संक्षिप्त उत्तर: अट्ला तड्डी 2026 बुधवार, 28 अक्टूबर 2026 को मनाया जाएगा। यह तेलुगु पंचांग (अमांत) के अश्विन मास की कृष्ण पक्ष तृतीया (तड़िया) तिथि का पर्व है, जिसमें विवाहित महिलाएँ गौरी देवी की पूजा और चंद्रोदय के दर्शन के बाद व्रत पूर्ण करती हैं।

अट्ला तड्डी आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की महिलाओं का एक विशेष पर्व है, जिसमें विवाहित स्त्रियाँ पति की दीर्घायु और सुखी दांपत्य जीवन की कामना से गौरी देवी की आराधना करती हैं। यह पर्व गोरिंटाकु (मेहँदी), अट्लु (चावल की मुलायम रोटी) और रात में चंद्रमा के दर्शन की परंपरा के लिए जाना जाता है। 2026 में यह पर्व 28 अक्टूबर को पड़ रहा है।

अट्ला तड्डी 2026 कब है?

तेलुगु पंचांग (अमांत गणना) के अनुसार अट्ला तड्डी अश्विन मास की कृष्ण पक्ष तृतीया (तड़िया) तिथि को मनाया जाता है। यही तिथि उत्तर भारत की पूर्णिमांत गणना में कार्तिक मास की कृष्ण तृतीया के रूप में आती है — मास का नाम अलग है, पर तिथि एक ही है। किस परंपरा में किस नाम से गणना करनी है, यह अपने परिवार और स्थानीय पुरोहित की रीति के अनुसार तय करें।

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  • पर्वअट्ला तड्डी (अट्ला तद्दे)
  • वर्ष 2026 तिथिबुधवार, 28 अक्टूबर 2026
  • तिथिअश्विन कृष्ण तृतीया (तड़िया)
  • तिथि आरंभ27 अक्टूबर 2026, सायं 6:36 बजे [VERIFY]
  • तिथि समाप्ति28 अक्टूबर 2026, दोपहर 3:36 बजे [VERIFY]
  • चंद्रोदय (नई दिल्ली)लगभग रात्रि 7:31 बजे [VERIFY]
  • मुख्य क्षेत्रआंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तेलुगु प्रवासी समुदाय
  • आराध्यगौरी देवी (पार्वती)

ऊपर दिए गए समय एक सामान्य पंचांग संदर्भ पर आधारित हैं और स्थान के अनुसार बदलते हैं। तिथि आरंभ-समाप्ति और चंद्रोदय के सटीक समय के लिए अपने नगर के तेलुगु पंचांग या स्थानीय मंदिर से पुष्टि अवश्य करें।

अट्ला तड्डी का महत्व और परंपरा

'अट्लु' का अर्थ है चावल और उड़द दाल के घोल से बनी मुलायम रोटी (डोसा जैसी) और 'तड्डी' तड़िया यानी तृतीया तिथि का संकेत है। परंपरागत रूप से माना जाता है कि इस दिन देवी गौरी की आराधना से सौभाग्य और दांपत्य सुख की प्रार्थना की जाती है। यह मान्यता और भाव परंपरा के रूप में प्रस्तुत हैं; इसे किसी निश्चित फल की गारंटी के रूप में न लें।

गोरिंटाकु, अट्लु और झूला — पर्व के प्रमुख रंग

  • गोरिंटाकु (मेहँदी): आगे की रात या पर्व के दिन महिलाएँ और युवतियाँ हाथों पर मेहँदी रचाती हैं — यह पर्व की सबसे प्रिय परंपराओं में से एक है।
  • अट्लु का नैवेद्य: चावल-दाल के घोल से बने अट्लु बनाकर देवी को अर्पित किए जाते हैं और बायना के रूप में सुहागिन स्त्रियों में बाँटे जाते हैं।
  • उयाला (झूला): कई घरों और मुहल्लों में झूला झूलने की परंपरा उत्सव के उल्लास का प्रतीक है।
  • गौरी पूजा: हल्दी से बनी गौरी प्रतिमा की पूजा, दीप, पुष्प और नैवेद्य के साथ की जाती है।

अट्ला तड्डी व्रत — कौन और कैसे रखते हैं?

परंपरागत रूप से यह व्रत विवाहित महिलाएँ पति की दीर्घायु और सुखी दांपत्य के भाव से रखती हैं। कुछ क्षेत्रों में अविवाहित युवतियाँ भी सुयोग्य वर की कामना से इसमें भाग लेती हैं। आधुनिक व्यवहार में परिवारों की रीतियाँ भिन्न होती हैं — किसे और कैसे व्रत रखना है, इसका निर्णय अपने परिवार और मंदिर की परंपरा के अनुसार करें; यह लेख किसी को व्रत के लिए बाध्य या वर्जित नहीं करता।

व्रत में प्रायः दिनभर उपवास रखकर रात में चंद्रोदय के दर्शन के बाद जल और भोजन ग्रहण किया जाता है। यदि आपको कोई स्वास्थ्य समस्या है, आप गर्भवती हैं या किसी चिकित्सीय स्थिति में हैं, तो उपवास रखने से पहले कृपया अपने चिकित्सक से परामर्श अवश्य लें।

अट्ला तड्डी पूजा विधि (चरण-दर-चरण)

