संक्षिप्त उत्तर: जय गणेश देवा भगवान गणेश की सबसे अधिक गाई जाने वाली हिंदी आरती है। इसकी टेक, 'जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा, माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा', गणेश जी की पार्वती और शिव के पुत्र के रूप में स्तुति करती है। इसे गणेश पूजा के अंत में, भगवान के सामने दीपक घुमाते समय गाया जाता है। नीचे आपको देवनागरी में पूरा पाठ, रोमन लिप्यंतरण, पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ, प्रचलित पाठभेद और इसे गाने की व्यावहारिक मार्गदर्शिका मिलेगी।

यह पृष्ठ मूल रूप से hindutone.com पर प्रकाशित हुआ था और उसी पते पर पुनः उपलब्ध कराया गया है। यह भारत और विदेशों में बसे उन परिवारों के लिए लिखा गया है जो आरती सही ढंग से गाना और हर पंक्ति का अर्थ समझना चाहते हैं, ताकि विदेश में बड़े हो रहे बच्चे भी आत्मविश्वास के साथ इसमें शामिल हो सकें।

देवनागरी में पूरा पाठ

नीचे दिया गया पाठ उत्तर भारत की आरती-पुस्तकों में सबसे अधिक छपने वाला संस्करण है। हर पद के बाद टेक दोहराई जाती है।

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जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।

माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥

एक दंत दयावंत चार भुजा धारी।

माथे सिंदूर सोहे मूसे की सवारी॥

पान चढ़े फूल चढ़े और चढ़े मेवा।

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लड्डुअन का भोग लगे संत करें सेवा॥

अंधन को आंख देत कोढ़िन को काया।

बांझन को पुत्र देत निर्धन को माया॥

'सूर' श्याम शरण आए सफल कीजे सेवा।

माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥

कई परिवार अंत में यह दोहा भी जोड़ते हैं:

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दीनन की लाज रखो शंभु सुतकारी।

कामना को पूर्ण करो जाऊं बलिहारी॥

अंग्रेज़ी अक्षरों में लिप्यंतरण

जो देवनागरी नहीं पढ़ सकते, वे यह रोमन लिप्यंतरण उपयोग करें। 'aa' को 'आ' (जैसे 'father' में) और 'e' को 'ए' (जैसे 'day' में) पढ़ें।

  • Jai Ganesh, Jai Ganesh, Jai Ganesh Deva, Mata jaki Parvati, Pita Mahadeva।
  • Ek dant dayavant, char bhuja dhari, Mathe sindoor sohe, muse ki savari।
  • Paan chadhe, phool chadhe, aur chadhe meva, Ladduan ka bhog lage, sant karen seva।
  • Andhan ko aankh det, kodhin ko kaya, Baanjhan ko putra det, nirdhan ko maya।
  • 'Sur' Shyam sharan aaye, safal kije seva, Mata jaki Parvati, Pita Mahadeva।
  • Deenan ki laaj rakho, Shambhu sutkari, Kamna ko poorn karo, jaun balihari।

पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ

पंक्तिअर्थ
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवागणेश जी की जय हो, भगवान गणेश की जय हो।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवाजिनकी माता पार्वती हैं और पिता महादेव (शिव) हैं।
एक दंत दयावंत, चार भुजा धारीएक दाँत वाले, दयालु प्रभु, जो चार भुजाएँ धारण करते हैं।
माथे सिंदूर सोहे, मूसे की सवारीउनके माथे पर सिंदूर शोभा देता है और वे मूषक की सवारी करते हैं।
पान चढ़े, फूल चढ़े, और चढ़े मेवाउन्हें पान, फूल और मेवे अर्पित किए जाते हैं।
लड्डुअन का भोग लगे, संत करें सेवालड्डुओं का भोग लगता है और संतजन उनकी सेवा करते हैं।
अंधन को आंख देत, कोढ़िन को कायावे अंधों को दृष्टि और रोगियों को स्वस्थ शरीर देते हैं।
बांझन को पुत्र देत, निर्धन को मायावे निःसंतान को संतान और निर्धन को धन का आशीर्वाद देते हैं।
'सूर' श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवाकवि ('सूर श्याम') आपकी शरण में आया है; उसकी सेवा सफल कीजिए।
दीनन की लाज रखो, शंभु सुतकारीहे शंभु (शिव) के पुत्र, दीन-दुखियों की लाज रखिए।
कामना को पूर्ण करो, जाऊं बलिहारीहमारी कामनाएँ पूरी कीजिए; मैं आप पर स्वयं को न्योछावर करता हूँ।

दृष्टि, स्वास्थ्य, संतान और धन वाले पद भक्ति-काव्य की शैली में गणेश जी की करुणा की स्तुति हैं। ये उनकी कृपा पर विश्वास व्यक्त करते हैं; इनका अर्थ यह नहीं कि आरती गाना चिकित्सा या परिश्रम का विकल्प है।

