शिव चालीसा (जय गणेश गिरिजा सुवन) हिंदी में अर्थ सहित और शिव आरती
'जय गणेश गिरिजा सुवन' से आरंभ होने वाली शिव चालीसा भगवान शिव की चालीस चौपाइयों वाली हिंदी स्तुति है, जिसकी रचना परंपरा से अयोध्यादास को मानी जाती है। यहाँ पूरा पाठ है, हर चौपाई का सरल अर्थ, आरंभिक और अंतिम दोहा, शिव आरती 'ॐ जय शिव ओंकारा', और सोमवार, श्रावण व शिवरात्रि पर पाठ के आसान सुझाव।
'जय गणेश गिरिजा सुवन' से आरंभ होने वाली शिव चालीसा भगवान शिव की चालीस चौपाइयों वाली हिंदी स्तुति है, जिसकी रचना परंपरा से अयोध्यादास को मानी जाती है। यहाँ पूरा पाठ है, हर चौपाई का सरल अर्थ, आरंभिक और अंतिम दोहा, शिव आरती 'ॐ जय शिव ओंकारा', और सोमवार, श्रावण व शिवरात्रि पर पाठ के आसान सुझाव।
संक्षेप में: शिव चालीसा भगवान शिव की सरल हिंदी में चालीस चौपाइयों वाली भक्ति-स्तुति है, जो इस दोहे से आरंभ होती है: "जय गणेश गिरिजा सुवन"। परंपरा से इसकी रचना अयोध्यादास को मानी जाती है, जिन्होंने आरंभिक और अंतिम पदों में अपना नाम लिया है। यह शिव के स्वरूप की स्तुति करती है, नीलकंठ बनकर विष पीने से लेकर श्रीराम को आशीर्वाद देने तक उनके महान कार्यों का वर्णन करती है, और सहायता की हार्दिक प्रार्थना पर समाप्त होती है। भक्त इसका पाठ सोमवार को, पूरे श्रावण में, प्रदोष पर और महाशिवरात्रि पर करते हैं, और प्रायः इसके बाद शिव आरती गाते हैं: "ॐ जय शिव ओंकारा"। चालीसा के पाठ में लगभग दस मिनट लगते हैं।
शिव चालीसा हिंदी में अर्थ सहित
यह पाठ sanskritdocuments.org के हिंदी संस्करण के अनुसार है। इसमें एक आरंभिक दोहा, चालीस चौपाइयाँ (स्रोत के अनुसार यहाँ इकतालीस पंक्ति-युग्म) और एक समापन दोहा है। हर अंश पहले देवनागरी में, फिर लिप्यंतरण में, और फिर हिंदी शब्दों के निकट रहने वाले एक पंक्ति के सरल अर्थ के साथ दिया गया है।
आरंभिक आवाहन
ॐ नमः शिवाय
oṃ namaḥ śivāya
अर्थ: ॐ, शिव को नमस्कार। परंपरा से चालीसा का आरंभ पंचाक्षरी मंत्र से किया जाता है।
आरंभिक दोहा
जय गणेश गिरिजासुवन मंगल मूल सुजान ।
कहत अयोध्यादास तुम देउ अभय वरदान ॥
jaya gaṇeśa girijāsuvana maṃgala mūla sujāna ।
kahata ayodhyādāsa tuma deu abhaya varadāna ॥
अर्थ: गिरिजा (पार्वती) के पुत्र, सब मंगलों के मूल और परम ज्ञानी गणेश की जय हो। अयोध्यादास प्रार्थना करते हैं: मुझे अभय का वरदान दीजिए।
चौपाई 1 से 41
चौपाई 1
जय गिरिजापति दीनदयाला । सदा करत सन्तन प्रतिपाला ॥
jaya girijāpati dīnadayālā । sadā karata santana pratipālā ॥
अर्थ: गिरिजा के स्वामी, दीनों पर दया करने वाले प्रभु की जय हो, जो सदा संतों की रक्षा करते हैं।
चौपाई 2
भाल चन्द्रमा सोहत नीके । कानन कुण्डल नाग फनी के ॥
bhāla candramā sohata nīke । kānana kuṇḍala nāga phanī ke ॥
अर्थ: आपके मस्तक पर चंद्रमा सुंदर शोभा पाता है, और आपके कानों के कुंडल नागों के फन हैं।
चौपाई 3
अंग गौर शिर गंग बहाये । मुण्डमाल तन क्षार लगाये ॥
aṃga gaura śira gaṃga bahāye । muṇḍamāla tana kṣāra lagāye ॥
अर्थ: आपके अंग गौर वर्ण के हैं, सिर से गंगा बहती है, आप मुंडमाला धारण करते हैं और शरीर पर भस्म लगाए रहते हैं।
