श्री वेंकटेश विजयार्या सप्तविभक्ति स्तोत्रम्: तेलुगु, संस्कृत और IAST पाठ, अर्थ सहित
कलियुग दैवम् श्री वेंकटेश्वर की संस्कृत व्याकरण की सात विभक्तियों से स्तुति करने वाला एक विशिष्ट स्तोत्र। sanskritdocuments.org के सत्यापित पाठ से सभी 9 श्लोक तेलुगु लिपि, देवनागरी और IAST में, हर श्लोक के भाव के साथ।

कलियुग दैवम् श्री वेंकटेश्वर स्वामी का दिव्य स्तोत्र।
यह श्री वेंकटेश्वर स्वामी के दिव्य मंगल स्वरूप, अपार करुणा और अनंत महिमा का गुणगान करने वाला एक विशिष्ट संस्कृत स्तोत्र है। ‘वादींद्र भीकर’ की उपाधि वाले श्री अण्णन् स्वामी ने इस स्तोत्र की रचना की।
इस स्तोत्र की विशेषता यह है कि इसमें संस्कृत व्याकरण की सात विभक्तियों के द्वारा स्वामी की स्तुति की गई है। पहला श्लोक प्रथमा विभक्ति में, दूसरा संबोधन में, और तीसरे से आठवें श्लोक तक क्रम से द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, पंचमी, षष्ठी और सप्तमी विभक्तियों में हैं। नौवाँ श्लोक रचना की विशेषता बताता है।
पाठ के बारे में: नीचे दिए गए श्लोक sanskritdocuments.org पर प्रकाशित पाठ हैं। हर श्लोक पहले तेलुगु लिपि में, फिर देवनागरी में और फिर IAST लिप्यंतरण में है; सब मूल से सॉफ़्टवेयर द्वारा बदले गए हैं, एक भी अक्षर हाथ से टाइप नहीं किया गया। हर श्लोक के बाद उसका भाव दिया गया है।
सात विभक्तियाँ एक नज़र में
| श्लोक | विभक्ति | विषय |
|---|---|---|
| 1 | प्रथमा (कर्ता) | स्वामी की महिमा |
| 2 | संबोधन | स्वामी की विजय की प्रार्थना |
| 3 | द्वितीया (कर्म) | दिव्य मंगल रूप के दर्शन |
| 4 | तृतीया (करण) | दिव्य तेज |
| 5 | चतुर्थी (संप्रदान) | स्वामी को नमस्कार |
| 6 | पंचमी (अपादान) | स्वामी से बढ़कर कोई नहीं |
| 7 | षष्ठी (संबंध) | कल्पवृक्ष से तुलना |
| 8 | सप्तमी (अधिकरण) | संपूर्ण शरणागति |
| 9 | - | रचना की विशेषता |
श्री वेंकटेश विजयार्या सप्तविभक्ति स्तोत्रम्: संपूर्ण पाठ, भाव सहित
1. प्रथमा विभक्ति: स्वामी की महिमा
శ్రీవేంకటాద్రిధామా భూమా భూమాప్రియః కృపాసీమా ।
నిరవధికనిత్యమహిమా భవతు జయీ ప్రణతదర్శితప్రేమా ॥ 1॥
श्रीवेङ्कटाद्रिधामा भूमा भूमाप्रियः कृपासीमा ।
निरवधिकनित्यमहिमा भवतु जयी प्रणतदर्शितप्रेमा ॥ १॥
śrīveṅkaṭādridhāmā bhūmā bhūmāpriyaḥ kṛpāsīmā |
niravadhikanityamahimā bhavatu jayī praṇatadarśitapremā || 1||
भाव: वेंकटाद्रि को अपना निवास बनाने वाले, अनंत महिमा वाले, भूदेवी के प्रिय, अपार करुणा की मूर्ति और शरण में आए भक्तों पर प्रेम दिखाने वाले श्रीनिवास सदा विजयी हों!
2. संबोधन: स्वामी की विजय की प्रार्थना
జయ జనతా విమళీకృతిసఫలీకృతసకలమంగలాకార ।
విజయీ భవ విజయీ భవ విజయీ భవ వేంకటాచలాధీశ ॥ 2॥
जय जनता विमळीकृतिसफलीकृतसकलमङ्गलाकार ।
विजयी भव विजयी भव विजयी भव वेङ्कटाचलाधीश ॥ २॥
jaya janatā vimaḻīkṛtisaphalīkṛtasakalamaṅgalākāra |
vijayī bhava vijayī bhava vijayī bhava veṅkaṭācalādhīśa || 2||
भाव: भक्तों को पवित्र बनाकर उनके जीवन में सभी मंगल प्रदान करने वाले हे वेंकटाचलाधीश! आपकी जय हो! जय हो! जय हो!
