ऋषि पंचमी 2026: तिथि, सप्त ऋषि पूजा, व्रत विधि, कथा और नियम
ऋषि पंचमी 2026 मंगलवार, 15 सितंबर को, गणेश चतुर्थी के अगले दिन मनाई जाती है। सप्त ऋषि पूजन, व्रत विधि, अपामार्ग स्नान, सामग्री और पारंपरिक कथा का सरल मार्गदर्शन — साथ ही यह कोमल दृष्टि कि आज परिवार इस व्रत को कैसे समझते हैं।

ऋषि पंचमी 2026 मंगलवार, 15 सितंबर को, गणेश चतुर्थी के अगले दिन मनाई जाती है। सप्त ऋषि पूजन, व्रत विधि, अपामार्ग स्नान, सामग्री और पारंपरिक कथा का सरल मार्गदर्शन — साथ ही यह कोमल दृष्टि कि आज परिवार इस व्रत को कैसे समझते हैं।
संक्षिप्त उत्तर: ऋषि पंचमी 2026 मंगलवार, 15 सितंबर 2026 को भाद्रपद शुक्ल पंचमी — शुक्ल पक्ष की पाँचवीं तिथि, गणेश चतुर्थी के ठीक अगले दिन — पड़ती है। यह सप्त ऋषियों के प्रति कृतज्ञता, एक सरल स्नान अनुष्ठान और फलाहार व्रत का दिन है। सटीक तिथि और मुहूर्त अपने स्थानीय पंचांग से अवश्य मिला लें।
ऋषि पंचमी एक शांत, कृतज्ञता से भरा व्रत है जो गणेश चतुर्थी के उल्लास के तुरंत बाद आता है। 2026 में यह मंगलवार, 15 सितंबर को भाद्रपद शुक्ल पंचमी को मनाया जाता है — भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पाँचवीं तिथि। चूँकि तिथि का समय सूर्योदय और स्थान के अनुसार बदलता है, इसलिए क्षेत्रों के बीच कैलेंडर तिथि एक दिन आगे-पीछे हो सकती है; अतः व्रत निश्चित करने से पहले अपने स्थानीय पंचांग से मिला लेना सदैव उचित है।
मूल रूप से ऋषि पंचमी स्मरण का दिन है। यह सप्त ऋषियों का सम्मान करती है — वे सात महान ऋषि जिन्हें परंपरा वेदों, धर्म और जीवन-विज्ञान के संरक्षण का श्रेय देती है। यह व्रत जानबूझकर सरल रखा गया है: एक शुद्धिकारक स्नान, एक छोटी पूजा, और हल के बिना उगे अन्न वाला हल्का भोजन। नीचे आपको तिथि व समय, सातों ऋषियों के नाम, अनुष्ठान के चरण, सामग्री सूची, पारंपरिक कथा, और यह सावधान, बिना निर्णय वाली दृष्टि मिलेगी कि आज परिवार इस व्रत की पुरानी व्याख्या को कैसे समझते हैं।
- त्योहार: ऋषि पंचमी (सप्त ऋषि व्रत)
- तिथि 2026: मंगलवार, 15 सितंबर 2026
- तिथि: भाद्रपद शुक्ल पंचमी
- इसके बाद: गणेश चतुर्थी (एक दिन बाद)
- पूजित देव: सप्त ऋषि (सात ऋषि)
- व्रत भोजन: फल / हल-रहित अन्न; हल्का व सात्त्विक
- पुष्टि करें: अपने स्थानीय पंचांग से
ऋषि पंचमी 2026 कब है?
