धनु संक्रांति 2026: तिथि, महत्व और सूर्य के धनु राशि में प्रवेश की पूजा-विधि
धनु संक्रांति 2026 बुधवार 16 दिसंबर को मनाई जाएगी, जब सूर्य वृश्चिक से धनु राशि में प्रवेश करते हैं और खरमास आरंभ होता है। जानें इसका महत्व और पूजा-विधि।

धनु संक्रांति 2026 बुधवार 16 दिसंबर को मनाई जाएगी, जब सूर्य वृश्चिक से धनु राशि में प्रवेश करते हैं और खरमास आरंभ होता है। जानें इसका महत्व और पूजा-विधि।
संक्षिप्त उत्तर: धनु संक्रांति 2026 बुधवार, 16 दिसंबर 2026 को मनाई जाएगी। इस दिन सूर्य वृश्चिक राशि से निकलकर धनु राशि में प्रवेश करते हैं, जिससे खरमास (धनुर्मास) आरंभ होता है और मांगलिक कार्य लगभग एक माह के लिए स्थगित रहते हैं।
धनु संक्रांति उन बारह संक्रांतियों में से एक है जो हर वर्ष सूर्य के एक राशि से दूसरी राशि में संक्रमण पर आती हैं। वर्ष 2026 में जब सूर्य वृश्चिक राशि को छोड़कर धनु राशि में प्रवेश करते हैं, तो यह पर्व मनाया जाता है। इसी क्षण से खरमास अथवा धनुर्मास का आरंभ माना जाता है, जो परंपरा में विवाह जैसे शुभ मांगलिक कार्यों के लिए वर्जित काल कहा गया है।
इस दिन को स्नान, दान, सूर्य-उपासना और भगवान विष्णु की आराधना का विशेष पुण्यकाल माना जाता है। पूर्वी भारत—विशेषकर ओडिशा—में यह पर्व विशेष धूमधाम से मनाया जाता है, जहाँ भगवान जगन्नाथ को अर्पित 'धनु मुआँ' नामक भोग इसकी पहचान है।
धनु संक्रांति 2026 तिथि और पुण्यकाल
पंचांग गणना के अनुसार धनु संक्रांति 2026 बुधवार, 16 दिसंबर 2026 को है। संक्रांति का पुण्यकाल सूर्य के राशि-परिवर्तन के क्षण के आसपास माना जाता है। चूँकि संक्रांति क्षण एवं पुण्यकाल की सटीक घड़ियाँ स्थान (अक्षांश-देशांतर) के अनुसार बदलती हैं, अतः अपने नगर के स्थानीय पंचांग या परिवार के पुरोहित/मंदिर से पुष्टि अवश्य कर लें।
- पर्व का नामधनु संक्रांति (धनुर्मास आरंभ)
- तिथिबुधवार, 16 दिसंबर 2026 [VERIFY]
- राशि-संक्रमणसूर्य का वृश्चिक से धनु राशि में प्रवेश
- संबंधित कालखरमास / धनुर्मास आरंभ
- प्रमुख कर्मस्नान, दान, सूर्य-उपासना, विष्णु-पूजा
- प्रमुख क्षेत्रओडिशा, दक्षिण भारत, उत्तर भारत
ध्यान दें कि संक्रांति का पुण्यकाल दोपहर से पहले या बाद पड़ने के आधार पर पंचांगकार उसे अलग-अलग रूप में परिभाषित करते हैं। किसी विशेष मुहूर्त की घड़ी यहाँ नहीं दी जा रही; कृपया अपने स्थानीय पंचांग की समय-सारणी देखें।
धनु संक्रांति का धार्मिक महत्व
शास्त्रीय परंपरा में सूर्य के धनु राशि में प्रवेश को 'देवगुरु' बृहस्पति की राशि में सूर्य के आगमन के रूप में देखा जाता है। इसी अवधि को धनुर्मास कहते हैं, जिसमें भगवान विष्णु एवं सूर्य की उपासना का विशेष विधान बताया गया है। दक्षिण भारत में यह मास 'मार्गशीर्ष/धनुर्मास' आराधना का काल माना जाता है, जब प्रातःकालीन तिरुप्पावै एवं तिरुवेम्पावै जैसे भक्ति-पाठों की परंपरा है।
यह मान्यता परंपरा के रूप में प्रस्तुत है। इसे धन, संतान, विवाह या स्वास्थ्य के किसी निश्चित फल की गारंटी के रूप में न लें; इसका भाव भक्ति, संयम और सेवा है।
खरमास (धनुर्मास) और मांगलिक कार्य
