कोकिला व्रत (कोयल व्रत) सुहागिन स्त्रियों का व्रत है जो आषाढ़ पूर्णिमा के दिन रखा जाता है। इस व्रत में देवी गौरी (पार्वती जी) की पूजा कोकिला (कोयल) के रूप में की जाती है।

कोकिला व्रत 2026 — तिथि

पौराणिक कथा

जब सती जी ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में स्वयं को आहुति देकर देह त्याग किया, तब वे कोकिला (कोयल) के रूप में दूसरे जन्म में पुनः जन्मीं और इंद्र-लोक में दस सहस्र वर्ष तपस्या की। फिर हिमालय की पुत्री पार्वती के रूप में जन्म लेकर शिव जी से पुनः मिलन हुआ।

इसी आख्यान की स्मृति में यह व्रत किया जाता है — सती-गौरी की कोकिला-तप के सम्मान में।

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व्रत-विधि

  1. प्रातः पवित्र स्नान करें व पीले वस्त्र पहनें।
  2. गौरी जी की प्रतिमा को पंचामृत स्नान कराएँ।
  3. सोलह श्रृंगार सामग्री (मेहंदी, चूड़ी, सिंदूर, बिंदी आदि) अर्पित करें।
  4. कोकिला-स्वरूप का ध्यान करें।
  5. दिन भर निराहार या केवल फलाहार रहें।
  6. सायंकाल चंद्र-दर्शन कर अर्घ्य दें।
  7. सुहागिन सखियों को 16 श्रृंगार बाँटें।

मंत्र

गौरी मंत्र: ॐ ह्रीं गौर्यै नमः

कोकिला मंत्र: ॐ कोकिलायै नमः

आषाढ़ पूर्णिमा का अन्य महत्व

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ॐ नमः शिवाय | ॐ ह्रीं गौर्यै नमः