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जगन्नाथ मंदिर, पुरी

जगन्नाथ मंदिर, पुरी

विष्णु temple · पुरी, Odisha, India

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ओडिशा के तट पर स्थित पुरी का श्री जगन्नाथ मंदिर हिंदू धर्म के सबसे महत्वपूर्ण तीर्थों में से एक है। इसके अधिष्ठाता देव जगन्नाथ हैं, जो विष्णु का एक रूप हैं, और उनकी पूजा उनके बड़े भाई बलभद्र, बहन सुभद्रा तथा सुदर्शन चक्र के साथ होती है। ये चारों काष्ठ से गढ़े विग्रह हैं, जो रत्न सिंहासन (रत्नवेदी) नामक रत्नजड़ित वेदी पर विराजमान हैं। वर्तमान मंदिर 12वीं शताब्दी का है और बदरीनाथ, द्वारका तथा रामेश्वरम के साथ चार धामों में गिना जाता है।

पुरी अपनी रथ यात्रा के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है। हर वर्ष ग्रीष्म ऋतु में विग्रह मंदिर से निकलकर तीन विशाल काष्ठ रथों पर विराजते हैं और उन्हें बड़दांड (ग्रैंड रोड) पर खींचते हुए लगभग 3 किमी दूर गुंडिचा मंदिर तक ले जाया जाता है। अंग्रेज़ी शब्द 'juggernaut' जगन्नाथ से ही बना है, जिसका अर्थ है 'जगत के स्वामी'।

Faith & Tradition

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Religious Significance of जगन्नाथ मंदिर, पुरी

पुरी जिला प्रशासन पुरी को द्वारका, बदरीनाथ और रामेश्वरम के साथ भारत के चार धामों में से एक बताता है। अनेक हिंदू जीवन में एक बार चारों धामों की यात्रा करने की आकांक्षा रखते हैं। पुरी को पुरुषोत्तम क्षेत्र या श्रीक्षेत्र भी कहा जाता है। जगन्नाथ परंपरा ओड़िया धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन के केंद्र में है।

यह मंदिर अपने भोग के लिए प्रसिद्ध है। मंदिर प्रशासन के अनुसार भोग मंदिर की रसोई में पकाया जाता है, जगन्नाथ को अर्पित किया जाता है और फिर देवी विमला के मंदिर में पवित्र किया जाता है, जिसके बाद इसे महाप्रसाद कहा जाता है। श्रद्धालु इसे परिसर के भीतर आनंद बाज़ार में खरीदते और आपस में बाँटते हैं। विमला मंदिर स्वयं शक्ति उपासना का एक महत्वपूर्ण केंद्र है, और यहाँ हर वर्ष सोलह दिवसीय दुर्गा पूजा मनाई जाती है।

मंदिर के कुछ अनुष्ठान असाधारण हैं। हर वर्ष स्नान पर्व के बाद विग्रह एक अवधि के लिए सार्वजनिक दर्शन से हट जाते हैं, जिसे अनसर कहा जाता है। कुछ विशेष वर्षों में नवकलेवर अनुष्ठान में काष्ठ विग्रहों को पूरी तरह बदल दिया जाता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि दिव्य तत्व पुराने विग्रहों से नए विग्रहों में प्रवेश करता है।

Heritage

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History of जगन्नाथ मंदिर, पुरी

श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन (SJTA) के अनुसार वर्तमान मंदिर 12वीं शताब्दी में पूर्वी गंग वंश के अनंतवर्मन चोडगंग देव के समय बना। SJTA यह भी बताता है कि अंतिम निर्माण कार्य में लंबा समय लगा और अनंगभीम देव तृतीय ने मंदिर पूरा करके 1230 ई. में विग्रहों की प्रतिष्ठा की। पुरी जिला प्रशासन भी 12वीं शताब्दी के निर्माण का श्रेय चोडगंग देव को देता है। Encyclopaedia Britannica पुरी को जगन्नाथ के 12वीं शताब्दी के मंदिर का स्थल बताती है।

