एकादशी व्रत के नियम: क्या करें और क्या न करें
एकादशी पर क्या करें और क्या न करें — अन्न और दालों का त्याग, सात्त्विक दिन, भगवान विष्णु की पूजा, और पारण पर व्रत खोलना।

एकादशी पर क्या करें और क्या न करें — अन्न और दालों का त्याग, सात्त्विक दिन, भगवान विष्णु की पूजा, और पारण पर व्रत खोलना।
संक्षिप्त उत्तर: एकादशी पर अनेक भक्त व्रत रखते हैं, अन्न और दालों का त्याग करते हैं, दिन को सात्त्विक व भक्तिमय बिताते हैं और भगवान विष्णु के पूजन पर ध्यान देते हैं। व्रत अगले दिन प्रातः पारण समय में खोला जाता है, जो स्थानीय सूर्योदय से निकाला जाता है। परंपरा परिवार के अनुसार बदलती है।
एकादशी प्रत्येक चंद्रमास में दो बार आती है — एक शुक्ल पक्ष में और एक कृष्ण पक्ष में। अनेक वैष्णव और अन्य हिंदू परिवार इसे संयम और भगवान विष्णु की भक्ति के दिन के रूप में मनाते हैं। दिन का सार सरल है — हल्का भोजन या उपवास, सात्त्विक मन व आहार, और प्रार्थना तथा स्मरण की ओर ध्यान।
यह मार्गदर्शिका सामान्य 'क्या करें' और 'क्या न करें' को संतुलित रूप में बताती है। परंपराएँ परिवार और संप्रदाय के अनुसार भिन्न होती हैं, इसलिए इन्हें एक व्यापक रूप में अपनाई जाने वाली पद्धति मानें, कोई कठोर नियम नहीं। संदेह होने पर अपने परिवार की रीति या किसी वयोवृद्ध अथवा मंदिर से पूछें।
- आवृत्ति: प्रत्येक चंद्रमास में दो बार (शुक्ल व कृष्ण)
- देवता: भगवान विष्णु
- मुख्य आचरण: उपवास या हल्का सात्त्विक भोजन + पूजन
- त्याग: चावल व अन्न, अधिकांश दालें
- व्रत खुलता है: अगले प्रातः पारण में (स्थानीय सूर्योदय से)
- समय पुष्टि: अपने नगर का स्थानीय पंचांग
एकादशी पर क्या करें
करने योग्य बातें दिन को सरल, स्वच्छ और भक्तिमय रखने पर केंद्रित हैं। इनका उद्देश्य किसी निश्चित फल की प्राप्ति नहीं, बल्कि संयम और भक्ति की अभिव्यक्ति है।
- प्रातः जल्दी उठें, स्नान करें और छोटी प्रार्थना या संकल्प से दिन आरंभ करें।
- मन को सात्त्विक रखें — शांत वाणी, सत्य, और दिनभर क्रोध व निंदा से बचाव।
- भगवान विष्णु का पूजन करें — दीप जलाएँ, तुलसी दल, पुष्प और फल अर्पित करें, और उनके स्मरण में समय बिताएँ।
- विष्णु के नामों का जप या श्रवण करें। विष्णु सहस्रनाम — विष्णु के एक सहस्र नामों की पारंपरिक स्तुति — प्रायः पढ़ी या सुनी जाती है; यदि पाठ में संशय हो तो ध्यानपूर्वक श्रवण भी पूर्णतः उचित है।
- उस विशेष एकादशी की कथा, या भागवत अथवा गीता का कोई अंश पढ़ें या सुनें।
- यदि भोजन करें तो अनुमत सात्त्विक आहार (तालिका देखें) थोड़ी मात्रा में लें।
- अगले प्रातः पारण के समय में व्रत खोलें, जो आपके स्थानीय सूर्योदय से निकाला जाता है।
एकादशी पर क्या न करें
सबसे प्रसिद्ध नियम आहार का है — अन्न और अधिकांश दालें उस दिन त्याग दी जाती हैं। पारंपरिक कारण संयम और लघुता का है, न कि यह कि भोजन स्वयं अशुद्ध है।
- चावल और सभी चावल-निर्मित पदार्थ — यह सर्वाधिक बल दिया गया त्याग है।
- गेहूँ, तथा रोटी, ब्रेड व अन्य अन्न के आटे।
- अधिकांश दालें और उनसे बने पदार्थ।
- प्याज और लहसुन, जिन्हें व्रत के दिन राजसिक/तामसिक माना जाता है।
- अनुमत भोजन का भी अति सेवन — दिन का भाव लघुता है।
- क्रोध, कठोर वचन, निंदा और कलह; व्रत तन और मन दोनों का है।
- दिनभर सोना; परंपरा जागरूक स्मरण को महत्व देती है, कुछ रात्रि जागरण भी करते हैं।
अनुमत और वर्जित आहार — एक दृष्टि में
| वर्ग | प्रायः वर्जित | प्रायः ग्रहण |
|---|---|---|
| अन्न | चावल, गेहूँ, बाजरा, सूजी | — |