ऋषि पंचमी सदैव भाद्रपद की शुक्ल पंचमी (शुक्ल पक्ष की पाँचवीं तिथि) को, गणेश चतुर्थी के अगले दिन पड़ती है। 2026 में यह तिथि मंगलवार, 15 सितंबर है। तिथि का आरंभ और अंत विशिष्ट समयों पर होता है जो आपके नगर के सूर्योदय पर निर्भर करते हैं, इसलिए आंध्र, महाराष्ट्र या उत्तर भारत के परिवारों में व्रत का आधार थोड़ा भिन्न दिख सकता है। किसी एक छपे समय पर निर्भर रहने के बजाय अपने स्थान का विश्वसनीय पंचांग देखें।
| विवरण | 2026 संदर्भ |
|---|---|
| वार | मंगलवार |
| ग्रेगोरियन तिथि | 15 सितंबर 2026 |
| चंद्र मास | भाद्रपद |
| पक्ष | शुक्ल |
| तिथि | पंचमी (पाँचवीं) |
| गणेश चतुर्थी से संबंध | अगला दिन |
यदि आप अमांत कैलेंडर (दक्षिण व पश्चिम में प्रचलित) या पूर्णिमांत कैलेंडर (उत्तर में प्रचलित) मानते हैं, तो तिथि समान होने पर भी मास का नाम भिन्न दिख सकता है। इसका कारण हमारे अमांत बनाम पूर्णिमांत लेख में समझाया गया है। पूरे मास के लिए भाद्रपद 2026 पिलर देखें।
इस दिन पूजित सप्त ऋषि
ऋषि पंचमी का अर्थ है "ऋषियों की पाँचवीं (तिथि)।" यह व्रत सप्त ऋषियों पर केंद्रित है — वैदिक परंपरा के सात पूजनीय द्रष्टा। यद्यपि कुछ सूचियाँ ग्रंथों और क्षेत्रों में भिन्न होती हैं, इस दिन सर्वाधिक प्रचलित समूह नीचे दिया है। प्रत्येक को ज्ञान और धर्म के रक्षक के रूप में स्मरण किया जाता है, और यह पूजा मूलतः उसी ज्ञान-परंपरा के प्रति आभार का कार्य है।
- कश्यप — विपुल संतति और सृष्टि-व्यवस्था से संबद्ध।
- अत्रि — धैर्य और भक्ति के ऋषि, अनसूया के पति।
- भरद्वाज — विद्या, चिकित्सा और कलाओं से जुड़े।
- विश्वामित्र — राजा से ऋषि बने, तप के आदर्श।
- गौतम — धर्म और न्याय से संबद्ध ऋषि।
- जमदग्नि — परशुराम के पिता, तपस्या के लिए स्मरणीय।
- वसिष्ठ — इक्ष्वाकु वंश के राजगुरु, ज्ञान के ऋषि।
अनेक परिवारों में वसिष्ठ की पत्नी अरुंधती को भी सातों के साथ पूजा जाता है, जो अटूट सहचर्य का प्रतीक हैं। किसी भौतिक फल की कामना के बिना प्रत्येक ऋषि का नाम लेना और स्मरण करना ही इस दिन का भावनात्मक मर्म है।
ऋषि पंचमी व्रत का उद्देश्य
इस व्रत को परंपरागत रूप से कृतज्ञता और कोमल आत्म-शुद्धि का दिन माना जाता है: उन ऋषियों के प्रति आभार जिन्होंने धर्म का संरक्षण किया, और आने वाले वर्ष को थोड़ी अधिक जागरूकता व संयम के साथ जीने का संकल्प। कई लोग इसे उपवास के रूप में करते हैं जो फल या पृथ्वी को हल से जोते बिना उगे अन्न से खोला जाता है — कम-से-कम हानि करने का प्रतीकात्मक भाव। सभी व्रतों की भाँति यह भक्ति और अनुशासन के रूप में अर्पित है, किसी परिणाम की गारंटी वाले सौदे के रूप में नहीं।
अपामार्ग स्नान और शुद्धिकरण अनुष्ठान
ऋषि पंचमी की एक विशिष्ट विशेषता पारंपरिक प्रातःस्नान है। पुरानी प्रथा में साधक अपामार्ग (चिरचिटा) पौधे की टहनी या पत्तियों के साथ मिट्टी और जल से स्नान करते थे, कभी नदी या कुएँ पर। जहाँ नदी सुलभ न हो या पूरा बाह्य अनुष्ठान संभव न हो, वहाँ परिवार घर पर ही स्वच्छ, भावपूर्ण स्नान कर लेते हैं। यहाँ शुद्धि को प्रतीकात्मक रूप से — एक नई शुरुआत के रूप में — समझा जाता है, न कि किसी व्यक्ति की अशुद्धता के दावे के रूप में।
- शीघ्र उठकर शांत, कृतज्ञ भाव से स्नान करें।
- जहाँ परंपरा निभाई जाती है, अपामार्ग टहनी, मिट्टी और जल का उपयोग होता है; अन्यथा सरल स्वच्छ स्नान पर्याप्त है।
- स्वच्छ, यथासंभव हल्के रंग के वस्त्र पहनें।
- सप्त ऋषि पूजा के लिए स्वच्छ स्थान तैयार करें, यथासंभव पूर्व की ओर मुख करके।
ऋषि पंचमी पूजा विधि (चरण दर चरण)
- स्नान के बाद पूजा स्थल स्वच्छ करें और चौकी या स्वच्छ वस्त्र बिछाएँ।