मंदिर परंपरा मूल मंदिर का श्रेय एक पौराणिक राजा इंद्रद्युम्न को देती है। यह आस्था का विषय है, प्रलेखित इतिहास का नहीं। मध्यकाल के बारे में SJTA के अपने विवरण में रामानुजाचार्य सहित वैष्णव आचार्यों की यात्राओं का उल्लेख है। उसके अनुसार रामानुज ने राजा को परिसर के भीतर लक्ष्मी का अलग मंदिर स्थापित करने के लिए प्रेरित किया। SJTA कवि जयदेव का संबंध भी पुरी से जोड़ता है। उनका गीत गोविंद जगन्नाथ के सम्मुख गाया जाने लगा, और इसके पद मंदिर के अनुष्ठानों में प्रयुक्त खंडुआ रेशम में बुने जाते हैं।

Britannica के अनुसार पुरी 1803 में ब्रिटिश शासन के अधीन आया। आधुनिक काल में मंदिर का संचालन ओडिशा सरकार के अधीन SJTA करता है। नवकलेवर अनुष्ठान, जिसमें काष्ठ विग्रहों का नवीनीकरण होता है, 1996 में और फिर 2015 में हुआ। ओडिशा सरकार के Reference Annual के अनुसार 2015 का चक्र 29 मार्च 2015 को बनजाग यात्रा, यानी पवित्र नीम के लट्ठों की खोज, से आरंभ हुआ।

Architecture and sacred features

यह मंदिर ओडिशा की कलिंग शैली का है। SJTA के अनुसार मुख्य गर्भगृह (विमान या बड़ देउल) घुमावदार शिखर वाला पंचरथ रेखा देउल है। यह तीन मंडपों के साथ एक पंक्ति में खड़ा है: जगमोहन (सीढ़ीदार पिरामिडनुमा छत वाला पीढ़ा देउल शैली का प्रवेश-मंडप), नाटमंडप और भोगमंडप। पुरी जिला प्रशासन के अनुसार ऊँचे चबूतरे पर स्थित मुख्य मंदिर की ऊँचाई 65 मीटर है।

SJTA की एक पुरानी गाइड के अनुसार परिसर 4,20,000 वर्ग फुट से अधिक के ऊँचे चबूतरे पर स्थित है। यह लगभग सात मीटर ऊँची दीवार से घिरा है, जिसमें चार द्वार हैं: सिंहद्वार (पूर्व, मुख्य प्रवेश), हस्तिद्वार (उत्तर), अश्वद्वार (दक्षिण) और व्याघ्र या खंजा द्वार (पश्चिम)। सिंहद्वार के सामने अरुण स्तंभ खड़ा है, एक एकाश्म स्तंभ, जिसे उसी गाइड के अनुसार कोणार्क के सूर्य मंदिर से लाया गया था। दीवारों के भीतर लगभग तीस छोटे मंदिर हैं, जिनमें विमला, लक्ष्मी और गणेश के मंदिर शामिल हैं; गणेश मंदिर प्राचीन कल्पवट बरगद के मूल में है।

Plan Your Visit

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Darshan and Visitor Information

SJTA के अनुसार केवल हिंदुओं को ही मंदिर के भीतर जाने की अनुमति है। अन्य धर्मों के लोग ग्रैंड रोड पर रथ यात्रा की शोभायात्रा देख सकते हैं। SJTA द्वारा 1 जनवरी 2024 से लागू ड्रेस कोड के तहत शॉर्ट्स, हाफ-पैंट, फटी जींस, स्कर्ट और बिना आस्तीन के कपड़े वर्जित हैं। जूते-चप्पल, चमड़े की वस्तुएँ, मोबाइल फोन, कैमरे और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण भीतर ले जाने की अनुमति नहीं है, और SJTA सिंहद्वार के पास जूते और मोबाइल जमा करने के निःशुल्क स्टैंड उपलब्ध कराता है।

