संक्षिप्त उत्तर: शारदीय नवरात्रि 2026 का व्रत 11 से 19 अक्टूबर तक रखा जाता है। इन दिनों भक्त सात्त्विक फलाहार लेते हैं—कुट्टू, सिंघाड़ा, साबूदाना, समा के चावल, फल, दूध और सेंधा नमक। अनाज, साधारण नमक, प्याज-लहसुन और तामसिक भोजन परंपरा में वर्जित रहता है।

नवरात्रि केवल नौ रातों की पूजा-आराधना का पर्व ही नहीं, बल्कि संयम, शुद्धि और सात्त्विक आहार का अवसर भी माना जाता है। परंपरा में इन दिनों भक्त अपने खान-पान को सरल और शुद्ध रखते हैं। शारदीय नवरात्रि 2026 का व्रतकाल 11 से 19 अक्टूबर तक रहेगा, और इसी अवधि में उपवास के नियमों का पालन किया जाता है।

यह लेख उन आहार-नियमों की सरल जानकारी देता है जो पीढ़ियों से घरों में निभाए जाते रहे हैं—किन चीज़ों को व्रत में अनुमत माना गया है, किनसे परहेज़ की परंपरा है, और क्षेत्र व परिवार के अनुसार इनमें क्या अंतर होते हैं। ये सभी बातें परंपरा के रूप में प्रस्तुत हैं; अपने परिवार और मंदिर की रीति को ही अंतिम मानें।

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नवरात्रि 2026 त्वरित जानकारी

  • पर्वशारदीय नवरात्रि 2026
  • व्रत अवधि11–19 अक्टूबर 2026
  • आराध्यमाँ दुर्गा के नौ स्वरूप
  • आहार शैलीसात्त्विक फलाहार / निराहार (परंपरानुसार)
  • अनुमत नमकसेंधा नमक
  • प्रमुख अन्न-विकल्पकुट्टू, सिंघाड़ा, समा, साबूदाना

तिथि की गणना पंचांग के अनुसार होती है और अमांत तथा पूर्णिमांत परंपराओं में तिथि-आरंभ का समय भिन्न हो सकता है। घटस्थापना और पारण के मुहूर्त क्षेत्र व पंचांग के अनुसार बदलते हैं, इसलिए सटीक समय के लिए अपने स्थानीय पंचांग या मंदिर से पुष्टि करें [VERIFY]।

व्रत में क्या खाएं — अनुमत आहार

व्रत में साधारणतः वही आहार लिया जाता है जिसे परंपरा में फलाहार कहा गया है। ये पदार्थ सात्त्विक माने जाते हैं और साधारण अनाज से भिन्न होते हैं।

  • कुट्टू (बकव्हीट) का आटा—पूरी, चीला या हलवा के रूप में
  • सिंघाड़े का आटा—व्रत की रोटी और पकवान
  • समा के चावल (मोरधन)—खिचड़ी और खीर
  • साबूदाना—खिचड़ी, खीर, वड़ा और पापड़
  • आलू, शकरकंद, अरबी, कच्चा केला जैसी सब्ज़ियाँ
  • मौसमी फल, सूखे मेवे और मखाना
  • दूध, दही, पनीर, घी और मलाई
  • सेंधा नमक तथा सादा मसाले—जीरा, काली मिर्च, हरी मिर्च, नींबू, हरा धनिया

व्रत में क्या न खाएं — वर्जित आहार

परंपरा के अनुसार व्रत के दिनों में साधारण अनाज, कुछ मसाले और तामसिक भोजन से परहेज़ किया जाता है।

  • गेहूँ, चावल, दाल, बेसन और साधारण अनाज
  • साधारण (आयोडाइज़्ड) नमक—इसके स्थान पर सेंधा नमक
  • प्याज और लहसुन
  • मांस, मछली, अंडा और मदिरा
  • हल्दी, धनिया-पाउडर, गरम मसाला जैसे कई मसाले (परिवार-रीति अनुसार)
  • बाज़ार का तला-भुना, अत्यधिक तेल-मसाले वाला भोजन

अनुमत और वर्जित — एक दृष्टि में

अनुमत (फलाहार)वर्जित (परंपरानुसार)
कुट्टू, सिंघाड़ा, समा, साबूदानागेहूँ, चावल, दाल, बेसन
सेंधा नमकसाधारण/आयोडाइज़्ड नमक
दूध, दही, फल, मखानाप्याज, लहसुन, तामसिक भोजन
आलू, शकरकंद, अरबीमांस, मछली, अंडा, मदिरा

व्रत रखने की परंपरागत विधि

  1. व्रत के पहले दिन प्रातः स्नान कर संकल्प लें और घर के पूजा-स्थान की शुद्धि करें।
  2. परिवार की रीति के अनुसार घटस्थापना या माँ दुर्गा की पूजा-अर्चना करें।
  3. दिन में एक बार या परंपरानुसार फलाहार लें; कई भक्त निर्जल अथवा फलाहारी व्रत रखते हैं।
  4. भोजन में सेंधा नमक और सात्त्विक सामग्री का ही प्रयोग करें।
  5. प्रतिदिन दुर्गा सप्तशती के पाठ, आरती या माँ के मंत्रों का जप परंपरा में शुभ माना जाता है।
  6. व्रत का पारण नवमी या दशमी को, कन्या-पूजन के बाद, पंचांग व परिवार-रीति के अनुसार करें।