आरती के प्रतीक हमें क्या बताते हैं

  • एक दंत (एक दाँत): गणेश जी एकदंत हैं। टूटे दाँत की व्याख्या अलग-अलग पौराणिक कथाओं में मिलती है, परशुराम से युद्ध से लेकर महाभारत लिखने तक। भक्ति की दृष्टि से इसे किसी उच्च उद्देश्य के लिए त्याग के रूप में समझा जाता है।
  • चार भुजा (चार भुजाएँ): शास्त्रीय प्रतिमाओं में वे पाश, अंकुश, मोदक या मिठाई धारण किए होते हैं और एक हाथ आशीर्वाद मुद्रा में उठा होता है।
  • सिंदूर: सिंदूर गणेश जी को अर्पित की जाने वाली पारंपरिक वस्तु है, विशेषकर महाराष्ट्र और उत्तर भारत में।
  • मूसे की सवारी (मूषक): मूषक उनका वाहन है। एक प्रचलित शिक्षा यह है कि बुद्धि के स्वामी चंचल इच्छाओं पर सवार होकर उन्हें नियंत्रित करते हैं।
  • लड्डू और पान: ये उत्तर भारतीय घरों के पारंपरिक भोग हैं; महाराष्ट्र में मोदक और दक्षिण में कुडुमुलु या कोळुकट्टै अधिक प्रचलित हैं।

प्रचलित पाठभेद जो आप सुन सकते हैं

आरतियाँ मौखिक परंपरा से आगे बढ़ती हैं, इसलिए छोटे-मोटे अंतर स्वाभाविक हैं। आप ये सुन सकते हैं:

  • 'माथे सिंदूर सोहे' के स्थान पर 'माथे पर तिलक सोहे'।
  • 'लड्डुअन का भोग लगे' के स्थान पर 'लड्डू का भोग लगे'।
  • पदों का अलग क्रम, जिसमें 'अंधन को आंख देत' को 'पान चढ़े' से पहले गाया जाता है।
  • 'दीनन की लाज रखो' दोहा छोड़ दिया जाता है, या केवल सबसे अंत में एक बार गाया जाता है।
  • कुछ मंदिर आरती के बाद 'बोलो गणपति बप्पा मोरया' या 'जय बोलो गणेश महाराज की जय' जोड़ते हैं।

यदि आपके परिवार या मंदिर का अपना संस्करण है, तो उसी को अपनाएँ। किसी एक शब्द से कहीं अधिक महत्व भक्ति का है।

इसे कैसे गाएँ: धुन, लय और ऑडियो से सीखने की योजना

जय गणेश देवा एक सरल, स्थिर धुन में गाई जाती है जो समूह में गाने के लिए आसान है, इसीलिए यह मंदिरों और सामुदायिक भवनों में इतनी अच्छी तरह गाई जाती है। हमने यहाँ कोई रिकॉर्डिंग नहीं जोड़ी है, क्योंकि कोई एक प्रामाणिक संस्करण नहीं है और गुणवत्ता अलग-अलग होती है। इसके बजाय यह योजना अपनाएँ:

  • एक रिकॉर्डिंग चुनें और उसी पर टिके रहें। अपने स्थानीय मंदिर या किसी प्रसिद्ध भक्ति लेबल का स्पष्ट संस्करण चुनें। सीखते समय धुन बदलने से भ्रम होता है।
  • पहले टेक सीखें। 'जय गणेश देवा' में हर कोई एक मिनट में शामिल हो सकता है; बच्चे अक्सर टेक दोहराते-दोहराते बाकी आरती भी सीख जाते हैं।
  • ताली या घंटी से लय बनाए रखें। आरती एक समान ताल में चलती है। एक व्यक्ति घंटी बजाता है और दूसरा दीपक घुमाता है।
  • लिप्यंतरण देखकर साथ-साथ पढ़ें। जो बच्चे और अतिथि हिंदी नहीं पढ़ते, उनके लिए ऊपर दिया गया लिप्यंतरण प्रिंट कर लें।
  • शुरुआत करने वालों के लिए धीमे गाएँ। विदेश में मिले-जुले समूहों में थोड़ी धीमी गति से हर कोई हर शब्द गा पाता है।

घर पर आरती कैसे करें

  • पहले मुख्य पूजा पूरी करें: फूल, दूर्वा, मिठाई और नैवेद्य अर्पित करें।
  • आरती की थाली में घी का दीपक या कपूर जलाएँ। थाली में थोड़ा कुमकुम, अक्षत और एक फूल रखें।
  • भगवान की ओर मुख करके खड़े हों। एक व्यक्ति दीपक को दक्षिणावर्त (घड़ी की दिशा में) घुमाए, जबकि सभी गाएँ और ताली बजाएँ।
  • एक व्यापक रूप से प्रचलित क्रम है चरणों पर चार बार, नाभि पर दो बार, मुख पर एक बार और पूरे स्वरूप पर सात बार, हालाँकि रीतियाँ अलग-अलग होती हैं।
  • आरती के बाद थाली सबके पास ले जाई जाती है। हर व्यक्ति अपनी हथेलियाँ लौ के ऊपर से घुमाकर आँखों और सिर से लगाता है।
  • प्रसाद बाँटें। कई परिवार इसके बाद पूजा में हुई किसी भी भूल के लिए क्षमा माँगते हुए एक छोटी प्रार्थना करते हैं।

