हरतालिका तीज व्रत कथा — पार्वती की तपस्या, उनकी सखियाँ और शिव का वरदान
पारंपरिक हरतालिका तीज व्रत कथा — पार्वती की कठोर तपस्या, उनकी सखियों (आलिकाओं) द्वारा "अपहरण" जो शिव को जीतने में सहायक बना, और भाद्रपद शुक्ल तृतीया पर वन-गुफा विवाह।

पारंपरिक हरतालिका तीज व्रत कथा — पार्वती की कठोर तपस्या, उनकी सखियों (आलिकाओं) द्वारा "अपहरण" जो शिव को जीतने में सहायक बना, और भाद्रपद शुक्ल तृतीया पर वन-गुफा विवाह।
हरतालिका तीज व्रत कथा व्रत के दिन शाम को पढ़ी जाने वाली पवित्र कथा है — पार्वती की असाधारण तपस्या और उनकी सखियों द्वारा उनके "अपहरण" की कथा जो उन्हें शिव के लिए तपस्या पूरी करने में सहायक बनी।
पौराणिक कथा — पारंपरिक निरूपण
बहुत समय पहले हिमालय में राजा हिमवान की पुत्री थीं — पार्वती, अद्वितीय सुंदरता और भक्ति की मूर्ति। बचपन से पार्वती की एक ही इच्छा थी: शिव को पति रूप में पाना। और कोई पति उन्हें दिखाई नहीं देता था।
पार्वती ने घोर तपस्या आरंभ की। वर्षों तक एक पैर पर खड़ी रहीं। महीनों उपवास किए। शिव की माला से गिरे बिल्व पत्र ही खाती थीं। गर्मी का ताप, सर्दी का बर्फ — बिना छत के सहती रहीं। शरीर क्षीण होता गया; तपस्या बढ़ती गई।
नारद मुनि हिमवान के महल आए और उन्होंने राजा को सलाह दी: "आपकी पुत्री की तपस्या अद्वितीय है। विष्णु स्वयं मोहित हैं। पार्वती का हाथ विष्णु को दे दीजिए — वे वैकुंठ की रानी बनेंगी।"
हिमवान का हृदय प्रसन्न हो उठा। विष्णु से बड़ा दामाद और कौन? उन्होंने तुरंत सहमति दे दी और विवाह की तैयारी शुरू कर दी — पार्वती से पूछे बिना।
जब पार्वती को अपने पिता की योजना का पता चला, तो उनका संसार टूट गया। उन्होंने शिव के लिए तपस्या की थी। किसी और से विवाह — विष्णु से भी — का अर्थ था अपनी हर प्रार्थना का त्याग।
उस शाम पार्वती अकेली रोती रहीं। उनकी परम प्रिय सखियाँ — आलिकाएँ — उनके पास आईं और उनका दुख सुना। बिना विलंब के उन्होंने वह निर्णय लिया जिसने इस व्रत को नाम दिया।
"हम आपको छिपा देंगी," सखियों ने कहा। "हम हरण कर आपको इस महल से एक जंगल की गुफा में ले जाएँगी। वहाँ आप अपनी तपस्या पूरी करेंगी। शिव अवश्य आएँगे।"
उस रात आलिकाओं ने पार्वती को महल से चुपचाप निकाला, हिमालय के जंगल में, एक पवित्र झरने के पास एक गुप्त गुफा तक ले गईं। पार्वती ने झरने में स्नान किया। नदी की रेत से एक शिवलिंग बनाया। और अपनी अंतिम, सबसे तीव्र तपस्या शुरू की।
अगणित दिनों तक पार्वती रेत के शिवलिंग के सामने बैठी रहीं। केवल बिल्व पत्र और नदी का जल अर्पण करती। केवल शिव का नाम जपती। भूख, प्यास, गर्मी, सर्दी — कुछ भी अनुभव नहीं होता। केवल शिव।
इसी बीच हिमवान का महल अशांत था। राजकुमारी विवाह की पूर्व संध्या पर लापता। खोज दल हर पहाड़ी और घाटी में गए। विष्णु ने स्वयं — सत्य जानकर — विवाह से चुपचाप हाथ खींच लिया। उन्हें ऐसी स्त्री से विवाह की इच्छा नहीं थी जो किसी और के प्रति समर्पित हो। विवाह रद्द हो गया।
अंत में — भाद्रपद शुक्ल तृतीया के दिन — शिव पार्वती के सामने प्रकट हुए। न रुद्र रूप में, न भस्म-लिप्त तपस्वी रूप में — बल्कि युवा वर के रूप में, माला-सज्जित और मुस्कुराते हुए। उन्होंने पार्वती के सामने घुटने टेके और कहा:
"पार्वती, तुम्हारी जैसी शुद्ध तपस्या किसी आत्मा ने नहीं की। मैं तुम्हें पत्नी रूप में स्वीकार करता हूँ। उठो। हम विवाह करेंगे।"
जंगल फूला। झरना और मीठा बहा। पार्वती की सखियाँ आनंद से नाच उठीं। शिव और पार्वती का विवाह उसी रात जंगल की गुफा में हुआ — साक्षी चंद्रमा, पुरोहित ब्रह्मा।
यह दिन — भाद्रपद शुक्ल तृतीया — हरतालिका तीज के रूप में स्मरण किया जाता है। प्रति वर्ष विवाहित महिलाएँ पार्वती की भक्ति की स्मृति में और अपने पति की दीर्घायु के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। अविवाहित लड़कियाँ शिव जैसे समर्पित पति की प्राप्ति के लिए।
शास्त्रीय स्रोत
- भविष्य पुराण — आलिका-सखी प्रसंग।
- शिव पुराण — कैलाश पर पार्वती की तपस्या।
- स्कंद पुराण (नागर खंड) — क्षेत्रीय संस्करण।
- क्षेत्रीय लोक परंपराएँ — UP, बिहार, MP, राजस्थान, उत्तराखंड की अपनी विशिष्ट कथाएँ।
कथा कब पढ़ें
हरतालिका तीज व्रत कथा प्रदोष काल में पढ़ी जाती है — व्रत के दिन (10 सितंबर 2026, शाम 6:30 से 8:45 IST) की सूर्यास्त खिड़की।
- शिव-पार्वती-गणेश की षोडशोपचार पूजा पूरी करें।
- वेदी के सामने बैठें; परिवार एकत्रित हो।
- व्रत करने वाली महिला/वृद्धा कथा को ज़ोर से पढ़ें।
- सभी हाथ जोड़कर बिना विघ्न सुनें।
- अंत में तीन बार "बोलो शिव-पार्वती की जय!"
- आरती। प्रसाद वितरण।
संबंधित: हरतालिका तीज 2026 मुख्य गाइड • अंग्रेज़ी: Vrat Katha.
