स्वामी विवेकानंद की जीवनीमहान हिंदू संत। उनके जन्म, शिक्षा, आध्यात्मिक यात्रा, मुख्य उपदेश, उपलब्धियाँ और सनातन धर्म पर प्रभाव की संपूर्ण कहानी।

मुख्य बिंदु

  • प्रारंभिक जीवन और परिवार

  • आध्यात्मिक जागरण और गुरु परंपरा

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  • प्रमुख उपदेश और दर्शन

  • सनातन धर्म में योगदान

  • समकालीन प्रासंगिकता और विरासत

पूरी विस्तृत जीवनी अंग्रेजी संस्करण में पढ़ें — हिंदी अनुवाद जल्द ही उपलब्ध होगा।


संपूर्ण लेख — स्वामी विवेकानंद Biography (English)

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स्वामी विवेकानंद का प्रारंभिक जीवन और परिवार कैसा था?

स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता (तत्कालीन कलकत्ता) के सिमुलिया मोहल्ले में हुआ था। उनका जन्म नाम नरेंद्रनाथ दत्त था। पिता विश्वनाथ दत्त कलकत्ता उच्च न्यायालय में अटॉर्नी थे और पश्चिमी विचारों के प्रति उदार दृष्टिकोण रखते थे, जबकि माता भुवनेश्वरी देवी गहरी शिवभक्त थीं।

बाल्यकाल से ही नरेंद्र असाधारण स्मृति और तीव्र जिज्ञासा के धनी थे। उन्होंने कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज और स्कॉटिश चर्च कॉलेज में अध्ययन किया, जहाँ उन्होंने पाश्चात्य दर्शन, इतिहास और विज्ञान का गहन अध्ययन किया। इसी काल में डेविड ह्यूम, इमैनुअल काण्ट और हर्बर्ट स्पेन्सर के विचारों ने उनके मन में आध्यात्मिक प्रश्नों की लौ और तेज़ की।

श्री रामकृष्ण परमहंस से शिष्यता: एक आध्यात्मिक क्रांति का आरंभ

सन् 1881 में नरेंद्रनाथ की भेंट दक्षिणेश्वर काली मंदिर, कोलकाता के पुजारी श्री रामकृष्ण परमहंस से हुई। नरेंद्र ने उनसे सीधे प्रश्न किया — 'क्या आपने ईश्वर को देखा है?' रामकृष्ण का उत्तर था — 'हाँ, मैं उन्हें उसी प्रकार देखता हूँ जैसे तुम्हें देख रहा हूँ।' यही वह क्षण था जिसने नरेंद्र के जीवन की दिशा सदा के लिए बदल दी।

रामकृष्ण परमहंस ने अद्वैत वेदांत, भक्ति और तंत्र की साधना का जो समन्वय प्रस्तुत किया, वह नरेंद्र के तर्कशील मन को धीरे-धीरे प्रत्यक्ष अनुभव की ओर ले गया। उपनिषदों के 'अहं ब्रह्मास्मि' और 'तत्त्वमसि' जैसे महावाक्यों का अर्थ उन्हें गुरु की संगति में जीवंत रूप में समझ आया। 1886 में रामकृष्ण परमहंस के महासमाधि लेने के पश्चात् नरेंद्र ने संन्यास ग्रहण किया और 'विवेकानंद' नाम धारण किया।

शिकागो धर्म संसद 1893: वह ऐतिहासिक भाषण जिसने विश्व को बदला

11 सितंबर 1893 को शिकागो की विश्व धर्म संसद (Parliament of the World's Religions) में स्वामी विवेकानंद ने 'Sisters and Brothers of America' कहकर अपना उद्बोधन आरंभ किया। इन शब्दों पर सभागार में उपस्थित हज़ारों श्रोता खड़े होकर तालियाँ बजाने लगे — यह क्षण आधुनिक इतिहास में हिंदू धर्म की वैश्विक प्रतिष्ठा का नया अध्याय था।