चौपाई 4
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे । छवि को देखि नाग मन मोहे ॥
vastra khāla bāghambara sohe । chavi ko dekhi nāga mana mohe ॥
अर्थ: आपका बाघंबर वस्त्र सुंदर लगता है, और आपकी छवि देखकर नाग भी मोहित हो जाते हैं।
चौपाई 5
मैना मातु कि हवे दुलारी । वाम अंग सोहत छवि न्यारी ॥
mainā mātu ki have dulārī । vāma aṃga sohata chavi nyārī ॥
अर्थ: माता मैना की लाड़ली पुत्री पार्वती आपके वाम अंग में अपनी अनोखी छवि के साथ शोभित हैं।
चौपाई 6
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी । करत सदा शत्रुन क्षयकारी ॥
kara triśūla sohata chavi bhārī । karata sadā śatruna kṣayakārī ॥
अर्थ: आपके हाथ में त्रिशूल अत्यंत शोभायमान है, जिससे आप सदा शत्रुओं का नाश करते हैं।
चौपाई 7
नंदी गणेश सोहैं तहं कैसे । सागर मध्य कमल हैं जैसे ॥
naṃdī gaṇeśa sohaiṃ tahaṃ kaise । sāgara madhya kamala haiṃ jaise ॥
अर्थ: आपके पास नंदी और गणेश ऐसे सुशोभित हैं जैसे सागर के बीच कमल।
चौपाई 8
कार्तिक श्याम और गणराऊ । या छवि कौ कहि जात न काऊ ॥
kārtika śyāma aura gaṇarāū । yā chavi kau kahi jāta na kāū ॥
अर्थ: कार्तिकेय, श्याम वर्ण के गण और गणों के स्वामी गणेश आपके चारों ओर हैं; इस छवि का वर्णन कोई नहीं कर सकता।
चौपाई 9
देवन जबहीं जाय पुकारा । तबहिं दुख प्रभु आप निवारा ॥
devana jabahīṃ jāya pukārā । tabahiṃ dukha prabhu āpa nivārā ॥
अर्थ: जब भी देवताओं ने आकर आपको पुकारा, हे प्रभु, आपने तुरंत उनका दुख दूर किया।
चौपाई 10
किया उपद्रव तारक भारी । देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी ॥
kiyā upadrava tāraka bhārī । devana saba mili tumahiṃ juhārī ॥
अर्थ: जब तारकासुर ने भारी उपद्रव मचाया, तब सब देवताओं ने मिलकर आपकी शरण ली और आपको प्रणाम किया।
चौपाई 11
तुरत षडानन आप पठायौ । लव निमेष महं मारि गिरायौ ॥
turata ṣaḍānana āpa paṭhāyau । lava nimeṣa mahaṃ māri girāyau ॥
अर्थ: आपने तुरंत छह मुख वाले कार्तिकेय को भेजा, जिन्होंने पलक झपकते ही तारक को मार गिराया।
चौपाई 12
आप जलंधर असुर संहारा । सुयश तुम्हार विदित संसारा ॥
āpa jalaṃdhara asura saṃhārā । suyaśa tumhāra vidita saṃsārā ॥
अर्थ: आपने स्वयं जलंधर असुर का संहार किया, और आपका यश सारे संसार में प्रसिद्ध है।
चौपाई 13
त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई । तबहिं कृपा कर लीन बचाई ॥
tripurāsura sana yuddha macāī । tabahiṃ kṛpā kara līna bacāī ॥
अर्थ: आपने त्रिपुरासुर से घोर युद्ध किया और फिर अपनी कृपा से देवताओं को बचा लिया।
चौपाई 14
किया तपहिं भागीरथ भारी । पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी ॥
kiyā tapahiṃ bhāgīratha bhārī । puraba pratijñā tāsu purārī ॥
अर्थ: भगीरथ ने भारी तपस्या की, और हे पुरारी, आपने गंगा को धारण करके उनकी प्रतिज्ञा पूरी की।
चौपाई 15
दानिन महं तुम सम कोउ नाहीं । सेवक स्तुति करत सदाहीं ॥
dānina mahaṃ tuma sama kou nāhīṃ । sevaka stuti karata sadāhīṃ ॥
अर्थ: दानियों में आपके समान कोई नहीं है, और आपके सेवक सदा आपकी स्तुति करते हैं।