| दालें | अधिकांश दालें व फलियाँ | — |
| सब्जियाँ | प्याज, लहसुन | आलू, शकरकंद, कद्दू, लौकी |
| दुग्ध | — | दूध, दही, घी, पनीर |
| फल-मेवे | — | ताजे फल, सूखे मेवे, नट्स |
| अन्य | सादा नमक (कुछ त्यागते हैं) | सेंधा नमक, साबूदाना |
व्रत के दिन प्रायः खाए जाने वाले भोजन के विस्तृत विवरण के लिए देखें एकादशी भोजन सूची। परिवार भिन्न होते हैं, इसे मार्गदर्शक मानें।
व्रत खोलना — पारण
व्रत एकादशी पर नहीं, अगले प्रातः द्वादशी को खोला जाता है। इसे पारण कहते हैं। इसे सूर्योदय के बाद एक निश्चित अवधि में करना चाहिए, और परंपरागत रूप से हरि वासर (द्वादशी का प्रथम चतुर्थांश) में तथा दिन में बहुत देर से नहीं।
सही अवधि आपके स्थानीय सूर्योदय और तिथि के समय पर निर्भर करती है, इसलिए किसी सामान्य समय के बजाय अपने नगर के विश्वसनीय स्थानीय पंचांग से पारण की पुष्टि अवश्य करें। देखें पारण समय की व्याख्या।
स्वास्थ्य संबंधी सूचना
उपवास एक व्यक्तिगत और स्वैच्छिक भक्ति-अभ्यास है, कोई स्वास्थ्य-नुस्खा नहीं। किसी रोग से ग्रस्त, गर्भवती या स्तनपान कराने वाली, वृद्ध, बालक, अथवा अस्वस्थ व्यक्ति को चिकित्सक से परामर्श करना चाहिए और उपवास आवश्यक नहीं। अनेक जन फल और दूध के साथ आंशिक व्रत रखते हैं, जो पूर्णतः स्वीकृत रूप है।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
एकादशी पर अन्न क्यों त्यागा जाता है?
परंपरा भक्ति के दिन संयम और लघुता के भाव से चावल, गेहूँ और अन्य अन्न त्याग देती है। यह व्रत का अनुशासन है, न कि यह कि अन्न अशुद्ध है; प्रथाएँ परिवार और संप्रदाय के अनुसार भिन्न होती हैं।
क्या एकादशी पर कुछ भी खा सकते हैं?
हाँ — अनेक जन आंशिक व्रत रखते हैं। अनुमत सात्त्विक आहार में फल, दूध, दही, घी, आलू, साबूदाना और सेंधा नमक शामिल हैं। कुछ निर्जल कठोर व्रत रखते हैं, कुछ केवल फल-दूध लेते हैं। अपने परिवार की रीति का पालन करें।
क्या एकादशी पर प्याज-लहसुन ले सकते हैं?
अधिकांश जन व्रत के दिन प्याज-लहसुन का त्याग करते हैं, क्योंकि इन्हें राजसिक या तामसिक माना जाता है। दिन में सरल, सात्त्विक भोजन को महत्व दिया जाता है जो मन को शांत और पूजन के लिए स्पष्ट रखे।
पारण क्या है और कब किया जाता है?
पारण अगले प्रातः द्वादशी को एकादशी व्रत खोलना है, जो सूर्योदय के बाद एक निश्चित अवधि में होता है। सही समय स्थानीय सूर्योदय और तिथि पर निर्भर है, अतः अपने नगर के विश्वसनीय पंचांग से पुष्टि करें।
एकादशी पर किन्हें व्रत नहीं रखना चाहिए?
किसी रोग से ग्रस्त, गर्भवती या स्तनपान कराने वाली, वृद्ध, बालक या अस्वस्थ व्यक्ति को चिकित्सक से परामर्श करना चाहिए और व्रत आवश्यक नहीं। फल-दूध के साथ आंशिक व्रत, या बिना उपवास के केवल पूजन, पूर्णतः स्वीकृत है।
एकादशी पूजन कैसे किया जाता है?
भक्त स्नान कर दीप जलाते हैं और भगवान विष्णु को तुलसी, पुष्प व फल अर्पित करते हैं। अनेक जन उनके नामों का जप या श्रवण करते हैं — विष्णु सहस्रनाम प्रायः पढ़ा या सुना जाता है — और शांत, भक्तिमय दिन में एकादशी कथा पढ़ते हैं।
क्या एकादशी व्रत से कोई फल निश्चित होता है?
नहीं। एकादशी श्रद्धा और संयम की भक्ति-साधना है; यह किसी निश्चित फल का सौदा नहीं। इसे भक्ति और आत्म-अनुशासन के रूप में किया जाता है, जिसका लाभ आध्यात्मिक समझा जाता है, कोई सुनिश्चित भौतिक प्राप्ति नहीं।
एकादशी कितनी बार आती है?
एकादशी प्रत्येक चंद्रमास में दो बार आती है — एक शुक्ल पक्ष में और एक कृष्ण पक्ष में — जिससे वर्ष में लगभग 24 होती हैं, और अधिक मास में एक अतिरिक्त जोड़ी होती है।