धनु संक्रांति से खरमास आरंभ होकर मकर संक्रांति तक चलता है, जब सूर्य पुनः राशि बदलते हैं। लोक-परंपरा में इस अवधि में विवाह, गृह-प्रवेश, मुंडन जैसे बड़े मांगलिक कार्य स्थगित रखे जाते हैं, जबकि नित्य पूजा, जप, दान, तीर्थ-स्नान और भजन-कीर्तन को श्रेष्ठ माना जाता है। यह पूर्णतः पारंपरिक विश्वास है; किस कार्य को कब करना है, इसका निर्णय अपने कुल-परंपरा एवं पुरोहित के परामर्श से करें।
धनु संक्रांति पूजा-विधि
नीचे दी गई पूजा-विधि सामान्य परंपरा पर आधारित है। क्षेत्र और कुल-परंपरा के अनुसार इसमें अंतर संभव है।
- ब्रह्म मुहूर्त में उठकर पवित्र नदी, सरोवर या घर पर ही स्वच्छ जल से स्नान करें; संभव हो तो जल में गंगाजल मिलाएँ।
- स्वच्छ वस्त्र धारण कर पूर्व दिशा की ओर मुख करके सूर्य को अर्घ्य दें और सूर्य-मंत्रों का स्मरण करें।
- भगवान विष्णु/सूर्य का ध्यान कर दीप-धूप, पुष्प, अक्षत एवं तुलसी अर्पित करें।
- यथाशक्ति व्रत, जप अथवा भक्ति-पाठ का संकल्प लें।
- अन्न, वस्त्र, तिल, गुड़ आदि का यथासामर्थ्य दान करें।
- अंत में आरती कर प्रसाद ग्रहण करें और परिवार में वितरित करें।
स्नान और दान का महत्व
संक्रांति पर स्नान एवं दान को विशेष पुण्यदायी माना गया है। परंपरा में तिल, गुड़, अन्न, वस्त्र और कंबल जैसे शीत-ऋतु में उपयोगी वस्तुओं के दान की महिमा कही गई है। दान का वास्तविक भाव जरूरतमंदों की सेवा और अहंकार-त्याग है।
- तिल एवं गुड़ का दान
- अन्न (चावल/दाल) एवं वस्त्र का दान
- शीतकाल में कंबल का दान
- गौ-सेवा एवं पक्षियों को दाना
क्षेत्रीय परंपराएँ
भारत के विभिन्न भागों में धनु संक्रांति एवं धनुर्मास की परंपराएँ भिन्न रूप में दिखती हैं।
| क्षेत्र | प्रमुख परंपरा |
|---|---|
| ओडिशा | पुरी में भगवान जगन्नाथ को 'धनु मुआँ' भोग; धनुर्मास भर विशेष आराधना |
| तमिलनाडु / दक्षिण भारत | धनुर्मास में प्रातःकालीन तिरुप्पावै-तिरुवेम्पावै पाठ एवं विष्णु-उपासना |
| उत्तर भारत | स्नान-दान, सूर्य-अर्घ्य एवं खरमास में मांगलिक कार्यों का विराम |
| आंध्र-तेलंगाना | धनुर्मास में मुग्गु/रंगोली एवं प्रातःकालीन पूजा की परंपरा |
व्रत कौन और कैसे रखे
धनु संक्रांति पर उपवास कोई अनिवार्य विधान नहीं है; अनेक भक्त इस दिन स्नान-दान और सूर्य-उपासना तक ही सीमित रहते हैं, जबकि कुछ श्रद्धालु फलाहार या निर्जल व्रत का संकल्प लेते हैं। स्त्री-पुरुष, विवाहित-अविवाहित—व्रत के अधिकार को लेकर परंपराओं में भिन्न मत मिलते हैं और आज व्यापक रूप से इसे व्यक्तिगत श्रद्धा का विषय माना जाता है। कोई नियम थोपे बिना, अपने कुल एवं मंदिर की परंपरा का अनुसरण करें।
यदि आप उपवास करना चाहते हैं, तो किसी भी प्रकार की चिकित्सकीय स्थिति वाले, गर्भवती अथवा स्तनपान कराने वाली महिलाएँ और वृद्ध या रोगी व्यक्ति व्रत से पूर्व अपने चिकित्सक से परामर्श अवश्य कर लें। व्रत का स्वरूप अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार ही चुनें।
मंत्र और आराधना
इस दिन सूर्य-उपासना में पारंपरिक 'ॐ सूर्याय नमः' जैसे बीज-नाम मंत्रों तथा प्रसिद्ध 'आदित्य हृदय स्तोत्र' का पाठ किया जाता है। आदित्य हृदय स्तोत्र एक दीर्घ स्तोत्र है, अतः यहाँ उसका पूर्ण पाठ न देकर केवल उल्लेख किया जा रहा है; इसे प्रामाणिक पंचांग या स्तोत्र-संग्रह से देखकर पढ़ें। विष्णु-उपासक 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का जप भी करते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
धनु संक्रांति 2026 कब है?