चौपाई 16
वेद माहि महिमा तुम गाई । अकथ अनादि भेद नहीं पाई ॥
veda māhi mahimā tuma gāī । akatha anādi bheda nahīṃ pāī ॥
अर्थ: वेदों ने आपकी महिमा गाई है, फिर भी आप अकथनीय और अनादि हैं, और कोई आपका भेद नहीं पा सका।
चौपाई 17
प्रकटे उदधि मंथन में ज्वाला । जरत सुरासुर भए विहाला ॥
prakaṭe udadhi maṃthana meṃ jvālā । jarata surāsura bhae vihālā ॥
अर्थ: समुद्र मंथन के समय जलता हुआ विष प्रकट हुआ, जिससे देवता और असुर दोनों झुलसकर व्याकुल हो गए।
चौपाई 18
कीन्ह दया तहं करी सहाई । नीलकंठ तब नाम कहाई ॥
kīnha dayā tahaṃ karī sahāī । nīlakaṃṭha taba nāma kahāī ॥
अर्थ: आपने दया करके वह विष पीकर उनकी सहायता की, और तभी से आप नीलकंठ, यानी नीले कंठ वाले, कहलाए।
चौपाई 19
पूजन रामचंद्र जब कीन्हां । जीत के लंक विभीषण दीन्हा ॥
pūjana rāmacaṃdra jaba kīnhāṃ । jīta ke laṃka vibhīṣaṇa dīnhā ॥
अर्थ: जब रामचंद्र ने आपकी पूजा की, तब उन्होंने लंका जीतकर विभीषण को दे दी।
चौपाई 20
सहस कमल में हो रहे धारी । कीन्ह परीक्षा तबहिं त्रिपुरारी ॥
sahasa kamala meṃ ho rahe dhārī । kīnha parīkṣā tabahiṃ tripurārī ॥
अर्थ: जब श्रीराम आपको सहस्र कमल अर्पित कर रहे थे, तब हे त्रिपुरारी, आपने उनकी परीक्षा लेनी चाही।
चौपाई 21
एक कमल प्रभु राखेउ जोई । कमल नयन पूजन चहं सोई ॥
eka kamala prabhu rākheu joī । kamala nayana pūjana cahaṃ soī ॥
अर्थ: आपने एक कमल छिपा दिया, और कमलनयन श्रीराम ने उसके स्थान पर अपना नेत्र अर्पित करने का संकल्प किया।
चौपाई 22
कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर । भये प्रसन्न दिए इच्छित वर ॥
kaṭhina bhakti dekhī prabhu śaṃkara । bhaye prasanna die icchita vara ॥
अर्थ: ऐसी दृढ़ भक्ति देखकर प्रभु शंकर प्रसन्न हुए और उन्हें मनचाहा वर दिया।
चौपाई 23
जय जय जय अनंत अविनाशी । करत कृपा सबके घट वासी ॥
jaya jaya jaya anaṃta avināśī । karata kṛpā sabake ghaṭa vāsī ॥
अर्थ: हे अनंत और अविनाशी प्रभु, आपकी जय हो, जय हो, जय हो; आप हर हृदय में वास करते हैं और सब पर कृपा करते हैं।
चौपाई 24
दुष्ट सकल नित मोहि सतावैं । भ्रमत रहौं मोहे चैन न आवैं ॥
duṣṭa sakala nita mohi satāvaiṃ । bhramata rahauṃ mohe caina na āvaiṃ ॥
अर्थ: दुष्ट मुझे रोज़ सताते हैं; मैं बेचैन भटकता रहता हूँ और मुझे चैन नहीं मिलता।
चौपाई 25
त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो । यह अवसर मोहि आन उबारो ॥
trāhi trāhi maiṃ nātha pukāro । yaha avasara mohi āna ubāro ॥
अर्थ: हे नाथ, मैं आपको पुकारता हूँ, 'त्राहि माम्, त्राहि माम्!' अभी, इसी क्षण आकर मेरा उद्धार कीजिए।
चौपाई 26
ले त्रिशूल शत्रुन को मारो । संकट से मोहिं आन उबारो ॥
le triśūla śatruna ko māro । saṃkaṭa se mohiṃ āna ubāro ॥
अर्थ: अपना त्रिशूल उठाकर शत्रुओं का नाश कीजिए; आकर मुझे इस संकट से उबारिए।
चौपाई 27
मात पिता भ्राता सब कोई । संकट में पूछत नहिं कोई ॥
māta pitā bhrātā saba koī । saṃkaṭa meṃ pūchata nahiṃ koī ॥
अर्थ: माता, पिता, भाई और सब लोग हैं, पर संकट के समय कोई मेरा हाल नहीं पूछता।