क्षेत्रीय विविधताएँ

नवरात्रि व्रत की रीतियाँ भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग होती हैं। उत्तर भारत में कुट्टू, सिंघाड़ा और साबूदाना आधारित फलाहार सामान्य है, जबकि कई घरों में केवल फल-दूध पर व्रत रखा जाता है।

  • गुजरात व महाराष्ट्र में उपवास के साथ गरबा-डांडिया की परंपरा और साबूदाना पकवान प्रचलित हैं।
  • पूर्वी भारत में यह पर्व दुर्गा पूजा के रूप में मनाया जाता है, जहाँ अनुष्ठान व भोग की रीतियाँ भिन्न होती हैं।
  • दक्षिण भारत में कई परिवार गोलू (बोम्मई कोलु) सजाते हैं और सात्त्विक आहार लेते हैं।
  • कई घरों में केवल पहले और अंतिम दिन का व्रत रखा जाता है, तो कहीं पूरे नौ दिन।

व्रत कौन और कैसे रखता है

व्रत रखने को लेकर परंपरा में विविध मत हैं और समकालीन व्यवहार भी भिन्न-भिन्न है। परिवारों में यह पुरुष, स्त्री, विवाहित व अविवाहित—सभी द्वारा श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार रखा जाता है। यह लेख किसी को व्रत रखने या न रखने के लिए नियत नहीं करता; उपयुक्त रीति अपने परिवार और मंदिर की परंपरा के अनुसार ही चुनें।

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व्रत का स्वरूप भी भक्त की श्रद्धा और शारीरिक क्षमता पर निर्भर करता है—कोई निर्जल व्रत रखता है, कोई एक समय फलाहार, तो कोई पूरे नौ दिन सात्त्विक भोजन। जो भी रूप चुना जाए, वह अपनी सामर्थ्य के भीतर हो।

स्वास्थ्य संबंधी सावधानी: जिन्हें कोई रोग या स्वास्थ्य-समस्या हो, जो गर्भवती हों, अथवा किसी दवा पर हों, वे उपवास आरंभ करने से पहले अपने चिकित्सक से परामर्श अवश्य करें। व्रत को अपनी शारीरिक क्षमता के अनुरूप ही रखें।

आहार-संयम के साथ-साथ नवरात्रि आत्म-शुद्धि, संयम और भक्ति का पर्व है। सात्त्विक भोजन, स्वच्छता और मन की शांति के साथ रखा गया व्रत ही परंपरा में श्रेष्ठ माना गया है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

नवरात्रि 2026 का व्रत कब से कब तक है?

शारदीय नवरात्रि 2026 का व्रत 11 से 19 अक्टूबर तक रखा जाता है। घटस्थापना और पारण के सटीक मुहूर्त क्षेत्र और पंचांग के अनुसार भिन्न हो सकते हैं, इसलिए अपने स्थानीय पंचांग या मंदिर से पुष्टि करें।

नवरात्रि व्रत में क्या खा सकते हैं?

व्रत में कुट्टू, सिंघाड़ा, समा के चावल, साबूदाना, आलू-शकरकंद, फल, दूध, दही, मखाना और सेंधा नमक से बना सात्त्विक फलाहार लिया जाता है।

नवरात्रि व्रत में क्या नहीं खाना चाहिए?

परंपरा में गेहूँ-चावल जैसे साधारण अनाज, दाल, बेसन, साधारण नमक, प्याज-लहसुन तथा मांस-मछली-अंडा-मदिरा जैसे तामसिक भोजन से परहेज़ किया जाता है।

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क्या व्रत में साधारण नमक चल सकता है?

परंपरा के अनुसार व्रत में साधारण (आयोडाइज़्ड) नमक के स्थान पर सेंधा नमक का प्रयोग किया जाता है। नमक संबंधी नियम परिवार-रीति के अनुसार भी तय होते हैं।

क्या नवरात्रि में प्याज-लहसुन खा सकते हैं?

अधिकांश परंपराओं में प्याज और लहसुन को तामसिक माना जाता है, इसलिए व्रत के दिनों में इनसे परहेज़ की रीति है। अंतिम निर्णय अपने परिवार की परंपरा के अनुसार करें।

क्या साबूदाना और कुट्टू व्रत में अनुमत हैं?

हाँ, साबूदाना, कुट्टू (बकव्हीट) और सिंघाड़े का आटा परंपरागत रूप से व्रत के अनुमत फलाहार में आते हैं और इनसे खिचड़ी, चीला, पूरी व हलवा बनाया जाता है।

व्रत का पारण कब किया जाता है?

व्रत का पारण परंपरानुसार नवमी या दशमी को, प्रायः कन्या-पूजन के बाद किया जाता है। पारण का सटीक समय पंचांग और परिवार की रीति के अनुसार तय करें।

क्या हर किसी को नवरात्रि व्रत रखना चाहिए?

व्रत श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार रखा जाता है और इस पर परंपरा में विविध मत हैं। किसी रोग, गर्भावस्था या दवा की स्थिति में उपवास से पहले चिकित्सक से परामर्श करें और अपने परिवार-मंदिर की रीति का पालन करें।