाता है।
- 'ॐ शरवणभवाय नमः' अथवा 'ॐ सुब्रह्मण्याय नमः' जैसे पारंपरिक मंत्रों का श्रद्धा से जप करें।
- स्कंद षष्ठी कवचम् या सुब्रह्मण्य स्तोत्रों का पाठ या श्रवण करें — ये स्तोत्र दीर्घ हैं, अतः इन्हें विधिवत पढ़ें या मंदिर/परिवार-परंपरा के अनुसार सुनें।
- फल, नारियल एवं सात्त्विक नैवेद्य अर्पित करें और आरती करें।
- पूजा के उपरांत प्रसाद वितरित करें; यथासंभव संध्या को मंदिर-दर्शन करें।
व्रत और उपवास के नियम
परंपरागत रूप से भक्त इस दिन उपवास रखते हैं — कुछ निर्जल या फलाहार, तो कुछ एक समय सात्त्विक भोजन करते हैं। तमिल स्कंद षष्ठी में छह दिन का क्रमिक व्रत रखने की परंपरा भी है, जिसका समापन षष्ठी के दिन होता है। व्रत की कठोरता व्यक्ति की शारीरिक क्षमता और कुल-परंपरा पर निर्भर करती है। स्वास्थ्य संबंधी सावधानी: जिन्हें कोई रोग हो, जो गर्भवती हों, या जो किसी नियमित औषधि पर हों, वे उपवास आरंभ करने से पूर्व अपने चिकित्सक से अवश्य परामर्श करें। व्रत श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार रखें; यह कोई आहार-योजना नहीं है।
व्रत कौन और कैसे रखे
परंपरा में स्त्री-पुरुष, विवाहित-अविवाहित सभी इस व्रत को रख सकते हैं। कहीं-कहीं संतान-कल्याण की कामना से माताएँ, तो कहीं विद्या और साहस की भावना से विद्यार्थी और युवा इसे रखते हैं। अलग-अलग परिवारों और मंदिरों में नियम भिन्न हो सकते हैं — किसी को व्रत रखने से रोकना या बाध्य करना इस लेख का उद्देश्य नहीं है। किसी भी मंदिर के विशेष कार्यक्रम, समय, अभिषेक-सूची या आयोजन की पुष्टि यात्रा से पहले सीधे मंदिर प्रशासन की आधिकारिक घोषणा से ही करें, क्योंकि तिथि व समय स्थानीय पंचांग के अनुसार बदल सकते हैं [VERIFY]।
- अपने सामर्थ्य के अनुसार निर्जल, फलाहारी या एक-समय भोजन का व्रत चुनें।
- यदि पूर्ण उपवास संभव न हो तो सात्त्विक आहार के साथ भक्ति-भाव बनाए रखें।
- पूजा, मंत्र-जप और मंदिर-दर्शन को दिन का केंद्र बनाएँ।
- पात्रता और विधि को लेकर संशय हो तो परिवार के बुज़ुर्गों और स्थानीय मंदिर के मार्गदर्शन का अनुसरण करें।
क्षेत्रीय परंपराएँ
| क्षेत्र / मंदिर | परंपरा |
|---|---|
| तमिलनाडु (तिरुचेंदूर, पलनी) | कार्तिक मास में छह-दिवसीय स्कंद षष्ठी व्रत व सूरसंहारम महोत्सव |
| कर्नाटक (कुक्के सुब्रह्मण्य) | मार्गशीर्ष की सुब्रह्मण्य षष्ठी पर विशेष उत्सव व रथोत्सव-परंपरा |
| आंध्र प्रदेश व तेलंगाना | सुब्रह्मण्य स्वामी को समर्पित पूजा, नाग-आराधना से जुड़ी भावना |
| महाराष्ट्र व गोवा | इसी अवधि के आस-पास चंपा षष्ठी / खंडोबा-परंपरा से संबद्ध उत्सव |
मंत्र और आराधना
इस दिन भगवान कार्तिकेय के पारंपरिक मंत्रों का जप शुभ माना जाता है, जैसे 'ॐ शरवणभवाय नमः' और 'ॐ सुब्रह्मण्याय नमः'। इसके अतिरिक्त स्कंद षष्ठी कवचम्, सुब्रह्मण्य भुजंगम् तथा कंद षष्ठी स्तोत्र जैसे सुविख्यात पारंपरिक (सार्वजनिक-प्रचलित) स्तोत्रों का पाठ किया जाता है। ये स्तोत्र लंबे हैं, अतः इन्हें शुद्ध उच्चारण के साथ पढ़ें या मंदिर/परिवार की परंपरा के अनुसार श्रवण करें।
पूजा की तैयारी: सामग्री
- भगवान कार्तिकेय की प्रतिमा या चित्र
- दीपक, घी/तेल और बाती
- धूप, अगरबत्ती और कपूर
- लाल एवं सुगंधित पुष्प, माला
- फल, नारियल तथा सात्त्विक नैवेद्य
- जल-कलश, रोली, अक्षत और चंदन
- मोर-पंख (भाव-प्रतीक) यदि परंपरा में हो
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
सुब्रह्मण्य / स्कंद षष्ठी 2026 में कब है?
मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की सुब्रह्मण्य षष्ठी 2026 में मंगलवार, 15 दिसंबर को है। तमिलनाडु की प्रसिद्ध स्कंद षष्ठी (सूरसंहारम) इससे पहले कार्तिक मास में नवंबर 2026 में आती है। सटीक घड़ी-समय स्थानीय पंचांग से मिला लें [VERIFY]।
सुब्रह्मण्य षष्ठी और स्कंद षष्ठी में क्या अंतर है?
दोनों भगवान कार्तिकेय को समर्पित हैं। तमिल स्कंद षष्ठी कार्तिक मास की षष्ठी है जिस पर सूरसंहारम होता है, जबकि सुब्रह्मण्य / कुक्के सुब्रह्मण्य षष्ठी अगले मार्गशीर्ष मास की षष्ठी है। अंतर मास और क्षेत्रीय प्रमुखता का है।
यह पर्व किन देवता को समर्पित है?
यह पर्व भगवान कार्तिकेय को समर्पित है, जिन्हें मुरुगन, स्कंद, सुब्रह्मण्य, शण्मुख और कुमार भी कहा जाता है। वे शिव-पार्वती के पुत्र और देवताओं के सेनापति माने जाते हैं।
स्कंद षष्ठी व्रत कौन रख सकता है?
परंपरा में स्त्री-पुरुष, विवाहित-अविवाहित सभी यह व्रत रख सकते हैं। नियम परिवार और मंदिर के अनुसार भिन्न होते हैं। पात्रता या विधि को लेकर संशय हो तो परिवार के बुज़ुर्गों और स्थानीय मंदिर के मार्गदर्शन का पालन करें।
व्रत में क्या खाना चाहिए?
भक्त सामर्थ्य अनुसार निर्जल, फलाहारी या एक-समय सात्त्विक भोजन का व्रत रखते हैं। जिन्हें कोई रोग हो, जो गर्भवती हों या नियमित औषधि लेते हों, वे उपवास से पहले चिकित्सक से परामर्श अवश्य करें।
सूरसंहारम क्या है?
सूरसंहारम भगवान मुरुगन द्वारा असुर सूरपद्मन के वध का उत्सव है, जो तमिल स्कंद षष्ठी के दिन तिरुचेंदूर आदि मंदिरों में मनाया जाता है। यह बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक माना जाता है।
पूजा में कौन-से मंत्र पढ़े जाते हैं?
'ॐ शरवणभवाय नमः' और 'ॐ सुब्रह्मण्याय नमः' जैसे पारंपरिक मंत्रों का जप किया जाता है। स्कंद षष्ठी कवचम् और सुब्रह्मण्य स्तोत्रों का पाठ भी होता है; ये दीर्घ हैं, अतः इन्हें विधिवत पढ़ें या श्रवण करें।
इस पर्व का प्रमुख मंदिर कौन-सा है?
तमिलनाडु में तिरुचेंदूर, पलनी और तिरुत्तणि, तथा कर्नाटक में कुक्के सुब्रह्मण्य मंदिर इस पर्व के प्रमुख केंद्र हैं। किसी भी आयोजन के समय व कार्यक्रम की पुष्टि यात्रा से पहले मंदिर की आधिकारिक घोषणा से करें [VERIFY]।