चौपाई 28
स्वामी एक है आस तुम्हारी । आय हरहु मम संकट भारी ॥
svāmī eka hai āsa tumhārī । āya harahu mama saṃkaṭa bhārī ॥
अर्थ: हे स्वामी, आप ही मेरी एकमात्र आशा हैं; आकर मेरे भारी संकट को हर लीजिए।
चौपाई 29
धन निर्धन को देत सदा ही । जो कोई जांचे सो फल पाहीं ॥
dhana nirdhana ko deta sadā hī । jo koī jāṃce so phala pāhīṃ ॥
अर्थ: आप सदा निर्धन को धन देते हैं, और जो भी आपसे माँगता है, वह फल पाता है।
चौपाई 30
अस्तुति केहि विधि करों तुम्हारी । क्षमहु नाथ अब चूक हमारी ॥
astuti kehi vidhi karoṃ tumhārī । kṣamahu nātha aba cūka hamārī ॥
अर्थ: मैं किस प्रकार आपकी उचित स्तुति करूँ? हे नाथ, अब हमारी भूलों को क्षमा कीजिए।
चौपाई 31
शंकर हो संकट के नाशन । मंगल कारण विघ्न विनाशन ॥
śaṃkara ho saṃkaṭa ke nāśana । maṃgala kāraṇa vighna vināśana ॥
अर्थ: हे शंकर, आप संकटों का नाश करने वाले, मंगल के कारण और विघ्नों को दूर करने वाले हैं।
चौपाई 32
योगी यति मुनि ध्यान लगावैं । शारद नारद शीश नवावैं ॥
yogī yati muni dhyāna lagāvaiṃ । śārada nārada śīśa navāvaiṃ ॥
अर्थ: योगी, यति और मुनि आपका ध्यान करते हैं, और शारदा व नारद आपके आगे शीश झुकाते हैं।
चौपाई 33
नमो नमो जय नमः शिवाय । सुर ब्रह्मादिक पार न पाय ॥
namo namo jaya namaḥ śivāya । sura brahmādika pāra na pāya ॥
अर्थ: नमन, नमन, आपकी जय हो, नमः शिवाय; ब्रह्मा आदि देवता भी आपका पार नहीं पा सकते।
चौपाई 34
जो यह पाठ करे मन लाई । ता पर होत हैं शम्भु सहाई ॥
jo yaha pāṭha kare mana lāī । tā para hota haiṃ śambhu sahāī ॥
अर्थ: जो कोई मन लगाकर इसका पाठ करता है, शंभु उसके सहायक बनते हैं।
चौपाई 35
रनियां जो कोई हो अधिकारी । पाठ करे सो पावन हारी ॥
raniyāṃ jo koī ho adhikārī । pāṭha kare so pāvana hārī ॥
अर्थ: जो कोई बोझ से दबा हो, परंपरा से जिसे ऋण का बोझ समझा जाता है, वह इसका पाठ करे तो उसे राहत मिलती है और वह पवित्र होता है।
चौपाई 36
पुत्र होन की इच्छा जोई । निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई ॥
putra hona kī icchā joī । niścaya śiva prasāda tehi hoī ॥
अर्थ: परंपरा कहती है कि जो संतान की इच्छा रखता है, उसे आशीर्वाद के रूप में शिव की कृपा प्राप्त होती है।
चौपाई 37
पण्डित त्रयोदशी को लावे । ध्यान पूर्वक होम करावे ॥
paṇḍita trayodaśī ko lāve । dhyāna pūrvaka homa karāve ॥
अर्थ: त्रयोदशी के दिन किसी विद्वान पंडित को बुलाकर श्रद्धा से होम करवाएँ।
चौपाई 38
त्रयोदशी व्रत करै हमेशा । तन नहिं ताके रहै कलेशा ॥
trayodaśī vrata karai hameśā । tana nahiṃ tāke rahai kaleśā ॥
अर्थ: जो सदा त्रयोदशी का व्रत रखता है, उसके शरीर में कोई क्लेश नहीं रहता।
चौपाई 39
धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे । शंकर सम्मुख पाठ सुनावे ॥
dhūpa dīpa naivedya car̤hāve । śaṃkara sammukha pāṭha sunāve ॥
अर्थ: धूप, दीप और नैवेद्य चढ़ाकर भगवान शंकर के सम्मुख इस पाठ को सुनाना चाहिए।
चौपाई 40
जन्म जन्म के पाप नसावे । अन्त धाम शिवपुर में पावे ॥