धनु संक्रांति 2026 बुधवार, 16 दिसंबर 2026 को है [VERIFY]। इस दिन सूर्य वृश्चिक राशि से धनु राशि में प्रवेश करते हैं। सटीक पुण्यकाल की घड़ी के लिए अपने स्थानीय पंचांग या पुरोहित से पुष्टि करें।
धनु संक्रांति पर क्या होता है?
इस दिन सूर्य धनु राशि में प्रवेश करते हैं और खरमास (धनुर्मास) आरंभ होता है। परंपरा में स्नान, दान, सूर्य-अर्घ्य एवं विष्णु-उपासना की जाती है और विवाह जैसे बड़े मांगलिक कार्य स्थगित रखे जाते हैं।
खरमास कब से कब तक रहता है?
खरमास धनु संक्रांति से आरंभ होकर मकर संक्रांति तक, अर्थात लगभग एक माह चलता है, जब सूर्य पुनः राशि बदलकर मकर में प्रवेश करते हैं। इस अवधि की सही तिथियाँ अपने पंचांग से देखें।
क्या खरमास में विवाह किया जा सकता है?
लोक-परंपरा में खरमास के दौरान विवाह, गृह-प्रवेश जैसे बड़े मांगलिक कार्य स्थगित रखे जाते हैं। यह पारंपरिक विश्वास है; कोई कार्य करना है या नहीं, इसका निर्णय अपने कुल-परंपरा एवं पुरोहित के परामर्श से करें।
धनु संक्रांति पर क्या दान करना चाहिए?
परंपरा में तिल, गुड़, अन्न, वस्त्र और शीतकाल में उपयोगी कंबल आदि का दान पुण्यदायी माना गया है। दान का वास्तविक भाव जरूरतमंदों की सेवा है; यथाशक्ति दान करें।
धनु संक्रांति पर व्रत कौन रख सकता है?
व्रत अनिवार्य नहीं है और इसे व्यापक रूप से व्यक्तिगत श्रद्धा का विषय माना जाता है। परंपराओं में मत भिन्न हैं, अतः अपने कुल एवं मंदिर की परंपरा का अनुसरण करें। चिकित्सकीय स्थिति वाले, गर्भवती या रोगी व्यक्ति व्रत से पूर्व चिकित्सक से परामर्श लें।
ओडिशा में धनु संक्रांति क्यों विशेष है?
ओडिशा में, विशेषकर पुरी में, धनुर्मास के दौरान भगवान जगन्नाथ को 'धनु मुआँ' नामक भोग अर्पित किया जाता है और विशेष आराधना होती है, जिससे यह पर्व वहाँ विशेष महत्व रखता है।
धनुर्मास में कौन-सी उपासना श्रेष्ठ मानी जाती है?
धनुर्मास में प्रातःकालीन सूर्य एवं भगवान विष्णु की उपासना श्रेष्ठ मानी जाती है। दक्षिण भारत में तिरुप्पावै-तिरुवेम्पावै पाठ की परंपरा है; उत्तर भारत में स्नान-दान एवं सूर्य-अर्घ्य को महत्व दिया जाता है।