अपने भाषण में स्वामीजी ने ऋग्वेद के 'एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति' (सत्य एक है, ज्ञानीजन उसे अनेक नामों से पुकारते हैं) का उल्लेख करते हुए सनातन धर्म की सार्वभौमिकता को रेखांकित किया। उन्होंने धार्मिक कट्टरता और असहिष्णुता की निंदा की तथा वेदांत के आधार पर समस्त मानवता की एकता का संदेश दिया। इस संसद में उनकी उपस्थिति ने योग, वेदांत और हिंदू दर्शन को पश्चिमी जगत में पहली बार गंभीरता से परिचित कराया।

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स्वामी विवेकानंद के मूल उपदेश और दार्शनिक दृष्टि क्या थी?

स्वामी विवेकानंद के दर्शन का केंद्र था — व्यावहारिक वेदांत (Practical Vedanta)। उनका मानना था कि उपनिषदों और भगवद्गीता की शिक्षाएँ केवल मठों और आश्रमों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि उन्हें दैनिक जीवन, समाजसेवा और राष्ट्रनिर्माण में उतारा जाना चाहिए। गीता के कर्मयोग को उन्होंने आधुनिक युग के लिए सबसे उपयुक्त मार्ग बताया।

उनका प्रसिद्ध उपदेश था — 'जीव सेवा ही शिव सेवा है।' इस वाक्य में वेदांत के 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' (यह सम्पूर्ण जगत ब्रह्म है) का सार निहित है। उन्होंने युवाओं को संबोधित करते हुए कहा कि शक्ति ही धर्म है — निर्बलता पाप है। उनके अनुसार आत्मविश्वास और निर्भयता ही भारत के पुनरुत्थान की आधारशिला है।

रामकृष्ण मिशन की स्थापना और सामाजिक सेवा का आयाम

1 मई 1897 को स्वामी विवेकानंद ने कोलकाता में रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। यह संस्था धर्म और सेवा को एक साथ साधने का अभूतपूर्व प्रयास था। मिशन ने प्रारंभ से ही बाढ़, अकाल और महामारी जैसी आपदाओं में पीड़ित जनता की सेवा को आध्यात्मिक अनुष्ठान के समान महत्त्व दिया।

1898 में बेलूर मठ (Belur Math), हावड़ा की स्थापना हुई जो आज भी रामकृष्ण मिशन का मुख्यालय है। इसी के साथ उन्होंने मायावती, उत्तराखंड में अद्वैत आश्रम की नींव रखी जहाँ से 'प्रबुद्ध भारत' पत्रिका प्रकाशित होती रही। इन संस्थाओं के माध्यम से शिक्षा, स्वास्थ्य और वेदांत-प्रचार का कार्य आज भी अनवरत चल रहा है।

स्वामी विवेकानंद की विरासत आज भी क्यों प्रासंगिक है?

स्वामी विवेकानंद ने 4 जुलाई 1902 को बेलूर मठ में महासमाधि ली — उस समय उनकी आयु मात्र 39 वर्ष थी। किंतु इन अल्प वर्षों में उन्होंने जो विचार-क्रांति की, वह भारतीय नवजागरण की आधारभूमि बनी। उनका जन्मदिन 12 जनवरी भारत में 'राष्ट्रीय युवा दिवस' के रूप में मनाया जाता है।

उनके ग्रंथ — 'राज योग', 'ज्ञान योग', 'भक्ति योग' और 'कर्म योग' — आज भी लाखों पाठकों के लिए आध्यात्मिक मार्गदर्शक हैं। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने कहा था कि विवेकानंद ने ही उन्हें राष्ट्रप्रेम की प्रेरणा दी। महात्मा गांधी, श्री अरविंद और डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जैसे महापुरुषों पर भी उनके विचारों का गहरा प्रभाव रहा। सनातन धर्म को विश्वमंच पर सम्मान दिलाने वाले स्वामी विवेकानंद की वाणी आज भी उतनी ही ताज़ा और प्रेरक है।