janma janma ke pāpa nasāve । anta dhāma śivapura meṃ pāve ॥
अर्थ: इससे जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट होते हैं, और अंत में शिव के धाम की प्राप्ति होती है।
चौपाई 41
कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी । जानि सकल दुख हरहु हमारी ॥
kahaiṃ ayodhyādāsa āsa tumhārī । jāni sakala dukha harahu hamārī ॥
अर्थ: अयोध्यादास कहते हैं: आप ही मेरी आशा हैं; आप सब जानते हैं, हमारे सारे दुख हर लीजिए।
समापन दोहा
नित नेम उठि प्रातःही पाठ करो चालीस ।
तुम मेरी मनकामना पूर्ण करो जगदीश ॥
nita nema uṭhi prātaḥhī pāṭha karo cālīsa ।
tuma merī manakāmanā pūrṇa karo jagadīśa ॥
अर्थ: हर सुबह उठकर नियम से चालीसा का पाठ करो (कुछ लोग इस पंक्ति का अर्थ 'चालीस बार पाठ करो' लेते हैं)। हे जगदीश, मेरे मन की कामना पूरी करो।
शिव आरती: ॐ जय शिव ओंकारा अर्थ सहित
स्रोत में चालीसा के बाद शिव आरती दी गई है, प्रसिद्ध 'ॐ जय शिव ओंकारा' (जिसे 'जय शिव ओंकारा' भी गाया जाता है)। यह 'त्रिगुण' आरती है: इसमें ब्रह्मा, विष्णु और शिव को एक ही प्रभु के तीन रूप माना गया है। पहली पंक्ति टेक है, जो दीप घुमाते समय हर पद के बाद फिर से गाई जाती है।
आरंभ और टेक
अथ त्रिगुण आरती शिवजी की
जय शिव ओंकारा हर जय शिव ओंकारा
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव अर्धांगी धारा ॥ टेक॥
atha triguṇa āratī śivajī kī ।
jaya śiva oṃkārā hara jaya śiva oṃkārā ।
brahmā viṣṇu sadāśiva ardhāṃgī dhārā ॥ ṭeka॥
अर्थ: यहाँ से शिवजी की त्रिगुण रूप की आरती आरंभ होती है। हे शिव, पवित्र ओंकार स्वरूप, आपकी जय हो; हे हर, आपकी जय हो! आप ही ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव हैं, और आप देवी को अपने आधे अंग के रूप में धारण करते हैं। (यह टेक है, जो हर पद के बाद गाई जाती है।)
पद 1
एकानन चतुरानन पंचानन राजे
हंसानन गरुडासन वृषवाहन साजे ॥ जय॥
ekānana caturānana paṃcānana rāje ।
haṃsānana garuḍāsana vṛṣavāhana sāje ॥ jaya॥
अर्थ: आप एक मुख वाले, चार मुख वाले और पाँच मुख वाले प्रभु के रूप में शोभित हैं, और हंस, गरुड़ तथा वृषभ पर विराजमान हैं। (यहाँ ब्रह्मा, विष्णु और शिव को एक ही प्रभु के तीन रूप माना गया है।)
पद 2
दो भुज चार चतुर्भुज दस भुज अति सोहे
तीनों रूप निरखता त्रिभुवन जन मोहे ॥ जय॥
do bhuja cāra caturbhuja dasa bhuja ati sohe ।
tīnoṃ rūpa nirakhatā tribhuvana jana mohe ॥ jaya॥
अर्थ: दो भुजाओं, चार भुजाओं और दस भुजाओं के साथ आप अत्यंत सुंदर लगते हैं; आपके तीनों रूपों को देखकर तीनों लोकों के लोग मोहित हो जाते हैं।
पद 3
अक्षमाला बनमाला रुण्डमाला धारी
चंदन मृगमद सोहै भाले शशिधारी ॥ जय॥
akṣamālā banamālā ruṇḍamālā dhārī ।
caṃdana mṛgamada sohai bhāle śaśidhārī ॥ jaya॥
अर्थ: आप रुद्राक्ष की माला, वनपुष्पों की माला और मुंडमाला धारण करते हैं; चंदन और कस्तूरी आपके मस्तक की शोभा बढ़ाते हैं, और आप चंद्रमा धारण करते हैं।
पद 4
श्वेतांबर पीतांबर बाघंबर अंगे
सनकादिक गरुडादिक भूतादिक संगे ॥ जय॥
śvetāṃbara pītāṃbara bāghaṃbara aṃge ।