  1. प्रातः जल्दी उठकर स्नान करें, स्वच्छ या नए वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें।
  2. पूजा स्थान को स्वच्छ कर हल्दी से गौरी देवी की प्रतिमा बनाएँ या चित्र स्थापित करें और दीप जलाएँ।
  3. देवी को हल्दी-कुमकुम, पुष्प, फल और नैवेद्य अर्पित करें।
  4. अट्लु तैयार कर देवी को भोग लगाएँ; परंपरा अनुसार सुहागिन स्त्रियों में बायना बाँटें।
  5. दिनभर उपवास रखें और गौरी देवी का स्मरण एवं प्रार्थना करते रहें।
  6. रात में चंद्रोदय होने पर चंद्रमा को अर्घ्य दें, दर्शन करें और फिर भोजन ग्रहण कर व्रत का पारण करें।

क्षेत्रीय विविधताएँ

क्षेत्र / समुदायविशेष परंपरा
तटीय आंध्रअट्लु और बायना बाँटने पर विशेष जोर; झूला परंपरा प्रमुख
तेलंगानागौरी पूजा और गोरिंटाकु की रीति के साथ पारिवारिक उत्सव
रायलसीमाव्रत और चंद्रोदय दर्शन पर केंद्रित सादगीपूर्ण अनुष्ठान
प्रवासी तेलुगु समुदायस्थानीय चंद्रोदय समय के अनुसार पूजा; सामूहिक आयोजन

इन विविधताओं में कोई एक 'सही' या 'गलत' नहीं है — हर परिवार और क्षेत्र की अपनी रीति सम्माननीय है। संशय होने पर अपने बुज़ुर्गों और स्थानीय मंदिर के मार्गदर्शन का पालन करें।

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मंत्र और प्रार्थना

पूजा में देवी गौरी (पार्वती) का ध्यान करते हुए पारंपरिक 'ॐ गौर्यै नमः' जैसे सरल नामजप और प्रचलित सार्वजनिक गौरी स्तुति का पाठ किया जाता है। दीर्घ स्तोत्रों को यहाँ पूरा उद्धृत करने के बजाय, आप अपने परिवार में प्रचलित पारंपरिक पाठ का ही अनुसरण करें।

पर्व मनाते समय ध्यान देने योग्य बातें

  • दीप और खुली ज्वाला के पास सावधानी रखें, विशेषकर बच्चों और वस्त्रों को लेकर।
  • उपवास में स्वास्थ्य का ध्यान रखें; असुविधा होने पर तुरंत परामर्श लें।
  • तिथि और चंद्रोदय के सटीक समय की पुष्टि स्थानीय पंचांग से करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अट्ला तड्डी 2026 कब है?

अट्ला तड्डी 2026 बुधवार, 28 अक्टूबर 2026 को मनाया जाएगा। यह तेलुगु अमांत पंचांग के अश्विन मास की कृष्ण पक्ष तृतीया (तड़िया) तिथि का पर्व है।

अट्ला तड्डी की तिथि अलग-अलग पंचांगों में क्यों बदलती दिखती है?

अमांत गणना में यह अश्विन कृष्ण तृतीया है, जबकि पूर्णिमांत गणना में यही तिथि कार्तिक कृष्ण तृतीया कहलाती है। मास का नाम अलग है पर तिथि एक ही है; अपने परिवार और मंदिर की रीति का पालन करें।

अट्ला तड्डी का क्या अर्थ है?

'अट्लु' चावल-दाल के घोल से बनी मुलायम रोटी को कहते हैं और 'तड्डी' तड़िया यानी तृतीया तिथि का संकेत है। इस दिन गौरी देवी की पूजा में अट्लु का विशेष नैवेद्य होता है।

अट्ला तड्डी व्रत कौन रख सकता है?

परंपरागत रूप से इसे विवाहित महिलाएँ रखती हैं; कुछ क्षेत्रों में अविवाहित युवतियाँ भी भाग लेती हैं। आधुनिक व्यवहार में रीतियाँ भिन्न होती हैं, इसलिए निर्णय अपने परिवार और मंदिर की परंपरा के अनुसार करें।

क्या उपवास में स्वास्थ्य का ध्यान रखना ज़रूरी है?

हाँ। यदि आपको कोई स्वास्थ्य समस्या है, आप गर्भवती हैं या किसी चिकित्सीय स्थिति में हैं, तो उपवास से पहले अपने चिकित्सक से परामर्श अवश्य लें।

गोरिंटाकु का पर्व में क्या महत्व है?

गोरिंटाकु यानी मेहँदी अट्ला तड्डी की सबसे प्रिय परंपराओं में से एक है, जिसे महिलाएँ और युवतियाँ पर्व की शुभ रात या दिन हाथों पर रचाती हैं।

चंद्रोदय के दर्शन का क्या स्थान है?

व्रत रखने वाली महिलाएँ रात में चंद्रोदय होने पर चंद्रमा के दर्शन और अर्घ्य के बाद व्रत का पारण करती हैं। चंद्रोदय का सटीक समय स्थान अनुसार बदलता है, इसलिए स्थानीय पंचांग से पुष्टि करें।

अट्ला तड्डी मुख्यतः कहाँ मनाया जाता है?

यह पर्व मुख्यतः आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में तथा विश्वभर के तेलुगु प्रवासी समुदायों में मनाया जाता है, जहाँ स्थानीय चंद्रोदय समय के अनुसार पूजा की जाती है।