NRI परिवारों के लिए सुझाव

  • स्मोक अलार्म: कपूर से बहुत धुआँ होता है। USA, UK, कनाडा या ऑस्ट्रेलिया के अपार्टमेंट में इसके बजाय घी का छोटा दीया उपयोग करें और उसे डिटेक्टर और पर्दों से दूर रखें।
  • केवल ध्वनि नहीं, अर्थ भी सिखाएँ: हर पंक्ति समझाने के लिए ऊपर दी गई तालिका का उपयोग करें। बच्चे वही गीत याद रखते हैं जिन्हें वे समझते हैं।
  • ऑनलाइन साथ मिलकर गाएँ: भारत में रहने वाले दादा-दादी या नाना-नानी वीडियो कॉल पर आरती का नेतृत्व कर सकते हैं; अलग-अलग टाइम ज़ोन में भी पारिवारिक परंपरा को जीवित रखने का यह सरल तरीका है।
  • मंदिर कार्यक्रम: अधिकांश प्रवासी मंदिरों में गणेश चतुर्थी और संकष्टी पर जय गणेश देवा गाई जाती है। कार्यक्रम के समय के लिए अपने मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट देखें।

महाराष्ट्र के परिवार प्रायः जय गणेश देवा के साथ या उसके स्थान पर 'सुखकर्ता दुखहर्ता' गाते हैं। देखें हमारी अलग मार्गदर्शिका सुखकर्ता दुखहर्ता और उसका अर्थ, और हमारा व्यापक संग्रह अर्थ सहित गणेश आरतियाँ।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

जय गणेश देवा आरती किसने लिखी?

अंतिम पद में 'सूर श्याम' की छाप है, इसलिए यह आरती लोकप्रिय रूप से संत-कवि सूरदास की रचना मानी जाती है। इसका कोई ठोस ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है, और कई विद्वान इसके रचयिता को अज्ञात मानते हैं। इतना निश्चित है कि यह पीढ़ियों से पूरे उत्तर भारत में गाई जाती रही है।

'माथे सिंदूर सोहे' सही है या 'माथे पर तिलक सोहे'?

दोनों ही गाए जाते हैं। इस पंक्ति पर छपी आरती-पुस्तकों और मंदिर परंपराओं में अंतर है। गणेश जी को परंपरा से सिंदूर अर्पित किया जाता है, इसलिए 'माथे सिंदूर सोहे' अधिक प्रचलित पाठ है, पर कोई भी गलत नहीं है।

क्या जय गणेश देवा गणेश चतुर्थी के अलावा अन्य दिनों में भी गा सकते हैं?

हाँ। यह लगभग हर गणेश पूजा के अंत में, बुधवार को, संकष्टी चतुर्थी पर, किसी नए काम की शुरुआत से पहले और कई घरों व मंदिरों में रोज़ की संध्या आरती में गाई जाती है।

आरती की थाली कितनी बार घुमानी चाहिए?

घरों में प्रचलित एक व्यापक परंपरा है कि दीपक को भगवान के चरणों में चार बार, नाभि पर दो बार, मुख पर एक बार और फिर पूरे स्वरूप पर सात बार घुमाया जाए। पारिवारिक रीतियाँ अलग-अलग होती हैं, इसलिए अपने बड़ों या मंदिर के पुजारी जी जैसा करते हैं, वैसा ही करें।

क्या कोई आधिकारिक ऑडियो संस्करण है जिसका उपयोग करना चाहिए?

कोई एक आधिकारिक रिकॉर्डिंग नहीं है। परिवार प्रायः धुन अपने स्थानीय मंदिर से या लोकप्रिय भक्ति रिकॉर्डिंग से सीखते हैं। एक स्पष्ट, स्थिर संस्करण चुनें और उसके साथ तब तक गाएँ जब तक आप स्वयं आरती का नेतृत्व न कर सकें।

संपादकीय टिप्पणी

संपादकीय टिप्पणी (5 अक्टूबर 2026): पिछला संस्करण खो जाने के बाद यह मार्गदर्शिका अपने मूल पते पर पुनः उपलब्ध कराई गई है। पाठ उत्तर भारत की आरती-पुस्तकों में सबसे अधिक छपने वाले संस्करण पर आधारित है; जहाँ परंपराओं में अंतर है, वहाँ हमने उन पंक्तियों का उल्लेख किया है। सूरदास द्वारा रचना एक लोकप्रिय मान्यता है, स्थापित तथ्य नहीं। यदि आपका मंदिर कोई अलग संस्करण गाता है, तो अपने मंदिर का अनुसरण करें।

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