sanakādika garuḍādika bhūtādika saṃge ॥ jaya॥
अर्थ: आप श्वेत वस्त्र, पीतांबर और बाघंबर धारण करते हैं, और सनक आदि ऋषि, गरुड़ आदि दिव्य पक्षी तथा भूतगण आपके साथ रहते हैं।
पद 5
कर मध्ये सुकमण्डल चक्र त्रिशूल धर्ता
जगकर्ता जगभर्ता जगसंहारकर्ता ॥ जय॥
kara madhye sukamaṇḍala cakra triśūla dhartā ।
jagakartā jagabhartā jagasaṃhārakartā ॥ jaya॥
अर्थ: आपके हाथों में पवित्र कमंडल, चक्र और त्रिशूल हैं; आप जगत के रचयिता, पालनकर्ता और संहारकर्ता हैं।
पद 6
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका
प्रणवाक्षर ॐ मध्ये ये तीनों एका ॥ जय॥
brahmā viṣṇu sadāśiva jānata avivekā ।
praṇavākṣara oṃ madhye ye tīnoṃ ekā ॥ jaya॥
अर्थ: केवल अविवेकी लोग ही ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव को अलग-अलग मानते हैं; पवित्र प्रणव अक्षर ॐ में ये तीनों एक हैं।
पद 7
काशी में विश्वनाथ विराजत नन्दो ब्रह्मचारी
नित उठि भोग लगावत महिमा अति भारी ॥ जय॥
kāśī meṃ viśvanātha virājata nando brahmacārī ।
nita uṭhi bhoga lagāvata mahimā ati bhārī ॥ jaya॥
अर्थ: काशी में विश्वनाथ ब्रह्मचारी नंदी के साथ विराजमान हैं; हर दिन प्रातः उन्हें भोग लगाया जाता है, और उनकी महिमा अपार है।
पद 8
त्रिगुण स्वामी की आरती जो कोई नर गावे
कहत शिवानंद स्वामी मनवांछित फल पावे ॥ जय॥
triguṇa svāmī kī āratī jo koī nara gāve ।
kahata śivānaṃda svāmī manavāṃchita phala pāve ॥ jaya॥
अर्थ: स्वामी शिवानंद कहते हैं कि जो कोई त्रिगुण स्वामी की यह आरती गाता है, उसे मनवांछित फल मिलता है।
चालीसा क्या कहती है: एक संक्षिप्त मार्गदर्शिका
| पद | विषय |
|---|---|
| आरंभिक दोहा | गणेश की वंदना और अभय की प्रार्थना |
| चौपाई 1 से 8 | शिव का स्वरूप: चंद्रमा, गंगा, नाग, भस्म, त्रिशूल, पार्वती, नंदी, गणेश और कार्तिकेय |
| चौपाई 9 से 22 | शिव के कार्य: तारक, जलंधर, त्रिपुर, भगीरथ की गंगा, नीलकंठ, श्रीराम की पूजा |
| चौपाई 23 से 33 | भक्त की सहायता के लिए पुकार और शिव की उदारता की स्तुति |
| चौपाई 34 से 41 | पाठ का फल, त्रयोदशी व्रत और कवि का नाम |
| समापन दोहा | प्रतिदिन प्रातः पाठ और मनोकामना पूर्ति की प्रार्थना |
चालीसा की दो कथाएँ बच्चों को अवश्य सुनानी चाहिए। समुद्र मंथन में सबसे पहले एक घातक विष निकला; शिव ने संसार को बचाने के लिए उसे पी लिया, और पार्वती ने उनका कंठ थाम लिया ताकि विष वहीं रुक जाए, जिससे उनका कंठ नीला हो गया। श्रीराम की पूजा की कथा, जैसा कि प्रायः सुनाई जाती है, में श्रीराम ने सहस्र कमल अर्पित किए; शिव ने परीक्षा के लिए एक कमल छिपा दिया, और कमलनयन कहलाने वाले श्रीराम अपना नेत्र अर्पित करने को तैयार हो गए। शिव ने उन्हें रोका और आशीर्वाद दिया। दोनों कथाएँ सिखाती हैं कि शिव दिखावे से नहीं, त्याग और सच्चाई से प्रसन्न होते हैं।
शिव चालीसा का पाठ कैसे और कब करें
सबसे शुभ दिन और अवसर
- सोमवार: सोमवार शिव को समर्पित है। बहुत-से लोग हर सोमवार सुबह चालीसा पढ़ते हैं, और कुछ सोमवार का व्रत भी रखते हैं।
- श्रावण: वर्षा ऋतु का शिव को समर्पित महीना, जब उत्तर भारत में श्रावण सोमवार व्रत व्यापक रूप से रखा जाता है।