दिन के अधिकांश समय दर्शन उपलब्ध रहते हैं, परंतु प्रमुख अनुष्ठानों के दौरान इन्हें रोका या सीमित किया जाता है। स्नान यात्रा के बाद अनसर के दौरान लगभग दो सप्ताह तक विग्रहों के दर्शन नहीं होते। ये व्यवस्थाएँ श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन के विवरण के अनुसार हैं (अक्टूबर 2026 में जाँची गईं)। यात्रा से पहले SJTA से वर्तमान समय और नियमों की पुष्टि कर लें।

Timings and arrangements change with seasons and festivals. Confirm current details with श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन (SJTA), ओडिशा सरकार (official website) before travelling. Last reviewed 5 October 2026.

Sacred Calendar

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Festivals at जगन्नाथ मंदिर, पुरी

आषाढ़ (जून/जुलाई)

रथ यात्रा (गुंडिचा यात्रा)

आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा और सुदर्शन को नंदिघोष, तालध्वज और दर्पदलन रथों पर खींचकर गुंडिचा मंदिर ले जाया जाता है। रथों के चलने से पहले छेरा पहंरा अनुष्ठान में गजपति राजा सोने की झाड़ू से रथों का फर्श बुहारते हैं।

आषाढ़ (जून/जुलाई)

बाहुड़ा यात्रा

गुंडिचा मंदिर से वापसी यात्रा आषाढ़ शुक्ल दशमी को होती है। इसके बाद सुना बेश और विग्रहों के मुख्य मंदिर में पुनः प्रवेश (नीलाद्रि बिजे) जैसे अनुष्ठान होते हैं।

ज्येष्ठ पूर्णिमा (मई/जून)

स्नान यात्रा

काष्ठ विग्रहों को स्नान वेदी पर लाया जाता है और चंदन, कपूर तथा अन्य सुगंधित द्रव्यों से मिश्रित जल के 108 घड़ों से स्नान कराया जाता है। इसके बाद बलभद्र और जगन्नाथ को गज-मुख वाले गजानन बेश में सजाया जाता है।

ज्येष्ठ से आषाढ़ (जून)

अनसर

स्नान पर्व के बाद विग्रह आषाढ़ की अमावस्या तक एकांत में रहते हैं। परंपरा के अनुसार वे अस्वस्थ होते हैं, और केवल नियुक्त सेवक ही उनकी सेवा करते हैं। इस दौरान सार्वजनिक दर्शन उपलब्ध नहीं होते।

अक्षय तृतीया से आरंभ (अप्रैल/मई)

चंदन यात्रा

मंदिर प्रशासन अक्षय तृतीया से आरंभ होने वाली चंदन यात्रा को जगन्नाथ के बारह पारंपरिक उत्सवों (द्वादश यात्राओं) में गिनता है।

अनियमित (अधिक आषाढ़ मास वाले वर्ष)

नवकलेवर

काष्ठ विग्रहों को विशेष रूप से चुने गए नीम वृक्षों से गढ़े गए नए विग्रहों से बदला जाता है। SJTA के अनुसार यह 8, 11, 12 या 19 वर्षों के अंतराल पर आता है, और सबसे हाल के चक्र 1996 और 2015 में हुए।

Location

How to Reach जगन्नाथ मंदिर, पुरी

निकटतम हवाई अड्डा भुवनेश्वर का बीजू पटनायक अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा है। पुरी जिला प्रशासन के अनुसार यह मंदिर से लगभग 60 किमी दूर है। पुरी रेलवे स्टेशन एक टर्मिनस है, जहाँ से भारत के कई शहरों के लिए सीधी ट्रेनें हैं, और जिला प्रशासन के अनुसार मंदिर से इसकी दूरी लगभग 3 किमी है। भुवनेश्वर और पुरी स्टेशन से बसें, टैक्सियाँ और ऑटो-रिक्शा चलते हैं।