3. द्वितीया विभक्ति: दिव्य मंगल रूप के दर्शन
కనీయమందహసితం కంచన కందర్పకోటిలావణ్యమ్ ।
పశ్యేయమంజనాద్రౌ పుంసాం పూర్వతనపుణ్యపరిపాకమ్ ॥ 3॥
कनीयमन्दहसितं कञ्चन कन्दर्पकोटिलावण्यम् ।
पश्येयमञ्जनाद्रौ पुंसां पूर्वतनपुण्यपरिपाकम् ॥ ३॥
kanīyamandahasitaṃ kañcana kandarpakoṭilāvaṇyam |
paśyeyamañjanādrau puṃsāṃ pūrvatanapuṇyaparipākam || 3||
भाव: मनोहर मंद मुस्कान वाले, करोड़ों कामदेवों से भी बढ़कर सौंदर्य वाले, अंजनाद्रि पर विराजमान स्वामी के दिव्य मंगल रूप के दर्शन का सौभाग्य मुझे प्राप्त हो!
4. तृतीया विभक्ति: दिव्य तेज
మరతకమేచకరుచినా మదనాజ్ఞాగంధిమధ్యహృదయేన ।
వృషశైలమౌలిసుహృదా మహసా కేనాపి వాసితం జ్ఞేయమ్ ॥ 4॥
मरतकमेचकरुचिना मदनाज्ञागन्धिमध्यहृदयेन ।
वृषशैलमौलिसुहृदा महसा केनापि वासितं ज्ञेयम् ॥ ४॥
maratakamecakarucinā madanājñāgandhimadhyahṛdayena |
vṛṣaśailamaulisuhṛdā mahasā kenāpi vāsitaṃ jñeyam || 4||
भाव: जानना चाहिए कि यह जगत मरकत मणि जैसी श्यामल कांति वाले, मनोहर दिव्य तेज से भरा हुआ है। यह श्लोक स्वामी के अपूर्व तेज का वर्णन करता है।
5. चतुर्थी विभक्ति: स्वामी को नमस्कार
పత్యై నమో వృషాద్రేః కరయుగపరికర్మశంఖచక్రాయ ।
ఇతరకరకమలయుగలీదర్శితకటిబంధదానముద్రాయ ॥ 5॥
पत्यै नमो वृषाद्रेः करयुगपरिकर्मशङ्खचक्राय ।
इतरकरकमलयुगलीदर्शितकटिबन्धदानमुद्राय ॥ ५॥
patyai namo vṛṣādreḥ karayugaparikarmaśaṅkhacakrāya |
itarakarakamalayugalīdarśitakaṭibandhadānamudrāya || 5||
भाव: दो हाथों में शंख और चक्र धारण किए, शेष दो हाथों से कटि भाग और वरद मुद्रा दिखाते हुए दर्शन देने वाले वृषाद्रिपति श्री वेंकटेश्वर स्वामी को नमस्कार।
6. पंचमी विभक्ति: स्वामी से बढ़कर कोई नहीं
సామ్రాజ్యపిశునమకుటీసుఘటలలాటాత్ సుమంగలా పాంగాత్ ।
స్మితరుచిఫుల్లకపోలాదపరో న పరోఽస్తి వేంకటాద్రీశాత్ ॥ 6॥
साम्राज्यपिशुनमकुटीसुघटललाटात् सुमङ्गला पाङ्गात् ।
स्मितरुचिफुल्लकपोलादपरो न परोऽस्ति वेङ्कटाद्रीशात् ॥ ६॥
sāmrājyapiśunamakuṭīsughaṭalalāṭāt sumaṅgalā pāṅgāt |
smitaruciphullakapolādaparo na paro'sti veṅkaṭādrīśāt || 6||
भाव: राजसी वैभव बताने वाले मुकुट से सुशोभित ललाट, शुभ कटाक्ष और मुस्कान से खिले कपोलों वाले वेंकटाद्रीश से बढ़कर कोई दूसरा देवता नहीं है।
7. षष्ठी विभक्ति: कल्पवृक्ष से तुलना
సర్వాభరణవిభూషితదివ్యావయవస్య వేంకటాద్రిపతేః ।
పల్లవపుష్పవిభూషితకల్పతరోశ్చాపి కా భిదా దృష్టా ॥ 7॥
सर्वाभरणविभूषितदिव्यावयवस्य वेङ्कटाद्रिपतेः ।
पल्लवपुष्पविभूषितकल्पतरोश्चापि का भिदा दृष्टा ॥ ७॥
sarvābharaṇavibhūṣitadivyāvayavasya veṅkaṭādripateḥ |
pallavapuṣpavibhūṣitakalpataroścāpi kā bhidā dṛṣṭā || 7||