- कलश और सप्त ऋषियों के चित्र या प्रतीक स्थापित करें; कई लोग सात सुपारी या एक रेखांकन से सात ऋषियों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
- संकल्प करें — दिन, अपना नाम और ऋषियों के सम्मान के भाव का शांत उच्चारण।
- अर्घ्य (जल), चंदन, अक्षत, पुष्प, धूप और दीप अर्पित करें।
- सातों ऋषियों के नाम कृतज्ञता के साथ लें; जहाँ ज्ञात हो, परिवार ऋषि पंचमी कथा या सरल स्तोत्र गाते हैं।
- फल या मान्य अन्न का नैवेद्य अर्पित करें, फिर आरती करें।
- बुद्धि, संयम और सबके कल्याण की प्रार्थना के साथ समापन करें, और प्रसाद बाँटें।
- पूजा के लिए किसी अभीष्ट मुहूर्त की पुष्टि किसी छपे नियत समय के बजाय अपने स्थानीय पंचांग से करें।
सामग्री (सामान्यतः तैयार रखी जाने वाली)
| श्रेणी | वस्तुएँ |
|---|---|
| आधार | चौकी, स्वच्छ वस्त्र, जल-सहित कलश |
| अर्पण | अक्षत, रोली/कुमकुम, चंदन, पुष्प, दूर्वा |
| दीप व सुगंध | घी का दीप, धूप, कर्पूर |
| नैवेद्य | ऋतु-फल, मान्य (हल-रहित) अन्न, गुड़ |
| पारंपरिक स्नान | अपामार्ग टहनी, मिट्टी — वैकल्पिक, जहाँ निभाई जाए |
| संकल्प हेतु | सुपारी/पान, दाहिनी हथेली में थोड़ा जल |
ऋषि पंचमी की कथा
पारंपरिक कथा, जो यहाँ शब्दशः शास्त्र नहीं बल्कि एक कथात्मक पुनर्कथन के रूप में दी गई है, एक भक्त दंपती उत्तंक और उनकी पत्नी सुशीला की है। कहा जाता है कि उनकी पुत्री ने अपने देहावसान के बाद एक निम्न योनि में जन्म लिया, और एक ऋषि ने बताया कि यह पूर्व जन्म में अनुष्ठान-शुद्धि के अनजाने चूक का परिणाम था। ऋषि के परामर्श पर परिवार ने सप्त ऋषियों के प्रति सच्ची भक्ति के साथ ऋषि पंचमी व्रत किया, और कथा उस हृदयपूर्ण अनुष्ठान से मिली शांति और पुण्य का वर्णन करती है। भिन्न क्षेत्रों में अपने-अपने वर्णन हैं; साझा सूत्र है ऋषियों के प्रति कृतज्ञता और सच्चे, अनुशासित हृदय का मूल्य।
इस व्रत की पुरानी व्याख्या आज कैसे समझी जाती है
परंपरागत रूप से ऋषि पंचमी को रजोधर्म के दौरान अनुष्ठानों से जुड़ी किसी अनजाने चूक की शुद्धि के व्रत के रूप में भी वर्णित किया गया है — यह व्याख्या पुरानी अनुष्ठान-संहिताओं से आती है। इसे ईमानदारी से और कोमलता से प्रस्तुत करना महत्वपूर्ण है। रजोधर्म जीवन का एक स्वाभाविक, स्वस्थ अंग है और इसमें कोई लज्जा नहीं है। आज अनेक परिवार, शिक्षक और विद्वान इस व्रत को मुख्यतः ऋषियों के प्रति आभार और आत्म-चिंतन के दिन के रूप में पढ़ते हैं, न कि अशुद्धता के कथन के रूप में। पुरानी व्याख्या को मानना, या कैसे मानना, यह एक व्यक्तिगत और पारिवारिक चुनाव है, और किसी को इसे मानने, अनुकूलित करने या छोड़ने के लिए निर्णय का अनुभव नहीं होना चाहिए।
यदि यह व्रत आपको ऋषियों से तथा विद्या व संयम के मूल्यों से जुड़ाव का अनुभव कराता है, तो वही भाव इस दिन का सर्वाधिक सम्मान है। यहाँ प्रस्तुत परंपरा में कोई भय या दंड नहीं है — केवल कृतज्ञता का निमंत्रण है।
गणेश चतुर्थी के अगले दिन का महत्व
ऋषि पंचमी गणेश चतुर्थी के एक दिन बाद और भाद्रपद के उस व्यस्त उत्सव-काल के भीतर आती है जो अनंत चतुर्दशी की ओर बढ़ता है। अनेक परिवार इसे पहले से चल रहे गणेश उत्सव में सहजता से जोड़ लेते हैं। आसपास के दिनों की योजना के लिए सितंबर 2026 हिंदू त्योहार कैलेंडर देखें, और निकटवर्ती उपवास-दिनों के लिए एकादशी तिथियाँ 2026 पृष्ठ देखें।
और पढ़ें
- भाद्रपद मास 2026 — मास पिलर
- सितंबर 2026 हिंदू त्योहार कैलेंडर
- अनंत चतुर्दशी 2026
- अमांत बनाम पूर्णिमांत
- एकादशी तिथियाँ 2026
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
ऋषि पंचमी 2026 की तिथि क्या है?
