श्रीरंगनाथस्वामी श्रीरंगम: विश्व के सबसे बड़े सक्रिय हिंदू मंदिर के दिव्य रहस्य
156 एकड़, 21 गोपुरम, आदिशेष पर विष्णु शयन रूप — विश्व का सबसे बड़ा सक्रिय हिंदू मंदिर। विभीषण कथा, रामानुज सम्बन्ध, वैकुंठ एकादशी।

156 एकड़, 21 गोपुरम, आदिशेष पर विष्णु शयन रूप — विश्व का सबसे बड़ा सक्रिय हिंदू मंदिर। विभीषण कथा, रामानुज सम्बन्ध, वैकुंठ एकादशी।
कावेरी नदी की दो भुजाओं के बीच, श्रीरंगम नामक द्वीप पर, विश्व का सबसे बड़ा सक्रिय हिंदू मंदिर खड़ा है। 156 एकड़ की पवित्र भूमि। सात संकेन्द्रित प्राकार। 21 ऊँचे गोपुरम, सबसे ऊँचा 236 फीट। और भीतरी गर्भगृह में, सहस्र-फण आदिशेष पर भगवान विष्णु श्री रंगनाथ रूप में शयन कर रहे हैं।
विष्णु कावेरी तट पर कैसे आए
मूल रंगनाथ मूर्ति — आदिशेष पर विष्णु शयन-रूप — ब्रह्मलोक में पूजित थी। श्रीराम ने रावण-वध के बाद इसे मित्र विभीषण को दिया, एक शर्त के साथ: जैसे ही विभीषण मूर्ति को भूमि पर रखेंगे, वह वहीं स्थिर हो जाएगी।
विभीषण दक्षिण की ओर चले। कावेरी पहुँचकर संध्या-कर्म के लिए मूर्ति को नीचे रख दी — सोचा कि शर्त केवल अंतिम गंतव्य पर लागू है। मूर्ति भूमि छूते ही स्थिर हो गई। विष्णु ने राक्षस-राज की भक्ति पर दया करते हुए सहमति दी कि वे नित्य लंका की ओर मुख कर के विभीषण के राज्य को आशीर्वाद देंगे — दक्षिणमुखी होने का यह कारण।
सात प्राकार और शयन-देव
- सात प्राकार: कुल क्षेत्रफल 156 एकड़। पहले तीन सबके लिए खुले।
- 21 गोपुरम: राज गोपुरम (दक्षिण, 236 फीट) विश्व का सबसे ऊँचा मंदिर-गोपुरम।
- मुख्य गर्भगृह: रंगनाथ सात-फण आदिशेष पर शयन — एक ही पत्थर से 13 फीट लंबी मूर्ति।
रामानुज सम्बन्ध
11वीं-12वीं शताब्दी में श्री रामानुजाचार्य ने श्रीरंगम में विशिष्टाद्वैत वेदांत संहिताबद्ध किया। पाँचवें प्राकार में उनकी समाधि 900+ वर्षों से उनके भौतिक शरीर को केसर-पेस्ट और जड़ी-बूटियों से संरक्षित रखे है। भक्त रामानुज को आज भी आसन-मुद्रा में देख सकते हैं।
वैकुंठ एकादशी: स्वर्ग-द्वार खुलने का दिन
मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी (आम तौर पर दिसंबर अंत) के दिन मंदिर का परमपद वासल (वैकुंठ द्वार) वर्ष में केवल एक दिन खुलता है। इस एक दिन इस द्वार से गुज़रने वाले श्रद्धालुओं को मृत्यु के क्षण वैकुंठ की प्राप्ति होती है, ऐसा शास्त्र कहता है।
चमत्कार
कावेरी की नमस्कार: श्रीरंगम में कावेरी सक्रिय बाढ़-काल में अनेक बार मंदिर-दीवारों तक पहुँची। हर बार जल दूसरे प्राकार पर रुक गया — कभी भीतरी सन्निधि तक नहीं पहुँचा।
सल्तनत-संरक्षण: मलिक काफ़ूर ने 1311 में श्रीरंगम पर आक्रमण किया; रंगनाथ मूर्ति को 40+ वर्षों तक गुप्त स्थानों पर छिपाया गया। यह मूर्ति मूल है — कभी पुनर्तराशी नहीं गई।
ॐ नमो नारायणाय। श्री रंग मंगलम।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्रीरंगम में वैकुंठ द्वार कब खुलता है?
मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी (आम तौर पर दिसंबर अंत) को परमपद वासल यानी वैकुंठ द्वार वर्ष में केवल एक दिन खुलता है। शास्त्रीय मान्यता है कि इस दिन द्वार से गुज़रने वाले श्रद्धालुओं को मृत्यु के क्षण वैकुंठ प्राप्त होता है।
श्री रंगनाथ की मूर्ति श्रीरंगम में कैसे स्थापित हुई?
जैसा कि प्रचलित है, श्रीराम ने रावण-वध के बाद यह मूर्ति विभीषण को इस शर्त पर दी कि भूमि पर रखते ही वह स्थिर हो जाएगी। कावेरी तट पर संध्या-कर्म के लिए विभीषण ने इसे नीचे रखा और मूर्ति वहीं स्थिर हो गई।
श्री रंगनाथ दक्षिणमुखी क्यों हैं?
जैसा कि प्रचलित है, विष्णु ने विभीषण की भक्ति पर दया करके नित्य लंका की ओर मुख करके उनके राज्य को आशीर्वाद देने की सहमति दी। यही दक्षिणमुखी होने का कारण माना जाता है।
श्रीरंगम मंदिर कितना बड़ा है?
मंदिर 156 एकड़ में फैला है, जिसमें सात संकेन्द्रित प्राकार और 21 गोपुरम हैं। दक्षिण का राज गोपुरम 236 फीट ऊँचा है, और गर्भगृह में एक ही पत्थर से बनी 13 फीट लंबी शयन मूर्ति है।
श्रीरंगम में रामानुजाचार्य की समाधि कहाँ है?
रामानुजाचार्य की समाधि मंदिर के पाँचवें प्राकार में है। 900+ वर्षों से उनका भौतिक शरीर केसर-पेस्ट और जड़ी-बूटियों से संरक्षित है, और भक्त आज भी उन्हें आसन-मुद्रा में देख सकते हैं।
मलिक काफ़ूर के आक्रमण के समय रंगनाथ मूर्ति का क्या हुआ?
मलिक काफ़ूर ने 1311 में श्रीरंगम पर आक्रमण किया, तब रंगनाथ मूर्ति को 40+ वर्षों तक गुप्त स्थानों पर छिपाया गया। आज पूजित मूर्ति मूल ही है, कभी पुनः तराशी नहीं गई।