- प्रदोष (त्रयोदशी): चालीसा में स्वयं त्रयोदशी व्रत का उल्लेख है। सूर्यास्त के आसपास प्रदोष की संध्या शिव पूजा का प्रिय समय है।
- शिवरात्रि: महाशिवरात्रि और हर महीने की मासिक शिवरात्रि। हमारी कार्तिक मास शिवरात्रि 2026 मार्गदर्शिका भी देखें।
- कार्तिक मास: दक्षिण भारतीय परिवारों के लिए कार्तिक के सोमवार विशेष रूप से पवित्र हैं। देखें कार्तिक सोमवार 2026।
कितनी बार पढ़ें
दिन में एक बार पर्याप्त है, और समापन दोहा प्रातःकाल की सलाह देता है। विशेष दिनों पर कुछ भक्त इसे तीन, ग्यारह या चालीस बार भी पढ़ते हैं, और कुछ चालीस दिन तक रोज़ पढ़ने का संकल्प लेते हैं। यदि आप माला पर गिनती करते हैं, तो पवित्र संख्या 108 पर हमारा लेख सामान्य गिनतियों को समझाता है।
घर पर सरल तैयारी
- स्नान करें, या हाथ-मुँह धो लें, और शिवलिंग या शिव के चित्र के सामने बैठें, अच्छा हो तो पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके।
- शिवलिंग पर जल या दूध चढ़ाएँ, हो सके तो बिल्वपत्र (बेलपत्र), एक सफ़ेद फूल और थोड़ा चंदन भी। प्रेम से चढ़ाया गया कोई भी ताज़ा फूल पर्याप्त है।
- दीपक और धूप जलाएँ, जैसा चौपाई 39 में बताया गया है।
- कुछ बार 'ॐ नमः शिवाय' का जाप करें, धीरे-धीरे चालीसा पढ़ें, फिर दीपक घुमाते हुए आरती गाएँ।
- प्रसाद बाँटें और एक मिनट शांत बैठें।
शिव चालीसा का महत्व
शिव एक ओर कैलाश के तपस्वी हैं और दूसरी ओर सबसे जल्दी प्रसन्न होने वाले देवता, भोलेनाथ। चालीसा दोनों पक्षों को समेटती है: यह उनके विराट स्वरूप और ब्रह्मांडीय कार्यों का वर्णन करती है, फिर उनसे ऐसे माता-पिता की तरह बात करती है जो परिवार के मुँह मोड़ लेने पर भी अपने बच्चे को निराश नहीं करते। यही सच्चाई इसे वाराणसी से न्यू जर्सी (New Jersey) तक घर-घर में प्रिय बनाती है।
परंपरा से भक्तों की मान्यता है कि भक्ति से शिव चालीसा का पाठ करने से मन की शांति, कठिनाइयों का सामना करने की शक्ति, पिछली भूलों से शुद्धि और शिव की रक्षा मिलती है। अंतिम पद फल की पारंपरिक भाषा का प्रयोग करते हैं, जिसमें बोझ से राहत और संतान का आशीर्वाद शामिल है। ये आस्था की अभिव्यक्तियाँ हैं, गारंटी नहीं, और चालीसा को प्रेम और समर्पण के भाव से अर्पित करना ही सबसे अच्छा है।
शिव की गहरी साधना के लिए चालीसा के साथ शिव पंचाक्षर स्तोत्र, 108 बार ॐ नमः शिवाय का जाप, या महामृत्युंजय मंत्र भी जोड़ें।
NRI परिवारों के लिए सुझाव
- सोमवार सुबह, दस मिनट। स्कूल या काम से पहले एक छोटा-सा चालीसा पाठ विदेश के व्यस्त सप्ताह में भी आसानी से निभाया जा सकता है।
- चार भागों में सीखें। ऊपर दी गई तालिका का उपयोग करें और हर सप्ताह एक भाग सीखें।
- शिव मंदिर जाएँ। विदेश में कई मंदिर सोमवार और शिवरात्रि पर रुद्राभिषेक और चालीसा पाठ आयोजित करते हैं। हमारी मार्गदर्शिका देखें: USA में दर्शन योग्य शिव मंदिर और वर्तमान समय के लिए हर मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट देखें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
शिव चालीसा हिंदी में अर्थ सहित कहाँ मिलेगी?