भाव: सभी आभूषणों से अलंकृत वेंकटाद्रिपति स्वामी और कोंपलों व फूलों से सजे कल्पवृक्ष में क्या अंतर है? भक्तों को मनचाहे शुभ फल देने वाले कल्पवृक्ष से स्वामी की तुलना की गई है।
8. सप्तमी विभक्ति: संपूर्ण शरणागति
లక్ష్మీలలితపదాంబుజలాక్షారసరంజితాయతోరస్కే ।
శ్రీవేంకటాద్రినాథే నాథే మమ నిత్యమర్పితో భారః ॥ 8॥
लक्ष्मीललितपदाम्बुजलाक्षारसरञ्जितायतोरस्के ।
श्रीवेङ्कटाद्रिनाथे नाथे मम नित्यमर्पितो भारः ॥ ८॥
lakṣmīlalitapadāmbujalākṣārasarañjitāyatoraske |
śrīveṅkaṭādrināthe nāthe mama nityamarpito bhāraḥ || 8||
भाव: लक्ष्मी देवी के चरण-कमलों में लगे लाक्षारस (महावर) से शोभित विशाल वक्षस्थल वाले मेरे प्रभु श्री वेंकटाद्रिनाथ में ही मेरे जीवन का सारा भार नित्य समर्पित है।
9. रचना की विशेषता
ఆర్యావృత్తసమేతా సప్తవిభక్తిర్వృషాద్రినాథస్య ।
వాదీంద్రభీకృదాఖ్యైరార్యై రచితా జయత్వియం సతతమ్ ॥ 9॥
आर्यावृत्तसमेता सप्तविभक्तिर्वृषाद्रिनाथस्य ।
वादीन्द्रभीकृदाख्यैरार्यै रचिता जयत्वियं सततम् ॥ ९॥
āryāvṛttasametā saptavibhaktirvṛṣādrināthasya |
vādīndrabhīkṛdākhyairāryai racitā jayatviyaṃ satatam || 9||
भाव: आर्या छंद में, सात विभक्तियों के द्वारा वृषाद्रिनाथ श्री वेंकटेश्वर स्वामी की स्तुति करते हुए वादींद्र भीकर नाम से प्रसिद्ध आर्य द्वारा रचित यह स्तोत्र सदा विजयी हो!
मूल का समापन वाक्य
॥ ఇతి శ్రీవేంకటేశవిజయార్యాసప్తవిభక్తిస్తోత్రం సంపూర్ణమ్ ॥
॥ इति श्रीवेङ्कटेशविजयार्यासप्तविभक्तिस्तोत्रं संपूर्णम् ॥
|| iti śrīveṅkaṭeśavijayāryāsaptavibhaktistotraṃ saṃpūrṇam ||
भाव: इस प्रकार श्री वेंकटेश विजयार्या सप्तविभक्ति स्तोत्र संपूर्ण हुआ।
आध्यात्मिक संदेश
श्री वेंकटेश्वर स्वामी के दिव्य मंगल रूप का स्मरण करना, उनकी अनंत करुणा का गुणगान करना और अपने जीवन का भार उन्हें समर्पित करना, यही इस स्तोत्र का मुख्य संदेश है। श्लोकों के भाव का मनन करते हुए भक्ति और श्रद्धा से पाठ करना मन को एकाग्र करने में सहायक होता है।
गोविंदा! गोविंदा!! श्रीनिवासा! शरणं प्रपद्ये!!
घर पर पाठ कैसे करें
- श्री वेंकटेश्वर स्वामी के चित्र के सामने दीपक जलाएँ और एक फूल या तुलसी दल अर्पित करें।
- पहले श्लोक का भाव पढ़ें, फिर श्लोक का धीरे-धीरे पाठ करें; जो परिवारजन देवनागरी नहीं पढ़ते, उनके लिए तेलुगु लिपि और IAST पंक्तियाँ सहायक हैं।
- नौ श्लोक और फिर समापन वाक्य पढ़कर 'गोविंदा, गोविंदा' कहकर समाप्त करें।
- अधिक समय वाले दिन श्री वेंकटेश्वर के 108 नाम या ॐ नमो वेंकटेशाय मंत्र भी जोड़ें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
'सप्तविभक्ति' का क्या अर्थ है?