ऋषि पंचमी 2026 मंगलवार, 15 सितंबर 2026 को भाद्रपद शुक्ल पंचमी पर — गणेश चतुर्थी के अगले दिन — पड़ती है। चूँकि तिथि समय सूर्योदय व स्थान के अनुसार बदलता है, कृपया सटीक तिथि और मुहूर्त अपने स्थानीय पंचांग से मिला लें।
ऋषि पंचमी पर पूजित सप्त ऋषि कौन हैं?
सर्वाधिक प्रचलित सात ऋषि हैं कश्यप, अत्रि, भरद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वसिष्ठ। अनेक घरों में वसिष्ठ की पत्नी अरुंधती को भी अटूट सहचर्य के प्रतीक रूप में उनके साथ स्मरण किया जाता है।
ऋषि पंचमी व्रत का उद्देश्य क्या है?
यह परंपरागत रूप से धर्म के संरक्षक ऋषियों के प्रति कृतज्ञता और कोमल आत्म-चिंतन का दिन है। इसे भक्ति और अनुशासन के रूप में किया जाता है, सौदे के रूप में नहीं, और परंपरा इससे किसी भौतिक फल की गारंटी नहीं जोड़ती।
ऋषि पंचमी व्रत में क्या खा सकते हैं?
कई लोग हल्का, सात्त्विक उपवास करते हैं, फल या पृथ्वी को हल से जोते बिना उगे अन्न, गुड़ के साथ ग्रहण करते हैं — कम-से-कम हानि का प्रतीक। प्रथाएँ क्षेत्र और परिवार अनुसार भिन्न हैं, अतः अपनी रीति का पालन करें।
ऋषि पंचमी में अपामार्ग स्नान क्या है?
परंपरागत रूप से साधक अपामार्ग (चिरचिटा) की टहनी या पत्तियों के साथ मिट्टी व जल से स्नान करते हैं, कभी नदी पर। जहाँ यह संभव न हो, घर पर सरल, स्वच्छ व भावपूर्ण स्नान व्यापक रूप से स्वीकृत है; शुद्धि को प्रतीकात्मक समझा जाता है।
इस व्रत की रजोधर्म-शुद्धि वाली व्याख्या आज कैसे समझी जाती है?
पुरानी संहिताएँ इसे रजोधर्म के दौरान अनजाने चूक की शुद्धि के रूप में बताती हैं। रजोधर्म स्वाभाविक है और इसमें कोई लज्जा नहीं। आज अनेक परिवार व विद्वान इसे मुख्यतः आभार और चिंतन के रूप में पढ़ते हैं। पुरानी व्याख्या मानना व्यक्तिगत, पारिवारिक चुनाव है, बिना किसी निर्णय के।
घर पर ऋषि पंचमी पूजा कैसे करें?
स्वच्छ स्नान के बाद चौकी पर कलश और सात ऋषियों का प्रतीक रखें, संकल्प करें, जल, अक्षत, पुष्प, धूप व दीप अर्पित करें, ऋषियों के नाम लें, फल का नैवेद्य दें, आरती करें और प्रसाद बाँटें। मुहूर्त की पुष्टि स्थानीय पंचांग से करें।
ऋषि पंचमी गणेश चतुर्थी के ठीक बाद क्यों है?
दोनों भाद्रपद शुक्ल पक्ष में पड़ते हैं — गणेश चतुर्थी चौथी तिथि पर और ऋषि पंचमी पाँचवीं पर — इसलिए यह स्वाभाविक रूप से अगले दिन आती है और प्रायः चल रहे गणेश उत्सव में जुड़ जाती है।