ऊपर पूरी शिव चालीसा हिंदी (देवनागरी) में लिप्यंतरण के साथ दी गई है, और हर दोहे व चौपाई के बाद उसका सरल अर्थ है। यह 'जय गणेश गिरिजा सुवन' दोहे से आरंभ होती है, इसमें चालीस चौपाइयाँ हैं और यह एक समापन दोहे पर पूरी होती है। इसके बाद शिव आरती 'ॐ जय शिव ओंकारा' दी गई है।
शिव चालीसा किसने लिखी?
परंपरा से इस चालीसा की रचना अयोध्यादास को मानी जाती है, क्योंकि कवि ने आरंभिक दोहे में और फिर अंतिम चौपाई में ('कहैं अयोध्यादास') अपना नाम लिया है। उनके बारे में इससे अधिक जानकारी नहीं मिलती। इसके बाद आने वाली शिव आरती के अंतिम पद में स्वामी शिवानंद का नाम आता है।
शिव चालीसा पढ़ने के क्या लाभ हैं?
भक्तों की मान्यता है कि श्रद्धा से शिव चालीसा का पाठ करने से मन को शांति, कठिनाई में साहस और भगवान शिव की कृपा मिलती है। चालीसा के अंतिम पद शिव की सहायता, कष्टों से मुक्ति और पूर्व पापों से शुद्धि की बात करते हैं। ये इस स्तुति के आध्यात्मिक महत्व के पारंपरिक कथन हैं, किसी विशेष फल की गारंटी नहीं।
शिव चालीसा कितनी बार पढ़नी चाहिए?
दिन में एक बार, अच्छा हो तो सुबह, पढ़ना सामान्य परंपरा है, और समापन दोहा स्वयं प्रतिदिन पाठ करने को कहता है। कुछ भक्त सोमवार, श्रावण या महाशिवरात्रि पर इसे तीन, ग्यारह या चालीस बार पढ़ते हैं; कुछ चालीस दिन तक रोज़ एक बार पढ़ते हैं। संख्या से अधिक महत्वपूर्ण है नियमित और ध्यानपूर्वक पाठ।
शिव चालीसा के लिए कौन-सा दिन सबसे अच्छा है?
सोमवार भगवान शिव का दिन है। चालीसा पूरे श्रावण मास में, प्रदोष (त्रयोदशी) के दिनों में, जिनका उल्लेख चालीसा में ही है, महाशिवरात्रि और मासिक शिवरात्रि पर, तथा कार्तिक मास के सोमवारों को भी पढ़ी जाती है।
क्या महिलाएँ शिव चालीसा पढ़ सकती हैं?
हाँ। शिव चालीसा सरल हिंदी में एक घरेलू भक्ति-स्तुति है, और महिलाएँ, पुरुष और बच्चे सभी इसका पाठ करते हैं। बहुत-सी महिलाएँ सोमवार के व्रत और श्रावण सोमवार व्रत में इसे पढ़ती हैं।
संपादकीय टिप्पणी
संपादकीय टिप्पणी (7 अक्टूबर 2026): पिछला संस्करण खो जाने के बाद यह मार्गदर्शिका अपने मूल पते पर पुनः स्थापित की गई है। शिव चालीसा और शिव आरती का देवनागरी पाठ और लिप्यंतरण sanskritdocuments.org के हिंदी संस्करण के अनुसार है। मुद्रित संस्करणों और पारिवारिक परंपराओं में शब्दों और पाठ के छोटे-मोटे भेद मिलते हैं; यदि आपका परिवार या मंदिर किसी विशेष पुस्तक का पालन करता है, तो उसी पुस्तक का अनुसरण करें। अर्थ हमारे अपने सरल अनुवाद हैं। रचयिता का नाम परंपरा के अनुसार दिया गया है, और यह स्तुति भक्ति के रूप में प्रस्तुत है, किसी विशेष फल के वादे के बिना।