'सप्त' का अर्थ है सात और 'विभक्ति' संस्कृत संज्ञाओं का व्याकरणिक रूप (कारक) है। इस स्तोत्र में स्वामी की स्तुति क्रम से हर विभक्ति में की गई है: श्लोक 1 प्रथमा में, श्लोक 2 संबोधन में, और श्लोक 3 से 8 तक द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, पंचमी, षष्ठी और सप्तमी में। श्लोक 9 रचना के बारे में बताता है।
इस स्तोत्र की रचना किसने की?
इसे ‘वादींद्र भीकर’ (बड़े-बड़े वादियों को भय देने वाले) की उपाधि वाले श्री अण्णन् स्वामी की रचना बताया जाता है। श्लोक 9 स्वयं कहता है कि इसे 'वादींद्रभीकृत्' नाम से प्रसिद्ध आर्य ने रचा। मूल पाठ रचयिता के बारे में इससे अधिक कुछ नहीं बताता, इसलिए हमने भी कुछ नहीं जोड़ा।
यह किस छंद में है?
आर्या छंद (आर्या वृत्त) में, जैसा श्लोक 9 कहता है। आर्या छंद अक्षरों से नहीं, मात्राओं से मापा जाता है; हर श्लोक में दो पंक्तियाँ हैं।
इस पृष्ठ का संस्कृत पाठ कहाँ से लिया गया है?
sanskritdocuments.org से (मल्लेश्वर राव येल्लाप्रगडा द्वारा तेलुगु पुस्तक 'वेंकटेश काव्यकलाप' से एनकोड और प्रूफ़रीड किया गया)। देवनागरी और IAST उस फ़ाइल से, और तेलुगु लिपि देवनागरी से सॉफ़्टवेयर द्वारा बदली गई है; एक भी अक्षर हाथ से टाइप नहीं किया गया।
इसके पाठ से क्या लाभ है?
हर श्लोक के भाव का मनन करते हुए भक्ति से पाठ करना मन को एकाग्र करने में सहायक होता है। यह भक्ति का कार्य है, किसी विशेष फल की गारंटी नहीं।
इसका पाठ कब किया जा सकता है?
श्री वेंकटेश्वर के चित्र के सामने दैनिक पूजा के समय कभी भी, और विशेष रूप से शनिवार को, जिसे बहुत से परिवार तिरुमला के स्वामी के लिए रखते हैं। इसमें कुछ ही मिनट लगते हैं।
संपादकीय टिप्पणी (25 अक्टूबर 2026)
यह पृष्ठ HinduTone को भेजी गई एक तेलुगु रचना पर आधारित है; परिचय, श्लोकों के शीर्षक, भाव और संदेश उसी रचना के हैं और यह हिंदी पृष्ठ उनका निष्ठापूर्ण अनुवाद है। संस्कृत पाठ sanskritdocuments.org पर श्री वेंकटेश विजयार्या सप्तविभक्ति स्तोत्रम् का है (फ़ाइल shrIveMkaTeshavijayAryAsaptavibhaktistotram.itx, तेलुगु पुस्तक 'वेंकटेश काव्यकलाप' से)। जहाँ भेजी गई प्रति और मूल में अंतर था, वहाँ मूल पाठ ही छापा गया है: श्लोक 3 में मूल 'kanīyamandahasitaṃ' पढ़ता है, जबकि भेजी गई प्रति 'kamanīyamandahasitaṃ' (मनोहर मंद मुस्कान), जिसकी ओर आर्या छंद भी संकेत करता है; श्लोक 4 में मूल 'marataka' और भेजी गई प्रति 'marakata' (दोनों का अर्थ मरकत मणि); श्लोक 2 और 5 में मूल की वर्तनी 'vimaḷī-', 'maṅgalā-' और 'yugalī' है। श्लोक 6 में मूल भी भेजी गई प्रति की तरह 'sumaṅgalā pāṅgāt' बीच में खाली जगह के साथ छापता है; इसे एक ही समास sumaṅgala-apāṅgāt (शुभ कटाक्ष) के रूप में पढ़ा जाता है। तेलुगु लिपि की पंक्तियों में व्यंजन से पहले आने वाला अनुनासिक तेलुगु पुस्तकों की तरह अनुस्वार (ం) के रूप में लिखा गया है।
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