ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् | उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात् ||

सबको शक्ति प्रदान करने वाले, सुगंध से युक्त त्रिनेत्रधारी (शिव) की आराधना करता हूँ। जैसे ककड़ी (खरबूज) अपनी बेल से सहज ही अलग हो जाती है, वैसे ही मैं मृत्यु के बंधन से मुक्त होकर अमरत्व को प्राप्त करूँ!

इसे मृत्युंजय मंत्र क्यों कहते हैं?

हजारों मंत्रों में इसी शिव-मंत्र को मृत्युंजय क्यों कहा जाता है? यहाँ मृत्यु को जीतने का अर्थ हजारों वर्ष जीवित रहना नहीं — बल्कि पुनर्जन्म का न होना, अर्थात् इसी जन्म में मुक्ति प्राप्त करना है।

Advertisement

यह मुक्ति मृत्यु के बाद नहीं, जीवित रहते ही प्राप्त करने योग्य स्थिति है। इसे पाने के लिए ज्ञानी होना आवश्यक है — और वह ज्ञान यही मंत्र प्रदान करता है।

उर्वारुक (ककड़ी) का दृष्टांत

बेल पर पकी ककड़ी अपनी डंठल से सहज ही अलग हो जाती है। ज्ञानी भी इसी प्रकार सांसारिकता (माया) से सहज विलग हो जाता है।

जैसे पकी ककड़ी डंठल से अलग होकर भी उसके पास ही रहती है, वैसे ही ज्ञानी संसार रूपी माया से मुक्त होकर भी, देह-प्रारब्ध शेष रहने तक संसार में जीवन्मुक्त रहता है — बंधन निकट रहते हुए भी अछूता, निरंतर आत्मानुभव में स्थित। जन्म-मरण से रहित यह स्थिति, अर्थात् पुनर्जन्म का अभाव ही मृत्यु पर विजय है।

यह स्थिति कैसे प्राप्त हो — यही त्रिनेत्रधारी की आराधना सिखाती है। ज्ञान-स्थिति तक पहुँचने के लिए गुरु आवश्यक है — और आदिगुरु स्वयं शिव हैं।

शिव के दिव्य रूप के आध्यात्मिक रहस्य

  • पंचभूतात्मक: व्याघ्र-चर्म पृथ्वी तत्त्व, सिर पर गंगा जल तत्त्व, तीसरा नेत्र अग्नि तत्त्व, विभूति वायु तत्त्व और शब्दब्रह्म स्वरूप डमरू आकाश तत्त्व के प्रतीक हैं।

    Advertisement
  • त्र्यम्बक: तीन नेत्र भूत-भविष्य-वर्तमान काल के सूचक; तीसरा नेत्र ज्ञान का प्रतीक — आज्ञा चक्र स्थित इस प्रज्ञा-चक्षु पर ही इडा, पिंगला व सुषुम्ना का त्रिवेणी संगम है।

  • त्रिपुंड्र (तीन रेखाएँ): जाग्रत, स्वप्न व सुषुप्ति अवस्थाओं की, और मध्य बिंदु तुरीय अवस्था का प्रतीक। जगत त्रिगुणात्मक है, गुणातीत बनो — तथा शिव-विष्णु भेद रहित सब त्रिमूर्त्यात्मक व अंततः एक है, यह संकेत।

  • भस्मधारी: सृष्टि कभी न कभी भस्म होगी; “मैं-तुम” कहा जाने वाला यह देह भी भस्म होगा — यही भस्म-धारण का अभिप्राय।

  • त्रिशूल: सत्व-रजस्-तमस् गुणों का, इच्छा-क्रिया-ज्ञान शक्तियों का और इडा-पिंगला-सुषुम्ना नाड़ियों का प्रतिरूप।

  • नागाभरण: सर्प सांसारिक विषयों का प्रतीक। काम-क्रोध-लोभ-मोह-मद-मात्सर्य को जीतना कठिन है; उन्हें वश में रखने का संकेत। रीढ़ सर्प-सी, मस्तिष्क फण-सा — कुंडलिनी जागरण का प्रतीक।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

महामृत्युंजय मंत्र का अर्थ क्या है?

सुगंधयुक्त, पोषण देने वाले त्रिनेत्रधारी की आराधना करता हूँ; ककड़ी के बेल से अलग होने की भाँति मैं मृत्यु-बंधन से मुक्त होकर अमरत्व पाऊँ — यही अर्थ है।

त्र्यम्बक कौन हैं?

तीन नेत्रों वाले — भगवान शिव। तीन नेत्र तीन कालों के और तीसरा नेत्र ज्ञान का प्रतीक है।

शुभमस्तु · समस्त लोकाः सुखिनो भवन्तु · ॐ नमः शिवाय