SJTA के अनुसार बड़दांड पर स्थित सिंहद्वार ही श्रद्धालुओं के लिए एकमात्र प्रवेश द्वार है, और शेष तीन द्वार निकास के लिए उपयोग होते हैं। वरिष्ठ नागरिकों और दिव्यांगजनों के लिए जगन्नाथ बल्लभ पार्किंग से मंदिर तक निःशुल्क बैटरी चालित वाहन उपलब्ध कराए गए हैं। यात्रा से पहले SJTA से वर्तमान व्यवस्थाओं की पुष्टि कर लें।

Location: पुरी, Odisha, India

Nearest airport: बीजू पटनायक अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, भुवनेश्वर (पुरी जिला प्रशासन के अनुसार लगभग 60 किमी)

Nearest railway station: पुरी रेलवे स्टेशन (पुरी जिला प्रशासन के अनुसार लगभग 3 किमी)

Questions

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जगन्नाथ मंदिर, पुरी: Frequently Asked Questions

पुरी का जगन्नाथ मंदिर किसने बनवाया?

श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन और पुरी जिला प्रशासन वर्तमान मंदिर का श्रेय 12वीं शताब्दी में पूर्वी गंग वंश के अनंतवर्मन चोडगंग देव को देते हैं। SJTA के अनुसार अनंगभीम देव तृतीय ने इसे पूरा किया और 1230 ई. में विग्रहों की प्रतिष्ठा की।

क्या गैर-हिंदू पुरी जगन्नाथ मंदिर में प्रवेश कर सकते हैं?

नहीं। मंदिर प्रशासन के अनुसार केवल हिंदुओं को ही भीतर जाने की अनुमति है। रथ यात्रा को बड़दांड (ग्रैंड रोड) पर सभी लोग देख सकते हैं।

रथ यात्रा के तीनों रथों के नाम क्या हैं?

SJTA के अनुसार नंदिघोष रथ पर जगन्नाथ, तालध्वज पर बलभद्र और दर्पदलन पर सुभद्रा विराजमान होते हैं।

विग्रह गुंडिचा मंदिर में कितने दिन रहते हैं?

उन्हें आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को वहाँ ले जाया जाता है और दशमी को बाहुड़ा यात्रा में वे लौटते हैं। SJTA इसे लगभग एक सप्ताह का प्रवास बताता है।

रथ यात्रा से पहले लगभग दो सप्ताह तक दर्शन बंद क्यों रहते हैं?

ज्येष्ठ पूर्णिमा की स्नान यात्रा के बाद, परंपरा के अनुसार विग्रह अस्वस्थ हो जाते हैं और आषाढ़ की अमावस्या तक एकांत (अनसर) में विश्राम करते हैं। इस अवधि में सार्वजनिक दर्शन उपलब्ध नहीं होते।

क्या जगन्नाथ मंदिर में कोई ड्रेस कोड है?

हाँ। 1 जनवरी 2024 से SJTA ने शॉर्ट्स, हाफ-पैंट, फटी जींस, स्कर्ट और बिना आस्तीन के कपड़ों पर रोक लगाई है। यात्रा से पहले मंदिर प्रशासन से वर्तमान नियमों की पुष्टि कर लें।

नवकलेवर क्या है?

यह वह अनुष्ठान है जिसमें विग्रहों की काष्ठ प्रतिमाओं को पवित्र नीम के लट्ठों से गढ़ी गई नई प्रतिमाओं से बदला जाता है। यह प्रायः उस वर्ष होता है जिसमें अधिक आषाढ़ मास हो; सबसे हाल के नवकलेवर 1996 और 2015 में हुए थे।

भुवनेश्वर हवाई अड्डे से मंदिर कितनी दूर है?

पुरी जिला प्रशासन के अनुसार भुवनेश्वर का बीजू पटनायक अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा मंदिर से लगभग 60 किमी दूर है। पुरी रेलवे स्टेशन लगभग 3 किमी दूर है।